मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
विकासवाद १४९
निराधार है। कहा जाता है कि 'सम्पूर्ण संसार परिवर्तनका फल है।' किन्तु परिवर्तन
या गति जड पदार्थका स्वाभाविक धर्म नहीं हो सकती। व्यवहारमे देखते हैं
कि घडीमें गतिका परिवर्तन घडीका स्वाभाविक धर्म नही, बन्दूकद्वारा
चलनेवाली गोलीकी गति स्वाभाविक नहीं है, घडी और गोली पहले गतिहीन
थीं, अन्तमें भी गतिहीन होनेवाली हैं। बीचमें किसी चेतनद्वारा ही उनमें
गति मिलती है। इस तरह संसारमें तेज, जल, किरण, वायु आदि सभी
पदार्थोमे गति या परिवर्तन किसी चेतनमे ही मिलना चाहिये। घडी और
गोलीकी गतिके तुल्य ही ससारकी गति भी न पहले थी, न अन्तमें रहेगी।
उसे गति देनेवाला चेतन ईश्वर ही है।
'साइंस एण्ड रेलीजन'में प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० जे० एम्० फ्लेमिंगका कहना
है कि 'साइन्सके स्वाध्यायसे हमें इस प्राकृतिक जगत्में तरकीब, योजना, धारणा
और विचार दिखलायी पड़ते हैं। ये बाते इत्तिफाकसे अचानक नहीं आ गयीं।
ये विचार चैतन्यकी सूचना देते हैं। यह संसार बिना विचारवान्के कभी नहीं बन
सकता। महर्षिव्यासने भी उपनिषदोंके आधारपर शारीरक सूत्रमें कहा ही है कि जड
प्रकृतिमें ईक्षण नहीं बन सकता, किंतु यह संसार ईक्षणपूर्वक ही हो सकता है—
"ईक्षतेर्नाशब्दम्।" (ब्रह्मसूत्र १।१।५)
कुछ विकासवादियोकी कल्पना है कि 'पृथ्वीपर गिरनेवाले तारकाओंके
द्वारा जीवनका बीज हमारे यहाँ पहुँचा।' परंतु इसमे शंका यह होती है कि क्या
प्रोटोप्लाज्ममें इतनी शक्ति है कि तारिकाओसे पृथ्वीपर पहुँचनेतक उनमें जीवन
अवशिष्ट रह सकता होगा? दूसरी कल्पना यह है कि 'असंख्य वर्षोंके पहले
अनुकूल स्थिति पानेपर जीवनका एकदम प्रादुर्भाव हुआ।' परंतु इसपर विकास-
वादी ही कहते हैं कि 'जीवनका आरम्भ कब हुआ, कैसे हुआ, इसपर वैज्ञानिकों-
को अबतक कुछ ज्ञात नहीं। इससे स्पष्ट है कि 'चैतन्य कैसे बनता है,' यह
वैज्ञानिकोको मालूम नहीं। परंतु उनका विश्वास है कि 'वह है प्राकृतिक,' क्योंकि
उनके मतमें चेतन प्रोटोप्लाज्म ही है। प्रोटोप्लाज्म, जो शहदकी भाँति तरल
पदार्थ है, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बारह भौतिक पदार्थोंसे
बना है, जो कि जड ही हैं। ये भौतिक पदार्थ 'एलेक्ट्रोन'के न्यूनाधिक मेलसे
बनते हैं। एलेक्ट्रोन खण्ड-खण्ड है, अर्थात् ये सब पदार्थ परमाणुओंसे बने है,
जीव भी प्राकृतिक परमाणुओंसे ही बना है।' हक्सलेके मतानुसार 'चेतन' पदार्थ
दीपज्योति अथवा पानीके भँवरके तुल्य नित्य प्रतीत होनेपर भी प्रतिक्षण बदलने
वाली व्यक्तियाँ ही हैं। नये-नये परमाणु मिलते जाते हैं, पुराने अलग होते रहते
हैं, यह धारा निरन्तर बहती रहती है' इसलिये ज्ञान एवं चैतन्यका सिलसिला
नहीं टूटता।
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नवीन विज्ञानके अनुसार 'प्रत्येक परमाणु कई एलेक्ट्रोनोसे बना होता है ।
एलेक्ट्रोन एक दूसरेसे चिपकते नहीं, प्रत्युत दूर-दूर रहते हैं। जिस प्रकार तारका-
समूह दूर-दूर रहकर भी एक तारापिण्ड या सौर जगत् कहलाता है, उसी प्रकार अनेको
एलेक्ट्रोनोसे बना हुआ 'एटम' भी है। इसी एटमसे उपर्युक्त बारह पदार्थ बनते
हैं। इन्हीं बारह पदार्थोंसे ज्ञान, चैतन्य या आत्मा बना है। अतः वह भी
परिवर्त्तनशील है।' वैज्ञानिकोके अनुसार परमाणुओंकी गति प्रति सेकेन्ड
एक लाख मील है। यहाँ विचारणीय यह है कि जुदा-जुदा रहकर इतने वेगसे
चलनेवाले परमाणु किस प्रकार अपना ज्ञान दूसरे परमाणुमें डालते हैं अथवा
किस प्रकार ज्ञान एक परमाणुसे उड़कर दूसरे परमाणुमे जाता है और चैतन्य
स्थिर रहता है ? बीसो वर्ष पढानेपर भी विद्यार्थी भूल जाता है, परंतु बिना किसी
साधनके दूर-दूर स्थित परमाणु इतने वेगसे दौडते हुए अपना ज्ञान दूसरेमे फेककर
चले जाते हैं और दूसरे उस ज्ञानको ले लेते हैं। यह कितनी आश्चर्यजनक और
कितनी असंगत बात है ?
दिसम्बर सन् १९२३ के 'चिल्ड्रेन्स न्यूज' पत्रमें प्रो० रिचर्ड
की 'थर्टी इयर्स आफ साइकिकल रिसर्च' नामक पुस्तकका विज्ञापन
छपा है । उसीमें पुस्तकका एक उद्धरण है कि 'पचास वर्षपूर्व
भौतिक विज्ञानका यही रुख था कि जो बात भौतिक विज्ञानसे सिद्ध
न हो, उसका अस्तित्व ही नहीं, वह ढोग है । किंतु आज ऐसे भी
प्रमाण मिल रहे हैं कि भौतिक विज्ञानकी पहुँचके बाहर भी पदार्थोंका अस्तित्व
है। ऐसे पदार्थोंको 'साइकिकल' कहते हैं। यह शब्द जीवके लिये व्यवहृत
होता है। जीवात्माको अब कोई भी भौतिक नहीं कहना ।' डार्विनके सुपुत्र
प्रो० जार्ज डार्विनने - १६अगस्त सन् १९०५ को दक्षिण अफ्रीकामें 'ब्रिटिश
एसोसिएशन'के प्रधानकी हैसियतसे कहा है कि 'जीवनका रहस्य अब भी
उतना ही गूढ है जितना कि पहले था।' प्रो० गेडिस कहते हैं कि 'कुछ
प्रामाणिक विज्ञानवेत्ता, जो जीवके एक लोकसे दूसरे लोकमें आगमनकी
कल्पनाको सन्तोषजनक मानते हैं, ऐसा भी मानते हैं कि जीव प्रकृतिकी भाँति
अनादि है।' दूसरे एक विद्वान्का कहना है कि 'चेतनके प्रभाव बिना जड पदार्थोंमे
चेतना आ ही नहीं सकती।' विज्ञानका यह नियम पृथ्वीके आकर्षण-नियमके
समान अटल प्रतीत होता है। जबसे मनोविज्ञान, मस्तिष्कशास्त्र एव आत्मविद्याका
अन्वेषण हुआ, तबसे जीव सम्बन्धी सभी शंकाएँ निवृत्त हो गयीं ।"
मनोविज्ञानके एक विद्वान्का कहना है कि 'किसी भी जीवनकार्यकी संगति
भौतिक नियमोमे स्पष्ट नहीं होती । आँसू या पसीना निकलनेके नियमोका भी
स्पष्टीकरण अभीतक नहीं हो सका ।' मस्तिष्क-शास्त्रके जन्मदाता गॉलका
विकासवाद १५१
कहना है कि ‘मेरी रायमें एक ही निरवयव वस्तु है, जो देखती, सुनती,
स्पर्श करती है, प्रेम, विचार एव स्मरण करती है, पर अपना
कार्य करनेके लिये वह मस्तिष्कमें अनेक भौतिक साधन चाहती है।’
इससे वेदान्तके द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता आत्माका ही वर्णन मिलता-जुलता
है। आत्मविद्याके प्रसिद्ध पण्डित सर ओलिवर लॉज लिखते हैं कि ‘एक बार
आप इस बातको देखे कि अन्तःकरण बडी वस्तु है। वह इस मशीन (शरीर) से
बाहरकी वस्तु है। ऐसा नहीं कि जब शरीर नष्ट होता है, तब वह अपना
अस्तित्व खो देती है। हम जितने दिनोंतक पृथिवीपर रहते हैं, उतने ही दिनोंके
लिये हमारा अस्तित्व परिमित नहीं। हम बिना शरीरके भी रह सकते हैं।
हमारा अस्तित्व बना ही रहेगा। मै ऐसा क्यों कहता हूँ ? इसलिये कि ये सब
बातें विज्ञानके आधारपर स्थित हैं। बहुतोंने अभी इसका अनुभव नहीं किया,
पर यदि कोई तीस-चालीस वर्षतक अपनी आयु इस विषयमे लगाये, तभी वह
यह कह सकनेका अधिकारी होगा कि अब मैं किसी स्थितिमें पहुँचा हूँ।’ इन
बातोमे ज्ञात होगा कि जीवका स्वतन्त्र अस्तित्व विज्ञानसम्मत है। अब ईश्वर-
नियन्त्रित प्रकृतिसे विकास उसी प्रकार मान्य है, जिस प्रकार कलीसे फूलका
विकास होता है। जैसे कलीसे फूल ही होगा, भ्रमर नहीं, बीजसे वृक्ष ही होगा,
मूँगा नहीं, वैसे ही ईश्वरीय नियमानुसार पदार्थोंका विकास होगा । यह टी०
एच् हक्सलेके ‘एनीवर्सरी ऐडेस’ के इन वाक्योमे स्पष्ट है कि ‘प्रत्येक पशु
और वनस्पतिकी सभी जातियोंमें कुछ विशेष प्राणी ऐसे होते हैं, जिनको मैं
‘स्थिर आकृति’ नाम देता हूँ, उनमे सृष्टिसे लेकर अबतक कोई विकार
नहीं हुआ।’
मद्रास हाईकोर्टके जज टी० एल० स्टेजका कहना है कि ‘जल-कृमियोंमें
बहुत प्रकारके भिन्न-भिन्न रूपवाले जन्तु प्रतिदिन उत्पन्न होते हैं । इनके
लिये यह आवश्यक नहीं कि वे एक दूसरेसे विकृत होकर उत्पन्न हो,
प्रत्युत वे तो एक दूमरेसे अपेक्षारहित होकर एक ही समयमें अलग-
अलग आकारके साथ उत्पन्न होते हैं । इससे क्रम-विकासका स्पष्टतया
खण्डन हो जाता है। अनुभव भी यही है कि सिरमें मैल जमनेसे जुएँ साक्षात्
उत्पन्न होती हैं। वे अनेक अन्य देह धारण करनेके बाद जुएँ नहीं बनतीं ।
खाटका खटमल मलिनतासे ज्यो-का-त्यो उत्पन्न होता है। मूत्रके कीडे समारके
समस्त देशोमें एक ही आकारके उत्पन्न होते हैं।’ इन घटनाओसे सिद्ध होता
है कि अमुक आकार प्राप्त करनेके लिये अनेक आकारोका चक्कर लगाना
आवश्यक नहीं । जिस ईश्वरके द्वारा चन्द्र-सूर्य बनते हैं, जिससे अमीबा बनते
हैं, उसीसे स्वतन्त्र अन्य शरीर भी बन सकते हैं ।
१५२ | मार्क्सवाद और रामराज्य
इसीलिये एक आधुनिक वैज्ञानिक अपनी ‘प्रिंसिपल्स ऑफ जुआलोजी’
( प्राणिविज्ञानके सिद्धान्त ) पुस्तकमें लिखता है कि ‘पृथ्वीपर उत्पन्न बिना
हड्डीके जन्तुओं और मनुष्यादि हड्डीवाले प्राणियोंमें एक समान ही उन्नति देखी
जाती है, परन्तु इस समानताका यह अर्थ नहीं कि एक प्रकारके प्राणीसे दूसरे
प्रकारके प्राणी विकसित हुए हैं । आदिम मत्स्य ही सर्पणशील प्राणियोंका
पूर्वज नहीं और न मनुष्य ही अन्य स्तनधारियोंसे विकसित हुआ है । प्राणियोंकी
शृङ्खला किसी अभौतिक तत्त्वसे सम्बन्ध रखती है, जिसने पृथ्वीपर अनेक
प्रकारके प्राणियोंकी सृष्टि करके अन्तमे मनुष्यको बनाया है—‘ब्रह्मावलोकधिषणं
सुदमाप देवः । ( श्रीमद्भा० ११ । ९ । २८ ) इसके अतिरिक्त परमेश्वरका अस्तित्व
माननेपर प्रकृतिकी स्वतन्त्रताका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता । फिर तो अनादिसिद्ध
जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार उनके सुख-दुःखादि फल-भोगार्थ ही देहका
निर्माण अपेक्षित होता है । सुख-दुःखकी न्यूनता-अधिकता देहकी बनावटपर
निर्भर है । इस दशामें जिन प्राणियोंको उनके कर्मानुसार जैसा सुख-दुःख देना
है, सीधे तदुपयोगी ही शरीरका निर्माण आवश्यक है । व्यर्थ असंख्य शरीरोंमें
घुमा-फिराकर जीवको उस शरीरमे लाना परमात्माके लिये उचित नहीं ।
कर्मफलोंको भोगानेके लिये यदि किसी अपराधीको तीन मासकी कालकोठरीकी
सजा देनी है, तो पुलिस उस व्यक्तिको वर्षों इधर-उधरकी हवालातोंमें
भटकाती फिरे, यह न्याय नहीं । अतः ईश्वर एवं जीव-तत्त्व मान लेनेपर फिर
क्रम-विकासका कोई भी स्थान नहीं रह जाता ।
विकास-सिद्धान्तकी मान्यता है कि ‘चेतनकोष्ठसे प्राणी बनता है । इन्हीं
चेतनकोष्ठोंसे समस्त प्राणियोंकी रचना हुई । इन सब जीवित प्राणियोंमें तीन
सामान्य बातें हैं—( १ ) सब प्राणियोंके शरीर एक ही सरल पदार्थोंसे बने
हैं । पशु-पक्षियोंके शारीरिक तत्त्वोंमें कोई अन्तर नहीं । ( २ ) सब प्राणी अपनी
क्षीण शक्ति फिरसे प्राप्त कर लेते हैं । प्रतिदिन काम करके श्रान्त होते हैं,
विश्रामके अनन्तर पुनः ताजे हो जाते हैं । ( ३ ) यन्त्रोंकी भाँति सुधरते-सुधरते
एक शरीरसे अन्य शरीरवाले होते हैं । सब प्राणियोंके आठ स्थान होते
हैं—( १ ) पोषण—बाहरसे पदार्थ लेना, पचाना और सारे शरीरमे
पहुँचाना, ( २ ) श्वासोच्छ्वास, ( ३ ) मलत्याग, ( ४ ) रक्तप्रसार, ( ५ )
प्रेरणा, ( ६ ) आधारस्थान ( जिससे शरीर सधारहता है ), ( ७ ) ज्ञानतन्तु (जिससे
समस्त शरीरका हाल मालूम होता है ) और ( ८ ) प्रसव । इस तरह सब
प्राणियोंके तत्त्व एक-से हैं और आठ स्थान भी एक-से होते है । किंतु ये सब बाते
भारतकेलिये कोई नयी खोज नहीं हैं। यहाँका एक गँवार भी जानता है कि ‘पंच रचित
यह अधम सरीरा ।’ जो जीते, खाते, काम करते तथा संतति उत्पन्न करते हैं, उनमें
आठ संस्थान होने ही चाहिये। क्या कोई ऐसा भी मूर्ख होगा जो समझेगा कि 'भोजन
किया जाता है और मलत्याग न किया जायगा ?' नालेके पानीकी तरह रक्तका
बहना, संतति उत्पन्न करना सभी दुनियाँको अवगत है । हाँ, विचारणीय
यह है कि जिस प्रकार यन्त्र धीरे-धीरे सुधरता है, क्या उसी प्रकार प्राणी
और-से-और हो जाता है । वस्तुतः यन्त्र मनुष्यकी परिमित बुद्धिसे बनता है;
उसमें अनुभवके आधारपर कुशलता होती है, इसलिये आरम्भिक और अन्तिम
रूपमें अन्तर पड जाता है, परन्तु सर्वज्ञ परमेश्वरकी बुद्धिकी रचना मनुष्य-
बुद्धि-जैसी नहीं हो सकती ।
प्राणियोंके कर्मफलभोगार्थ परमेश्वर तदुचित देह बनाते हैं । जिसके
जैसे कर्म, उसे वैसा ही सुख दुःख भोगना पड़ता है । उसके लिये उसी प्रकारका
देह-निर्माण आवश्यक है । शरीरका बनाना यदि स्वतन्त्र प्रकृति या जीवके
अधीन माना जाय तो यन्त्रका दृष्टान्त ठीक हो सकता है । पर यहाँ तो
कर्मानुसार शरीर प्रदान करनेवाला ईश्वर है । अतः यन्त्रका दृष्टान्त
व्यर्थ है । विकासवादीका कहना है कि 'वैज्ञानिकोंने अबतक कोई ऐसी रीति
आविष्कृत नहीं की, जिससे इन परिवर्तनोंको वे परीक्षणोंद्वारा सिद्ध कर सकें;
और न उनको अबतक यही ज्ञात हो सका कि इस प्रकारके परिवर्तनके नियम
क्या हैं ? वैज्ञानिकोंको परिवर्तनके नियम मालूम नहीं । यह भी मालूम नहीं कि
परिवर्तन कैसे होता है ? परिवर्तन होते हुए भी किसीने नहीं देखा । अमुक
प्राणीका अमुक प्राणी बन गया, इसे किसीने नहीं देखा । आज किसीको भी बंदरसे
मनुष्य बनते नहीं देखा जाता और मनुष्यके बाद मनुष्यसे दूसरा भी कोई प्राणी
उत्पन्न होते नहीं दिखायी देता । ऐसी स्थितिमें परिवर्तन सिवा कल्पनाके और
कुछ भी सिद्ध नहीं होता । विज्ञानके प्रखर पण्डित भी यही कहते हैं कि
'जीवकी श्रेणियो एवं जातियोंकी उत्पत्तिका रहस्य हमको ज्ञात नहीं ।' थॉम्पसनका
कहना है कि 'हम नहीं जानते कि 'पृथ्वीपर जीवधारीकी उत्पत्ति कबसे हुई ?,
दूसरा एक विद्वान् भी कहता है कि 'इस उजाड पृथ्वीपर प्राणीकी उत्पत्ति
कैसे हुई, यह हम नहीं जानते ।' कुछ तीसरे लोग डार्विनके ही शब्दोंमें
स्वीकार करते हैं कि 'एक जातिसे दूसरी उपजातिकी भिन्नताके नियमोंके
सम्बन्धमें हमलोग कुछ नहीं जानते ।'
जातिविधान
इसी तरह विकासवादी जातिविभाग-शास्त्रके अनुसार साधर्म्य-वैधर्म्यके
अनुसार प्राणिवर्गका वर्गीकरण पृष्ठवंशधारी और पृष्ठवंशविहीनोंके भेदसे करते
हैं । जबसे रक्तकी परीक्षाका सिलसिला जारी हुआ, तबसे विकासवादियोंका
१७४ मार्क्सवाद और रामराज्य
वर्ग-विन्यास गलत सिद्ध हो गया। अबतक लोग 'गिनी फाउल' को मुर्गीकी
किस्मका समझते थे। पर अब रक्तकी परीक्षासे वह शुतुरमुर्गकी जातिका मालूम
होता है। इसी तरह 'विकासवाद' के लेखकने भालूको श्वान-जातिमें लिखा है।
परंतु उसके रुधिरकी परीक्षासे वह सील आदिकी भाँति जलजन्तु सिद्ध हो रहा
है। इसके अतिरिक्त जब विकासवादी एक ही प्रकारके मूल प्राणीसे समस्त
भूमण्डलके प्राणियोंकी उत्पत्ति मानता है, जब सबके संस्थान एक समान गिनता
है और एक ही तरीकेसे विकास मानता है, तब इन सबके रुधिरकण एक ही
बनावटके क्यों नहीं होते ? किसी जातिके प्राणीका रुधिरकण गोल, किसीका
चपटा क्यों होता है ? यह रुधिरका पृथक्त्व सिद्ध करता है कि प्रत्येक जातिका
शरीर भिन्न प्रकारके रुधिरकणोंसे बना होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि
समस्त जातियाँ एक ही प्रकारके प्राणीसे विकसित नहीं हुई, प्रत्युत सबकी उत्पत्ति
मूलतः अलग-अलग हुई।
तुलनात्मक शरीर-रचना-शास्त्रसे विकासवादकी बहुत ही सामग्री मिलती
है। बाह्यरूपमें अत्यन्त भिन्नता होनेपर भी कई प्राणियोंका जातिविभाग इस
शास्त्रने एक ही वर्गमें किया है। आन्तरिक रचना-साम्यपर इसका निर्णय होता है।
तदनुसार 'चमगादड, ह्वेल और गौ अनुक्रमसे नभचर, जलचर और भूमिचर
होनेपर भी तीनोंका एक ही वर्गमें अन्तर्भाव किया गया है, क्योंकि तीनो ही
स्तनधारी है। इसके अनुसार अनेक जातिके कुत्तोंमें साधर्म्य-वैधर्म्य दोनों ही
मौजूद हैं। साधर्म्यसे सब कुत्ते एक ही वर्गके हैं। वैधर्म्यसे बुलडाग, ताजी और
लैडी आदि अलग-अलग हैं, किंतु हैं सब एक ही पूर्व जन्तुकी सतति । इसी
तरह लोमडी, सियार और भेडिया वैषम्यसे अलग हैं । पर मांसभक्षण
आदि साम्यसे एक ही पूर्वजन्तुकी सतति प्रतीत होते हैं। बिल्ली और बनबिलाव
अलग होते हुए भी एक ही हैं। चीता, व्याघ्र, सिंह अलग-अलग होते हुए भी
एक हैं। इन सबका मांसाहारी, स्तनधारी कक्षामें समावेश होता है। इनमे व्याघ्र
तथा सिंहके मेलसे और भेड़िये तथा कुत्तेके मेलसे संतति भी होती है। भालू भी
मांस-भक्षक प्राणी है। इसकी आन्तर-रचना कुत्ते, बिल्लीकी रचनासे कुछ पृथक्
है। पर इसका मेल इन्हींके साथ मिलता है। मांस-भक्षकोंमें बिज्जु, नेवला,
ऊदबिलाव अलग-अलग होते हुए भी एक ही प्रकारके हैं। ह्वेल मछली भी
मांसभक्षक है। यह जन्तु पहले स्थलचारी था, पर अब इसका पानी ही घर हो गया।
इसके पैर कमजोर और नावके चप्पूकी भाँति हो गये। शरीरमें इसके बल भी कम होता
है। यह स्तनधारी, मांसभक्षी प्राणी है। स्तनधारियोंमें तीक्ष्ण दाँतवालोंका एक दल
चूहा, छुछूंदर, घूस, गिलहरी, शशक और स्याहीका है। ये वस्तुओको कुतरते हैं।
अतः तीक्ष्णदन्ती कहलाते हैं। इनमें ही उड़न गिलहरी भी है। चमगादड़ भी इसी
विकासवाद १५५
जातिका है; किन्तु यह उड़नेवाला है । इनके पैरोंकी रचना भूमिचर जानवरोंके
अगले पैरोंके तुल्य होती है । विकासवादका यह सबसे उत्तम प्रमाण समझा
जाता है । स्तनधारियोंमें गाय, घोड़ा, हाथी, ऊँट, हरिण, गैड़ा, सूअर,
दरियाई घोड़ा आदि हैं । इनके सूँड़ या खुर होते हैं । इनमें खुरका माश्चर्य
है। हाथीकी पाँचों अँगुलियाँ, टापीरके चार, गैंडेके तीन, ऊँटकी दो और
घोड़ेकी एक ही होती है । यहाँ अंगुलियोंके क्रमशः ह्राससे विकासका अच्छा
प्रमाण मिलता है । आस्ट्रेलियाका केंगारू भी विकासका अच्छा प्रमाण है ।
इसकी माँदीके पेटमें एक थैली होती है । माता बच्चोंको पैदा करके इसी थैलेमें
रख लेती है। इस थैलेमें स्तन होते हैं । बच्चे बड़े होनेपर थैलेसे बाहर निकलते
हैं । इसी तरह अमेरिकाका 'ओपोसम' होता है । उसकी भी मादाके पेटमें थैली
होती है। इनके सिवा डकबिल एव ईकड्ना दो स्तनधारी जन्तु और भी होते
हैं । ये अण्डे देते हैं, परन्तु अण्डोंको पेटमें रखनेके लिये इनके भी पेटमें थैली
होती है । इस तरह स्तनधारियोंमें देखा गया है कि कई पूर्ण जरायुज, कई
केंगारूकी भाँति अर्ध-जरायुज और कई डकबिलकी भाँति अण्डज हैं । ये स्तनधारियों
एव अण्डजोके मध्यवर्त्ती प्राणी हैं ।
'इसी तरह पृष्ठवंशधारियोंकी दूसरी श्रेणीके पक्षी भी कई प्रकारके होते हैं ।
कोई दाना चुगते हैं, कोई मांस खाते हैं और कोई पानीमें तैरते हैं । परिस्थितिके
अनुसार उनके चोंच, पैर और झिल्लीदार पंजोंकी बनावट होती है ।
आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, न्यूजीलैड और अमेरिकाका पेग्विन पक्षी भी विकासका
एक श्रेष्ठ प्रमाण है। यह जहाँ रहता है, वहाँ दूसरा पक्षी नहीं रहता, इसीलिये
इसकी उड़नेकी शक्ति नष्ट हो गयी । यह पानीमें तैरता है । इसके पैर नावके
चप्पुओंकी तरह पानी काटनेवाले हो गये । शुतुरमुर्ग और मोरकी भी उड़नेकी
शक्ति कम हो गयी, क्योकि इन्हें किसी पक्षीका डर नही । यह परिस्थितिमे
प्राप्त विकासके उदाहरण हैं ।
'पीठकी हड्डीवालोमे तीसरी जाति सर्पणशीलोकी है । इसमे गोह, साँप,
अजगर, नाकू, मगरमच्छ एवं कछुआ आदि हैं । गोहकी अनेक जातियों हैं,
एक जातिकी गोहमें आगेके पैर नहीं होते, दूसरी जातिमें आगे-पीछे चारों पैर
नहीं होते । सर्प बिना पैरका होता ही है। ये भी विकासके प्रमाण हैं । पृष्ठ-
वंशवालोकी चौथी जाति है मण्डूकोंकी, यह पैदाइशसे लेकर युवावस्थातक अपनी
जीवनीसे सिद्ध कर देता है कि मछलियोसे उसकी उत्पत्ति हुई है। मछलियोंकी
तरह पहले वह गलफडोसे श्वास लेता है, फिर मुखसे । पहले उसके (मछलीकी
तरह) पूँछ होती है, फिर वह लुप्त हो जाती है । पाँचवीं श्रेणी मछलियोंकी है ।
वे हजारो प्रकारकी होती हैं, जिससे विकासके अनुमानकी अधिक सम्भावना
१५६ मार्क्सवाद और रामराज्य
रहती है । इसी तरह अस्थिरहित प्राणियोंके भी शरीरोंसे विकासका
अनुमान होता है । ये जोड़ोंसे बने होते है । कनखजूरा, बिच्छू, मकड़ी,
भौंरा, ततैया आदि इसी विभागके हैं । इनमे भिन्नता होते हुए भी सबके
शरीर छोटे-छोटे जोड़ोसे बने होते हैं । इनसे भी मालूम होता है कि सब एक
ही मूल प्राणीसे बने हैं' । इनके आगे अत्यन्त सूक्ष्म हैड्रा, अमीबा
आदि प्राणी है । इनके भी पोषण, श्वासोच्छ्वास आदि आठो संस्थान हैं । इस
तरह सब प्राणियोंमें वैधर्म्य होते हुए भी वे साधर्म्यसे रहित नही हैं । क्रमसे
रखनेपर पहले अमीबा, हैड्रा, कनखजूरे आदि जोड़वाले कीड़े, फिर हड्डीवाली
मछलियाँ, फिर मण्डूक, फिर सर्प, फिर पक्षी और अन्तमे स्तनधारियोंका
स्थान ठहरता है । विकाससे इनकी आकृतिमें भिन्नता है । जैसे नये यन्त्रके बन
जानेपर पुराने यन्त्र अलग हो जाते हैं, वैसे ही योग्य प्राणियोंके उत्पन्न हो जानेपर
अयोग्य जातियाँ पीछे रह जाती हैं । पिछली जातियोंके अवशिष्ट अवयव इस
बातकी साक्षी दे रहे हैं । मनुष्य भी स्तनधारी जन्तुओंकी श्रेणीमें है । वनमानुष,
बंदर, लीमर आदि जातियाँ इसी श्रेणीकी हैं, अतः इनकी उत्पत्ति विकासवादके
अनुसार ही है ।'
यद्यपि आन्तर-रचनाका मिलान ठीक है, फिर भी इनकी श्रेणियाँ बाह्य रूप-
से ही निर्धारित की गयी हैं । स्तनोंको देखकर स्तनधारियोंकी श्रेणीका निर्णय किया
है । मांस खाना, जीभसे पानी पीना, मैथुनके समय बँध जाना, पसीना न आना,
अँधेरेमे भी देखना आदि सब बाहरी लक्षण हैं । इसी तरह दाँत देखकर तीक्ष्ण-
दन्तवालोकी श्रेणी बनी । इस तरह सभी विभाग प्रायः बाह्य भेदपर ही निर्भर
ह, अतः आन्तरिक रचनापर वर्ग-विभागका अहंकार व्यर्थ है । ह्वेल, चमगादड़
और गायके स्तनोंको देखकर ही सबको एक श्रेणीमें रक्खा गया है । जहाँ
इनकी बाह्य आकृतिसे काम नहीं लिया, वही भूल हुई । भालू और गिनी फाउल-
को एक मानना भूल है । उस भूलको अब रुधिर-शास्त्र सुधार रहा है, अतः
केवल आन्तर रचनापर उपर्युक्त विभागकी बात असङ्गत है । शरीरके अंदर हड्डियाँ,
नस-नाड़ियाँ, यकृत्-प्लीहा, गर्भाशय आदि अनेक यन्त्र हे । पर ये क्या
अस्थिहीन कीडोंमें भी ह ? कुत्ते और गायके पानी पीनेके ढगमे भेद है । कुत्ता
जीभसे और गाय घूँटसे पानी पीती है, फिर भी दोनो स्तनधारी हैं । अतः
आन्तर-रचना जटिल है, उसके आधारपर वर्गभेद नही बन सकता । अमीबासे
स्तनधारियोंतककी रचनामे साम्यका पक्ष भी गलत है । यत्किंचित् साम्य तो
पाञ्चभौतिक होनेसे सबमें ही है । अस्थियुक्त और अस्थिहीन प्राणियोंकी कुछ भी
समानता नहीं है । यकृत्, प्लीहा, गर्भाशयादि एकमें हैं, दूसरेमें नहीं ।
अस्थिहीनोंमें अस्थियाँ कैसे हुईं, इसपर भी विकासवादी चकरा जाते हैं ।
विकासवाद
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इसपर उनकी चार कल्पनाएँ हँ-(१) प्राणियोंकी मानसिक प्रेरणासे अस्थियाँ
बनीं, ( २ ) कठोर काम करते-करते जैसे मनुष्योंके शरीरमें घट्टे पड़ जाते हैं,
वैसे ही श्रम करनेसे प्राणियोंके देहमें अस्थियाँ बन गयीं, ( ३ ) जब चूनेके
अधिकांश भागवाले पदार्थ खाये गये, तब हड्डियाँ पैदा हुई और ( ४ ) शरीरके
अंदर नस, नाड़ी आदि अवयव ही हड्डियाँ बन गये। परन्तु ये चारो पक्ष
असंगत हैं। मनका असर उसीपर पड़ता है, जिसका मनसे सम्बन्ध हो। अस्थिका
मनसे कोई सम्बन्ध नहीं। दाँतपर सुई चुभानेसे मनपर कुछ भी असर, नहीं
पड़ता। अतः 'मानसिक प्रेरणासे अस्थियाँ बनीं,' यह नहीं कहा जा सकता। यों
तो सम्पूर्ण संसार ही मनकी कल्पना है, फिर अस्थि ही क्यों ? घट्टोंका दृष्टान्त भी
ठीक नहीं, क्योकि बाहरी वस्तुके संघर्षसे बाहरी ही कठोरता आती है। बाह्य
संघर्षसे शरीरके अंदर हड्डियाँ कैसे बनेगीं ? चूनेवाले भोजनसे भी हड्डियाँ नहीं बन
सकतीं। सभी जानते हैं कि 'खूनसे हड्डियाँ पैदा होती हैं,' परन्तु लाखो जूँ,
चमड़े, कीलने, खटमल मनुष्यों, पशुओके खून पीते हैं, जोके खून पीती ह,
परन्तु उनमें हड्डी नहीं बनी। चींटियाँ हड्डियोंको चुनकर खाती हैं, उनमें भी
हड्डी पैदा नही हुई। 'नस-नाड़ियों हड्डी बन जाती हैं' यह भी बात युक्तिहीन
है। बच्चोंके मुखमें पहले दाँत नहीं होते, कुछ दिन बाद दाँत निकल आते हैं।
यदि नस-नाड़ियोंका दाँत बन जाना माने तो उधर थोडे ही दिनोंमे वे दाँत गिर
जाते हैं। गिरते समय नस-नाडियोंसे उनका कोई लगाव प्रतीत नहीं होता।
कुछ दिनो बाद फिर नये दाँत निकलते हैं, यदि पहली नस-नाड़ियो चली गयी
तो यह दूसरी कहाँसे आयीं ? वृद्ध होनेपर वे दाँत भी चले जाते हैं, तब भी
किसी नस नाडीका लगाव मालूम नहीं होता। डाक्टर भी दाँत निकाल देते
हैं, पर उनके साथ नस आदि कोई चीज नहीं निकलती। दाँत तो कीलोकी तरह
गड़े होते हैं, शरीर या किसी दूसरे अङ्गसे उनका वास्ता नहीं प्रतीत होता।
इसी तरह भीतरका सारा अस्थिपञ्जर अलग ही प्रतीत होता है, उसका
वास्ता नस नाड़ी, मास, त्वचा किसीसे नहीं । फिर ऐसी निराली वस्तुको
अस्थिहीन प्राणियोंने कैसे प्राप्त किया ? विकासवादी कहते हैं कि 'परिस्थितियोसे
ही हड्डियाँ उत्पन्न हुईं, परन्तु परिस्थिति भी हड्डी बनानेमें असमर्थ है। भाई-
बहन दोनो एक ही परिस्थितिमें उत्पन्न होते और बढ़ते हैं। पर बहनके
१५८ मार्क्सवाद और रामराज्य
ग्रन्थोंसे मालूम होता है कि 'दो स्त्रियोंके परस्पर मैथुन करनेसे यदि किसीके
गर्भमें बीज चला गया, तो उस गर्भसे अस्थिविहीन शिशु उत्पन्न होता है।' इसी
तरह 'कोई ऋतुस्नाता स्त्री यदि स्वप्नमे मैथुन करे तो वायुद्वारा आर्तव खिंचकर
गर्भमें धारित होता है। वही अस्थिहीन मांस-पिण्डके रूपमे उत्पन्न होता है।
केश-श्मश्रु, लोम, नख-दन्त, शिर-धमनी, स्नायु, शुक्र—ये सब पितृज गुण
होते है। इसी कारण स्त्रीको दाढ़ी-मूंछ, मयूरीको पूंछ, मुर्गीको कलँगी और
हथिनीके दाँत नहीं होते। पुरुषमें क्यो ये कठिन पदार्थ होते हैं और स्त्रीमें
क्यो नही होते ? अमीवामें कौन स्त्री है एवं कौन पुरुष, किस प्रकार उसका वंश
चला, फिर नर-मादा-भेद कैसे हुआ, अस्थिहीन और अस्थियुक्त यह भेद कैसे
हुआ ? इनका विकासवादमें कोई भी यथार्थ उत्तर नहीं। अतः शरीर-तुलनाकी
दृष्टिसे अस्थिहीनोंका अस्थिवालोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं। कहा जाता है कि
'एक कोष्ठवाला अमीवा दो कोष्ठवाला हैड्रा बन गया, क्योकि विकास-
सिद्धान्तानुसार कोष्ठ हमेशा दुगुने परिणाममें बढता है अर्थात् एकके दो, दोके
चार, चारके आठ और आठके सोलह हो जाते हैं।' इसके अनुसार प्रत्येक
उत्तरोत्तर योनियाँ आकार और वजनमें पूर्वकी अपेक्षा दूनी, चौगुनी, अठगुनी
होनी चाहिये। पर ऐसा देखनेमें नही आता । स्थिति तो यह है कि अमीवा
हर जगहसे अपने अंदर छेद कर लेता है। इससे वह एक कोष्ठका भी नही
प्रतीत होता। यदि एक कोष्ठ हर जगहसे फटता है तो उसका चेतन-रस—
प्रोटोप्लाज्म—वह जाना चाहिये, किंतु ऐसा नहीं होता। इस तरह अमीवासे
लेकर जोडवालोंतक और जोडवालोंसे लेकर अस्थिवालोंतक कोई भी तुलना
नही। स्तनोंका विज्ञान क्या है, यह भी विचारणीय है। ये स्तन नरोंमें क्यो नही
होते, इसका कोई उत्तर नहीं। अमीवाके भी आकार-प्रकारका ज्ञान वैज्ञानिकोको
नहीं। वह एक कोष्ठवाला है या अनेक कोष्ठवाला और कोष्ठका क्या विज्ञान है,
उसमें नर-मादेका क्या विज्ञान है, इन कोष्ठोंसे उत्तर योनियोका किस प्रकार
विकास होता है, यह भी विकासवादी सिद्ध नहीं कर पाते । जोडवालो और
अस्थिवालोंके बीचमें भी कोई प्राणी है या नही, इसे भी वे नहीं जानते ।
अस्थिकी उत्पत्ति विकासद्वारा असम्भव है, यह बतलाया जा चुका है। घोड़ेमें स्तनोंका
अभाव क्यो, यह भी विचारणीय ही है । इस तरह शरीर-तुलना-शास्त्रसे
विकास सिद्ध नहीं होता।
परिस्थितिवश प्राणियोंके अङ्गोंका ह्रास-विकास कहा जाता है। 'ओपोसम,
डकब्रिल, पेग्विन, मोर, ह्वेल, शुतुरमुर्गके शरीरोंमे ऐसे चिह्न पाये जाते है, जिनसे
परिस्थितिवश शरीरोंमे ह्रास-विकास सिद्ध होता है।' परन्तु 'उक्त प्राणियोंके
अङ्गोंमें ह्रास-विकास हुआ' यह विकासवादी किस प्रमाणसे कहते हैं ? यह
कहना कहीं अधिक प्रामाणिक है कि उन-उन प्राणियोंके कर्मानुसार सुख-दुःख
भोगार्थ परमेश्वरने ही उन्हें वैसे-वैसे अङ्ग दिये। व्हेलके पैर कमजोर हो गये,
मोर, शुतुरमुर्गके पख कमजोर हो गये, परंतु यदि इससे पहले कभी वे
जोरदार पैरवाले और पखवाले देखे गये होते तो कुछ कल्पना भी हो सकती
थी। जब पानीमें तैरनेका काम देते हैं, तब इस कल्पनामें क्या प्रमाण है कि
'पहले वह स्थलचारी था, अब पानीमें रहनेसे पैर कमजोर हो गये ?' इसी तरह
मोर, शुतुरमुर्ग हैं। वे डील-डौलमें बड़े हैं, इनको पक्षियोंसे डर नहीं। फिर भी
स्थलचारियोंसे बचनेके लिये उनके पख हैं अतः 'परिस्थितिके कारण पैर कमजोर
हैं।' यह भी कहना व्यर्थ है। आज भी कुत्ता मोरको नोच डालता है, फिर
यह कैसे समझ लिया कि 'उसका कोई शत्रु नहीं है, उड़नेका काम न पड़नेसे
पख कमजोर हो गये ?' 'पक्षियोंसे स्तनधारी बने' यह कल्पना भी व्यर्थ है। जब
उड़नेकी अधूरी विमान-विद्यासे भी मनुष्य प्रसन्न है, तब पख पाकर भी पक्षी
उड़न-विद्याको क्यों छोड़ेंगे ? 'पक्षियोंका कोई शत्रु नहीं' क्या ऐसा कोई
समझदार व्यक्ति कह सकता है ? यदि आज भी पक्षियोंके शत्रु हैं ही, तो वे
अपने पखोंको बर्बाद कर पशु क्यों बन गये ? परिस्थितिसे न अङ्ग लुप्त होते हैं
और न तो नये उत्पन्न होते हैं। यदि परिस्थिति ही सब कुछ थी तो हथिनोको
दाँत क्यों नहीं हुए ? हथिनी और हाथी दोनों समान स्थितिमें थे ही। वस्तुतः
प्राणियोंके जाति, आयु और भोग उनके कर्मानुसार ईश्वरद्वारा ही प्राप्त होते हैं।
'भिन्न जातियोंके मिश्रणसे वंश चलता है' यह पक्ष भी गलत है।
अनेकों जातियोंका परस्पर मैथुन व्यर्थ होता है। कुछसे संताने उत्पन्न होती
हैं, पर वंश नहीं चलता। जिनमें वंश चलता है, वे अत्यन्त भिन्न जातिके
नहीं, अपितु समान जातिके ही होते हैं। सिंह-व्याघ्र एवं कुत्ते-भेड़ियेके मेलसे
संतानोंत्पत्ति यद्यपि होती है तो भी उनका आगे वंश नहीं चलता। देखते हैं
कि घोड़े-गदहेसे खच्चर उत्पन्न होते हैं, परंतु उनसे वंश नहीं चलता।
यही स्थिति कलमी आम, पेवंदी बेरकी भी है। यदि कलमी आमसे वृक्ष
पैदा हुए या सिंह-व्याघ्रके मेलसे वंश चला तो भी आगे चलकर वे
मूलजातिके रूपमें ही हो जाते हैं, धीरे-धीरे या तो व्याघ्र या सिंहकी ही
शकलमें हो जाते हैं। कलमी आम भी छोटा होते-होते तुखमी आमके ही
आकारका हो जाता है। विकाससे अलग जाति उत्पन्न हो सकती है,
परंतु वंश नहीं चलता। बच्चा तो दो स्त्रियोंके अन्योन्य मैथुनसे भी उत्पन्न होता है,
परंतु उसमें हड्डी नहीं होती, वंश नहीं चलता। अमेरिकामे विद्वान् लूथर बंकने
बहुतसे वृक्षोंकी कलमोंसे अनेक प्रकारके फल-फूल उत्पन्न किये हैं। यहाँ भी
सजातीय मिश्रणमें ही संततिका सिद्धान्त स्थिर है। समान जाति और समान
भोगवालोके ही सम्बन्धसे संतान उत्पन्न होती है और वश चलता है । अतएव
मास खानेवालो और घास खानेवालोके सम्बन्धसे भी वश नहीं चलता ।
प्रायः जाति, आयु, भोगके साथ ही प्रसवका सम्बन्ध रहता है। भोगोके
सम्बन्धमे परिस्थितिवादी कह सकता है कि 'अमुक जातिको जब जीनेके लिये
खुराक न मिली, तब वह मास खाने लगी।' परंतु प्रत्येक जातिकी नियत
आयुका क्या कारण है, यह विकासवादी नही बतला सकता । मनुष्य, बंदर,
गाय, बकरी, ऊँट, गधा और छोटे कीडोकी आयुका महान् अन्तर है । मनुष्य-
के समान ही उससे भी बलवान् पशुओकी सौ वर्षकी आयु क्यो नही, इसका
उत्तर भी विकासवादसे बाहर है । विकासवादके अनुसार पृष्ठवंशधारी प्राणियोमें
कच्छप एव सर्प भी सर्पणशीलोकी श्रेणीमें है । आयुष् शास्त्रियोके मतानुसार
कछुआ १५० वर्ष जीता है और सर्प १२० वर्ष जीता है। विकासवादके
अनुसार सर्पणशील प्राणी ही पक्षी बने हैं, परंतु पक्षियोमें कबूतर ८ ही वर्ष
जीता है। पक्षियोका विकास स्तनधारी प्राणी है, उनमें शशक ८ वर्ष, कुत्ता
१४ वर्ष, घोड़ा ३२ वर्ष, बंदर २१ और मनुष्य १०० वर्ष जीता है। यहाँ स्पष्ट ही
विकासमे आयुका ह्रास हो रहा है। दीर्घायु कच्छप एव सर्पको पराजित करनेवाला
कबूतर ८ ही वर्ष जीता है । इससे भी योग्य प्राणी शशक, कुत्ता, घोड़ा भी
क्रमशः ८, १४ और ३२ ही वर्ष जीते हैं। मनुष्योका जिसे पूर्वज कहा जाता
है, उस बदरकी आयु २१ वर्ष ही है । मनुष्य भी तो कच्छप एव सर्पसे कम
ही जीता है । विकासवादका कहना है कि 'जीवन सग्राममें योग्य ही रह जाता
है, उसीसे नवीन जातियोका प्रादुर्भाव होता है, परंतु जीनेके लिये संग्राम करके
विकसित होकर और योग्यता प्राप्त करके भी प्राणी उलटे मृत्युके अधिक निकट
पहुँच गये। जो पहिलेके और सरलरचनाके हैं, वे अधिक जीते हैं तथा जो
क्लिष्ट रचनाके हैं और बादके हैं, वे कम जीते हैं। यह क्या मशीनोका सुधार
है कि जो पहली १२० या १५० वर्षकी थी, वही सुधरी हुई मशीन ८ ही
वर्ष टिकने लगी । यह अच्छा यान्त्रिक विकास है ।
शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परम स्मृतम् ।
चतुस्त्रिशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥
पञ्चविंशति वर्षाणि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः ।
यह भी स्पष्ट है कि एक मिनटमें शशक ३८, कबूतर ३६, वानर ३२, कुत्ता
२९, बकरी २४, बिल्ली २५, घोड़ा १९, मनुष्य १३, हाथी १२, सर्प ८
और कछुआ ५ बार श्वास लेता है । यह भी विचारणीय है कि 'अभिनवतम मशीन
बन जानेपर पुरानी मशीनोका बनना बंद हो जाता है।' परंतु यहाँ तो मनुष्यके
विकसित हो जानेपर भी पुराने कीडे-मकोडोके बननेमे किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं
हुई । मनुष्योंसे करोड़ों गुने अधिक गिजाई, मच्छर, मकोड़े तथा जलजन्तु
हैं । सर्पणशील जन्तु तो पक्षी हो गये, परन्तु जोड़वाले कीड़ा, भौरों, ततैया,
मक्खी आदिके पंख किस तरह हो गये ? उड़नेवाली मछलियोंको पंख किस
तरह पैदा हो गये ? इनसे पक्षियोंके शरीरकी तुलना कैसे होगी ? कृमियों,
मछलियोंके साथ पक्षियोंका सम्बन्ध कैसे हुआ ? क्या कोई पक्षी इन पंखधारी
कीड़ों एवं मछलियोंसे वंश चलायेगा ? क्या बन्दर और मनुष्यसे वंश
स्थापित होगा ?
यह तो हो सकता है कि पहले सादी रचनावाले प्राणी बने हों और बादमें
क्लिष्ट रचनावाले प्राणी, किंतु सादी रचनावाले ही क्लिष्ट रचनावाले हो जाते हैं,
यह कहना निष्प्रमाण है । वैसे तो कीटावस्थामें भी उड़नेवाले कीड़ों और
मछलियोंकी पक्षियों-जैसी क्लिष्ट रचना देखी जाती है । कनखजूरे सरीखी क्लिष्ट
रचना साँपकी नहीं होती, तितलियोंकी-सी कारीगरी कौओंमें नहीं पायी जाती;
परन्तु विकासवादके अनुसार तितली और कनखजूरा कौवे तथा साँपसे पहले ही
उत्पन्न हो गये । ऐसी स्थितिमें सादी और क्लिष्ट रचनाका कुछ भी मूल्य नहीं
रहता । यदि विकासवाद तितलीकी रचनाको क्लिष्ट रचना न माने, केवल
अस्थिवाले प्राणियोंकी ही रचनाको क्लिष्ट रचना कहे तो यह भी निराधार है ।
देखनेमें तो अस्थिवाले प्राणियोंसे वृक्षोंकी ही रचना अधिक क्लिष्ट है । विचित्र
पत्रों, पुष्पों, स्तवकों, फलोंकी सुन्दरता, सरसता, मधुरता अस्थिवाले उष्ट्रमें
कहाँ है ? मनुष्यका शरीर भी वृक्षोंकी शाखाओं, उपशाखाओं, पल्लवों, पुष्पों,
फलोंकी विचित्रताके सामने नगण्य है । एक फूलके रंग, बनावट और
सुगंधके सामने मनुष्य-रचनाका कोई महत्त्व नहीं, परन्तु पशुओं,
पक्षियों-जैसी स्वतन्त्रता और मनुष्य-जैसा ज्ञान वृक्षोंमें नहीं है । इसीलिये वे
सादी रचनावाले समझे जा सकते हैं । कर्मानुसार प्राणी ही भोग्य और भोक्ता
होता है । सादी रचनावाले भोग्य और क्लिष्ट रचनावाले भोक्ता होते हैं । वनस्पति
यदि भागनेमें स्वतन्त्र हों तो पशु कैसे जी सकते हैं ? घोड़ा यदि मनुष्यसे
अधिक बुद्धिमान् हो तो वह सवारीके काम कैसे आ सकता है ? इस व्यवस्थाके
अनुसार पहले वनस्पति फिर पशु उत्पन्न होते हैं । पशुओंमें ही हाथीसे
लेकर कृमिपर्यन्त आ जाते हैं, अन्तमें मनुष्यकी उत्पत्ति हुई । यह सिद्धान्त
अति प्राचीन है और वेदों, उपनिषदों आदिद्वारा स्वीकृत है—भगवान्ने
अपनी अजा-मायाशक्तिके द्वारा विविध प्रकारके वृक्ष, सरीसृप, पशु, खग,
दंश, मत्स्य आदि शरीररूपी पुरोंको बनाया तो भी उनसे संतुष्ट न हुए । फिर
ब्रह्मज्ञान-सम्पादनयोग्य मनुष्यको बनाकर संतुष्ट हुए ।
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या
वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्
भा० ११।९। २१—
१६२ मार्क्सवाद और रामराज्य
तैस्तैरतुष्टहृदय. पुरुषं विधाय
ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः ॥
( भागवत ११ । ९ । २८ )
कहा जाता है कि संसारमे जितने प्राणी मिलते हैं, सब अनादि नहीं है।
पहले सीधी-सादी रचना हुई, पश्चात् क्लिष्ट रचनावाले प्राणी बने। भारतमें
व्याघ्र, सिंह होते हैं, इंगलैंडमें नही होते। साँप, बिच्छू आदि उष्ण-प्रदेशोमें
होते हैं, यूरोपके शीत-प्रदेशमें नही होते। जिराफ अफ्रीकामें और मोर भारतमे
ही होते हैं। जैसी भिन्नता पशु-पक्षियों, वनस्पतियोंमें होती है, वैसी ही मनुष्योंमें
भी होती है। आस्ट्रेलियामें यूरोपियनोंके जानेके पहले खरगोश नहीं थे, बादमें
जहाजसे पहुँचाये जानेपर वहाँ खरगोशोंकी बहुतायत होती गयी। गेलापेगस द्वीप विचित्र
प्राणियोंके लिये प्रसिद्ध है। वहाँ गोह, गिरगिट, छिपकली, सर्प तथा पक्षी-श्रेणीके
जन्तु बहुत हैं। इस प्रकारके जन्तु अफ्रीका, भारत, अमेरिकामे भी विद्यमान
हैं, परंतु सबकी अपेक्षा अमेरिकाके प्राणियोंके साथ गेलापेगसवाले प्राणियोंका
अधिक मेल है। ये अमेरिका निवासियोके वंशज हैं। अमेरिका इस द्वीपके
समीप है, इससे मालूम होता है कि कभी पूर्वमे जब अमेरिका और इस द्वीपकी
भूमि मिली रही होगी, तब अमेरिकासे प्राणी जाकर वहाँ रहने लगे होगे।
एक द्वीपसे दूसरे द्वीपमें, दूसरेसे तीसरेमे बसे। परिस्थितियोंके कारण कुछ भिन्नता
हो जाती है। वस्तुतः वे सब एक ही पूर्वजोकी संतति हैं। अफ्रीकाके समीप
स्थित नर्स द्वीपके प्राणियोंकी अफ्रीकाके प्राणियोंके साथ बहुत कुछ तुल्यता
है। प्रशान्त महासागर (पैसेफिक) के द्वीपोंमे घोंघोंकी अनेक जातियाँ हैं।
भूगर्भशास्त्री यह बतलाते हैं कि 'पूर्वकालमे इन द्वीप-समूहोंकी भूमि एकमे जुडी
थी। अर्थात् यह पहले महाद्वीप था, इसीसे सब घोंघोंका मेल है। सब एक
ही पिताकी संतति हैं।'
किन्हीं दो देशोके प्राणियोंकी भिन्नता और समानता दोनो प्रदेशोकी
दूरता और निकटतापर अवलम्बित है। दूर होनेसे भिन्नता होगी, समीपसे
समता होगी, किंतु कभी-कभी दूरस्थ प्राणियोंमें बहुत अधिक समानता होती
है। जैसे ब्रिटेन और जापानमें बहुत अन्तर होनेपर भी इन देशोके प्राणियोंमें बहुत
समानता है। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड बहुत पास पास हैं, परंतु वहाँके प्राणियोंमें
बहुत बड़ा वैषम्य है। अतः इनकी भेदक प्रकृति ही है। यदि दो नजदीकके
स्थानोको कोई पहाड़ जुदा करे तो एक जगहके नदी-नालेवाली मछलियाँ जैसी
होगी, उसी तरहकी दूसरी जगहवाली नहीं होगी, क्योकि मछलियाँ पहाड़
लाँघकर नहीं जा सकता। इसीलिये समीप होते हुए भी उन जीवोमे एक-
रूपता नहीं होगी। दूर-देश होनेपर भी यदि गमनागमन रहे तो समता अधिक
रहती है । ऐसे प्रमाणोंको देखकर विकासवादी कहते हैं कि 'सब प्रकारके
जीवित प्राणी एक ही जातिके आद्यवंशजोंसे उत्पन्न हुए हैं। इनके भिन्न-भिन्न
रूप परिस्थितियोंके अनुरूप बनते हैं।'
परंतु उपर्युक्त बातें विकासवादके लिये भयंकर हैं। जब प्रकृति हर जगह
मौजूद है, हर जगहके लिये जलवायु अनुकूल है, तब वहाँ अमीबा पैदा होकर
कोई नयी जाति क्यों नहीं बना डालता ? क्यों पुरानी ही सृष्टिके प्राणियोंमें
विकासवादकी स्वच्छन्द प्रकृति मत्था मार रही है ? भिन्न देशोंके प्राणियोंकी
समता सबके एक ही वंशके होनेकी सूचना देती है । परंतु यदि भिन्न देशोंके
प्राणियोंकी समता इस तरह की जाय कि बिल्ली और कुत्ता स्तनधारी एवं
मांसभक्षी हैं, अतः एक देशकी बिल्ली और दूसरे देशके कुत्तेको देखकर कह
दिया जाय कि दोनों ही प्राणी एक ही पिताकी संतान हैं, तो क्या ठीक
होगा ? किंतु यदि बुलडॉग, ताजी आदि कुत्तोंको देखकर कहा जाय कि
'एक ही पिताके पुत्र हैं', तो सत्य होगा । अतः केवल रचना देखकर ही
एक होनेका अनुमान नहीं किया जाना चाहिये । प्रत्युत समान प्रसव, समान
भोग एवं समान आयुका मेल मिलनेसे ही दोनोंके एक पिताके संतान होनेका
निर्णय किया जा सकता है।
कहा जाता है कि डार्विनको टेरोडेल्फिगोमें जब खर्वाकार मनुष्य दिखलायी
पड़े, तब वह विश्वास ही न कर सका कि ये भी मनुष्य ही हैं । जब उसने
गोरिल्ला और चिंपेंजी आदि वनमानुषोंको देखा, तब चिल्ला उठा कि 'ये भी
एक प्रकारके मनुष्य ही हैं।' डार्विनके इस भ्रमका कारण यही था कि उसने
केवल आकृतिसाम्यपर ही विश्वास किया, किंतु उस सृष्टि-नियममें समान-प्रसव-
का नियम आवश्यक है । तदनुसार खर्वाकार-दीर्घाकार मनुष्योंके संयोगसे संतति
होती है, परंतु मनुष्यो और वनमानुषोंके योगसे संतति नहीं होती । अतः
पहले दोनों एक जातिके हैं और दूसरे भिन्न जातिके। इसीलिये यद्यपि घोड़े और गधेमें
मनुष्यो और वनमानुषोंकी अपेक्षा अधिक समानता है, फिर भी खच्चरकी वंश-परम्परा
नहीं चलती । अतः घोड़े-गधे एक जातिके नहीं हैं । यह तो एक आस्तिकको
स्वीकृत हो सकता है कि एक ही जगह सृष्टि हुई और वहाँसे सब जगह जा-
जाकर प्राणी आबाद हुए; परंतु 'सब अमीबाका ही विकास है' यह सिद्धान्त
सर्वथा असंगत है । जैसे विभिन्न वनस्पतियोंके बीज पृथक्-पृथक् होते हैं, वैसे ही
सब प्राणियोंके बीज भी पृथक् ही थे । समानताका कारण दूरता एवं निकटता
नहीं, किंतु वंश और परिस्थिति ही कारण है ।
परिस्थितिके कारण ही बुलडॉग, ताजी आदि कुत्तोंमें भेद होता है । परंतु
१६४ मार्क्सवाद और रामराज्य
परिस्थितिवश साँप ऊँट नहीं हो जाता । यदि एक ही प्राणीका यन्त्रोकी तरह
अनेक योनियोंमें विभाग माना जाय तो अनेक आपत्तियाँ होगी ।
१-एक कोष्ठके अमीवामें स्त्री और पुरुष यह भेद कैसे हुआ ?
२-यदि अमीवाके बाद दो कोष्ठका हाइड्रा हुआ, तो क्रमसे उत्तरोत्तर
सभी योनियों दुगुने परिमाणसे बढ़नी चाहिये अर्थात् वजन और आकार आदि
उत्तरोत्तर दुगुने होने चाहिये । फिर तो मनुष्यको हाथी, ऊँट आदिसे कई गुना
बड़ा होना चाहिये । पखधारी प्राणी सर्पणशील प्राणियोंके बाद होता है, फिर
तितली आदि क्रिमि पखधारी कैसे हो गये ? अस्थियोकी उत्पत्ति कैसे हुई ?
अस्थिहीनोंसे अस्थिवालोंकी उत्पत्ति कैसे हुई ? जब पक्षी, जल-जन्तु एव कीड़ेतक
मांसाहारी होते हैं, तब मांसाहारियोका समावेश स्तनधारियोंमें ही क्यो किया
गया ? एक ही परिस्थितिमें उत्पन्न होनेपर भी स्त्रियोंको दाढ़ी-मूँछ क्यो नहीं ?
मयूरीको लंबी पूँछ क्यो नही ? मुर्गीके सिरपर कलँगी क्यो नही और हथिनीको
बड़े दाँत क्यो नहीं ? प्राणियोके दाँतोकी संख्यामें न्यूनाधिकता क्यो ? घास
खानेवाले स्तनधारियोंमें गाय, भैसके ऊपरी दाँत क्यो नहीं ? घोड़ेके ऊपरी दाँत भी क्यो
होते हैं ? कुत्तोके दूधके दाँत क्यो नही गिरते ? घोड़ेके स्तन क्यो नहीं होते ? बैलके
स्तन अंडकोषोके पास क्यो होते हैं ? पुरुषोमे स्तनोंका क्या प्रयोजन है ? घोड़ेके
पैरमें परोके चिह्न क्यो हैं ? बच्चा पैदा होते समय घोड़ीकी जीभ क्यो गिर जाती
है और दूसरे जानवरोकी जीभ क्यो नहीं गिरती ? स्त्री जाति अस्थियाँ क्यो नही
उत्पन्न कर सकती ? यदि यन्त्रके सिद्धान्तपर प्राणियोका विकास हुआ है तो कछुए
और साँपकी अपेक्षा पक्षी और स्तनधारी क्यो कम जीते हैं ? अधिक जीनेवालोका
कम जीनेवालोसे गर्भवास कम क्यो है ? अतः परिस्थितिसे ही प्राणी एक जातिसे
अन्य जातिका नहीं हो जाता । कोई प्राणी अपनी मूलजातिसे इतनी दूर नही हो
सकता जहाँ समान-प्रसव, समान-भोग, समान आयुका सिलसिला भी बंद
हो जाय । स्त्री पुरुषकी बनावट भी परिस्थितिके सिद्धान्तका खण्डन करती है ।
आयुके सिद्धान्तसे ही यान्त्रिक सिद्धान्त खण्डित होता है ।
लुप्त-जन्तु
यह भी कहा जाता है कि 'पृथ्वीकी तहोमे लुप्त हुए पाषाणमय प्राणियो-
की खोजसे भी विकास सिद्ध होता है । प्राणियोकी शृङ्खलाकी कुछ कड़ियाँ
नहीं मिलती क्योकि वे आज लुप्त हो चुकी हैं। 'लुप्त-जन्तु-शास्त्र' से वर्तमान-
कालमें अविद्यमान लुप्त जन्तुओंका पता लगाया जाता है । एल० म्यूजियममे
घोड़ेकी, साउथ कैन्सिगटनमें हाथी-दाँतोकी, ब्रूसेल्समें इग्वेनोडसकी और
क्रिस्टल् पैलेस, न्यूयार्क, लन्डन, जेयनामें अन्य प्राणियोकी पाषाणीभूत
प्राप्त अस्थियाँ एकत्र की गयी हैं । घोड़ेकी समस्त कड़ियाँ ठीक हो गयी हैं ।
'आर्किओप्टेरिक्स' नामका एक ऐसा प्राणी मिला है जिससे सर्पवर्ग और पक्षीवर्गके
बीचकी कड़ी सिद्ध हो जाती है । अस्थिहीन प्राणी मरनेपर मिट्टीमें मिल जाते
हैं। पर अस्थियुक्त प्राणियोंकी हड्डियाँ मिट्टीमें नष्ट नहीं हो जातीं, हजारों वर्ष
पुरानी हड्डियाँ मिलती हैं । इन्हें ही 'फौसिल' कहते हैं । इनसे सब कड़ियाँ
पूरी हो सकती थीं, परंतु पृथ्वीके अधिक भागमें समुद्र होनेके कारण एवं
शीत-उष्ण कटिबंधोंमें सर्दी-गर्मीकी अधिकताके कारण खुदाईका काम हो ही
नहीं सकता । अच्छे स्थानोंसे भी कुत्ते, शृगाल आदि अस्थियोंको नष्ट कर देते
हैं । इन्हीं कारणोंसे 'लुप्त जन्तु-शास्त्र'के पूर्ण प्रमाण नहीं मिलते । प्राकृतिक
परिवर्तनों, नदियोंके कटावों, अग्नि, प्रपातोंसे बहुत-सी हड्डियाँ गल गयीं; बहुत-
सी जल गयीं, बहुत-सी पिघल जाती हैं । बिना हड्डीवाले जन्तु तो नष्ट हो ही जाते
हैं । पृथ्वीकी विभिन्न तहोंमे उपलब्ध अस्थियोंसे उन प्राणियोंके समयका निर्णय
करना 'लुप्त-जन्तु-शास्त्र' का मुख्य विषय है ।'
"परंतु पृथ्वीकी आयुका निर्णय करनेके लिये काल्पनिक सिद्धान्तोंके
अतिरिक्त वैज्ञानिकोंके पास कोई प्रबल साधन नहीं है । पृथ्वीकी आयुके
सम्बन्धमें भूगर्भ-शास्त्रके अनुसार प्राणियोंकी उत्पत्तिसे अबतक (दस करोड़)
वर्ष हुए । वैज्ञानिक सूर्यकी गरमीके आधारपर जो समय निकालते हैं, वह इससे
कम है, किंतु प्रो० पेरीने रेडियमकी खोजसे जो समय निकाला है, वह बहुत
अधिक है । 'भूगर्भ-विद्याके अनुसार पृथ्वीकी चार तहें हैं । सबसे निचली तहमें
हड्डीरहित प्राणी रहे होंगे । दूसरी तहमें प्राणियोंकी अस्थियाँ हैं, पर वे प्राणी
मत्स्य-मण्डूक श्रेणीके हैं । तीसरी तहमें उन्नत प्राणियोंकी भी अस्थियाँ पायी जाती
हैं । चौथी तहमें वर्तमान कालके सभी प्रकारके प्राणियोंके अवशेष पाये जाते
हैं । इससे सिद्ध होता है कि जिस कालमें जो प्राणी थे केवल वही थे और वड़े
विशालकाय थे । उनकी अनेक उपजातियाँ भी थीं । जब मत्स्य थे, तब सर्प
नहीं थे । सर्पके समयमें सब सर्प ही थे । किसी समय अनेक जातिकी
छिपकलियाँ थीं, जो ८० मनतककी बतलायी जाती हैं, यह उनकी हड्डियाँ देखनेसे
सिद्ध होता है । मिस्र देशमें प्राणियोंके सिर भी मिलते हैं, जिनमें मांस,
चर्म-नस, नाड़ी आदि सभी अवयव विद्यमान हैं । 'मत्स्यपुराण' में आयी
उड़नेवाले सर्पोंकी कथा गलत नहीं ।
"इन सर्प-श्रेणीके पक्षियोंसे ही पक्षियोंकी उत्पत्ति हुई है। जर्मनीमें पाषाणीभूत
घोंघोंके कवच अनेक तहोंमें मिलते हैं । उनसे विकास-क्रमका पता लगता
है । घोड़ेके विकासका भी क्रम मिलता है । भिन्न-भिन्न तहोंमें मिले हुए प्राणियोंके
पंजों और सुमों (घोड़ोंके अवयव-विशेष) के मिलानसे पता लगता है कि
१६६ मार्क्सवाद और रामराज्य
'घोडे किन प्राणियोसे विकसित होकर इस रूपमे आये हैं।' ऊपरकी तहमें
वर्तमान घोडे-जैसा ही जन्तु मिलता है । मध्य-स्तरमें वह ३-४ अंगुलीवाला
मिलता है । निचली तहोंमें उसका आकार शशकके समान और ५ अंगुलीवाले
पंजोंका मिलता है । गाय, भैंसको पाँचमेंसे जिस तरह चार ही अंगुलियाँ रह
गयीं, उसी तरह इस जानवरकी भी अगुलियाँ क्रमशः घटते-घटते बीचकी
अँगुली टाप बन गयी । घोडेके आदिपूर्वजका अबतक पता नहीं लगा;
परंतु ज्ञात होता है कि वह पाँच अंगुलीवाला था । इसी तरह हाथी और हरिणके
आद्यवशंजोसे लेकर वर्तमान समयतककी विकास परम्परा ज्ञात होती है । लुप्त
कड़ियोंका उदाहरण 'ओप्टेरिक्स' है । यह पखयुक्त उडनेवाला सर्प है। इसका
सिर छोटा, जबडा बडा और दाँत साँप जैसे हैं; परंतु पंख एव पजे पक्षियो-
सरीखे हैं । इसी तरह एक प्राणी 'टेरोडिक्टिल' है । इसके हाथोकी एक-एक
अगुंली बहुत बड़ी है, जिससे पखको सहारा मिलता है । इसमें सर्प, पक्षी तथा
स्तनधारियोकी थोडी-थोडी बाते मिली हुई हैं । इसी प्रकार कँगारू, ओपोसम
आदि इस अन्वेषणमें सहायक हैं।"
उपर्युक्त बातोपर विचार करनेपर भी विकास सिद्ध नही होता । यह सिद्ध
है कि वर्तमान साधनोसे पृथ्वीकी आयुका पता नहीं लगता और सारी पृथिवीका
खोजना भी सम्भव नहीं । अस्थियोका नष्ट हो जाना, पिघल जाना आदि भी
सम्भव है । फिर इस लुप्त-शास्त्रके बलपर विकासवाद कैसे सिद्ध होगा ?
अस्थियोके मेलका सिद्धान्त भी गलत है । यदि घोड़ा, गधा, जेब्रा एक ही
जगह मिले तो विकासवादी तीनोंके पजरोको एक ही कह सकता है । फिर भी
तीनो एक नहीं, अतः अस्थियोके मेल मिलाकर शृङ्खला मिलाना असगत है ।
'घोडेकी कडियाँ मिल गयीं' यह बात भी गलत है । घोड़ेकी कड़ियोपर
विकासवादियोका दृढ़ विश्वास है । यूरोप, अमेरिकाकी खुदाईसे मिले हुए भिन्न
समयोंके विचित्र जातिके अस्थि-पंजरोको मिलाकर यह दिखलानेकी कोशिश
की जाती है कि 'ये सब घोडेके पूर्वज उसके विकासकी कड़ियाँ हैं ।' हक्सले
साहबने इसे महत्त्व दिया है; परंतु आधुनिक खोजसे इसका खण्डन हो गया ।
सर जे० डब्ल्यू० डासनने अपनी 'माडर्न आइडिया ऑफ इवोल्यूशन'
(विकासकी आधुनिक भावना) नामक पुस्तकसे अच्छी तरह सिद्ध किया है कि
'अमेरिका एव यूरोपके इन जन्तुओमें जिन्हें घोड़ेका पूर्वज कहा जाता है, परस्पर
कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ।' घोड़ा बड़ा ही विचित्र जानवर है। पाँच बाते उसमें अन्य
तृणाहारी पशुओंसे विलक्षण हैं- (१) नीचे-ऊपर दोनो तरफ दाँत, (२)
प्रसवके समय घोडीकी जीभका गिरना, (३) घोड़ेके अगले पैरोके गाँठोंमें
परोंका निशान होना, (४) नर घोड़ेके स्तन न होना और (५) खुरकी
जगह टाप होना। कहा जाता है कि 'घोड़ेकी चार अंगुलियाँ लुप्त हो गयीं;
बीचकी अँगुली टाप बन गयी । गाय-भैंसके अगल-बगलकी चार अंगुलियाँ
मौजूद हैं, बीचवाली लुप्त हो गयी ।' जो अँगलियाँ विद्यमान हैं, उनमें दो
तो फटे हुए खुरको बतलाया जाता है और दो उठी हुई मदनखुरी
बतायी जाती है । यह कैसा उलटा-पुलटा विकास ? किसीमें चारों
अंगुलियाँ लुप्त होकर बीचकी अँगुली टाप बन गयी तो किसीमें सब रहीं,
केवल बीचकी ही लुप्त ! गधे, घोड़े और खच्चरके पञ्जरोंमें धोखा हो सकता है,
वनबिलाव और चीतेके बच्चेके पंजरोंमें भी धोखा हो सकता है । इसी तरह
सभी पंजर मिलनेवाली जातियोंको एक ही जातिके स्थिर करनेमें भी धोखा
हो सकता है । मि० डे० क्वाडर फेगस अपनी 'लेस अम्यूलस डे डारविन'
पुस्तकमें लिखते हैं कि 'घोड़ोंकी कड़ियाँ न तो इस प्रकारके जिंदा जानवरोंसे
पूरी होती हैं और न प्रस्तरीभूत अस्थिपञ्जरोंसे ही । ऐसे प्राणियोंका अस्तित्व
कल्पनामात्र है ।' इसी तरह जोन्म वोसनने नवम्बर सन् १९२२ ई० के 'न्यू एज'
पत्रमें लिखा है कि 'ब्रिटिश म्यूजियमका अध्यक्ष कहता है कि “इस म्यूजियममें
एक कण भी ऐसा नहीं, जो यह सिद्ध कर सके कि जातियोंमें परिवर्तन हुआ
है । विकासविषयक दर्शनमें नौ बातें निःसार हैं । परीक्षणका आधार
स्वच्छन्दता और निरीक्षणपर बिल्कुल अवलम्बित नहीं । संसारभरमें ऐसी कोई
सामग्री नहीं, जो विकास-सिद्धान्तकी सहायक हो ।' इस तरह लुप्त-जन्तु-शास्त्रके
आधारपर विकासका सिद्ध होना असम्भव हो गया है ।
यदि विकास होता तो बर्फीले स्थानोंमें कोई साङ्गोपाङ्ग ऐसा प्राणी
मिलता, जिससे विकास सिद्ध होता । पृथ्वीकी तहोंकी आयुका भी अभी
हिसाब नहीं बैठा । तहोंके प्रस्तरीभूत प्राणियोंकी आयु जाननेके लिये तहोंकी
आयुका जानना आवश्यक है । जब पृथ्वीकी ही आयुका ठीक ज्ञान नहीं,
तब तहकी आयुका ज्ञान कैसे होगा ? फिर एक तहके प्राणी कितने समयमें
प्रस्तरीभूत हुए, यह जाननेका क्या साधन है ? आधुनिक विज्ञान यह भी
नहीं बतला सकता कि मनुष्योंको पैदा हुए कितने दिन हुए । फिर समस्त
कड़ियोंकी वर्ष संख्या मिलाकर पृथ्वीकी आयुके साथ मेल बैठानेका
विकासवादियोंके पास कोई साधन नहीं । पृथ्वीकी अमुक बनावट किन साधनोंसे
होती है, उन साधनोंका निर्माण किससे होता है, इन बातोंतक अभी विज्ञान
पहुँचा ही नहीं । यदि जगत्की रचनाके कारणोंका ज्ञान, उन कारणोंकी
गति, शक्ति तथा परिणामके मापका ज्ञान होता, तो पृथ्वीकी आयु निश्चित
होती । परंतु इनका ठीक ज्ञान नहीं । कल्पनाके द्वारा निकाला सिद्धान्त
विश्वसनीय नहीं होता । अगस्त सन् १९२३ के 'थियोसोफिकल पत्र' में हैनसनने
१६८ मार्क्सवाद और रामराज्य
लिखा है कि 'नेवादा में जॉन टी० रीडको एक आदमीका पदचिह्न और एक
अच्छी तरह बना हुआ जूतेका तला मिला है, जिसे वह अपने चट्टानविषयक
भूगर्भ-विद्या-सम्बन्धी ज्ञानसे ५० लाख वर्ष पुराना बतलाता है। उस तलेमें ऐसी
सिलाई, धागोंके मरोड़ और धागोंके माप मिलते हैं, जो आजकलके अच्छे-से-अच्छे
बने हुए जूतोंके समान पक्के और सूक्ष्म हैं। इससे सिद्ध हुआ कि ५० लाख वर्षसे
तो मनुष्य जूता पहनता है और वह सुई, सूत, सिलाई, नपाईका ज्ञान प्राप्त कर
चुका था।' विकासके अनुसार यह ज्ञान बहुत दिनोंमें हुआ होगा। इस
विचारसे मनुष्यकी उत्पत्तिका समय आजसे यदि एक करोड़ वर्ष पूर्व माने और
हेकलके मतानुसार प्राणियोंकी २१ कड़ियोंके बाद मनुष्यकी उत्पत्ति माने एवं
प्रत्येक कड़ीको यदि एक करोड़ वर्षका समय दे तो प्रथम प्राणीकी उत्पत्तिसे
मनुष्यकी उत्पत्तितक २२ करोड़ वर्ष और आजतक २३ करोड़ वर्ष होते हैं।
लोकमान्य तिलक ने 'गीता-रहस्य'में डॉ० गेडाका मत उद्धृत करते हुए लिखा है कि
'मछलीसे मनुष्य होनेमें ५३ लाख ७५ हजार पीढियाँ बीती हैं। इतनी ही पीढियाँ
अमीबासे मछली बननेमें बीती होगी अर्थात् अमीबा अबतक लगभग एक
करोड़ पीढियाँ बीती। कोई पीढ़ी एक दिन, तो कोई सौ वर्ष जीती है। यदि
औसत प्रति पीढ़ी २५ वर्ष भी मान ले तो इस हिसाबसे भी प्राणियोंकी उत्पत्ति-
का समय २५ करोड़ वर्ष होता है।' यह भी सिद्ध है कि पृथिवी उत्पन्न होनेके
करोड़ों वर्ष बाद उसपर प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई होगी। यह संख्या विकास-
वादियोंकी निर्धारित संख्यासे बहुत आगे जाती है।
विकासवादी पृथिवीकी प्राणियोंवाली तहोंकी आयु १० करोड़ वर्ष बतलाते
हैं। वे अमीबाको सादी रचनावाला कहते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं है। वह
तो क्लिष्ट रचनावाला ही प्राणी है। अपने शरीरमें हर जगह छिद्र कर लेना क्या
साधारण बात है ? वनस्पतिकी ही रचना सादी है। सिद्धान्ततः भोग्य सादी
रचनावाले और भोक्ता क्लिष्ट-रचनावाले हैं। पृथिवीकी नीचेवाली तहमें हड्डीवाले
प्राणी नहीं मिलते, अतः कहा जाता है कि 'पहले बिना हड्डीवाले प्राणी हुए।'
परंतु इसपर यह भी तो कहा जा सकता है कि 'पृथिवीके दबावसे नीचेवाली तह
तथा उसके साथ हड्डियाँ भी पिघल गयी होगी।' अतः 'पहले हड्डियाँ नहीं थीं'
यह कल्पना भी गलत है। फिर इससे यह सिद्ध नहीं होता कि अस्थिहीनोंसे ही
अस्थिवालोंकी उत्पत्ति हुई। हड्डी अपने आप ही उत्पन्न होती है यह पीछे कहा
जा चुका है। यदि यह सत्य हो कि 'जिस समय जो प्राणी थे, वही थे और वे
भीमकाय थे,' तो वर्तमान प्राणियोंका उनसे उत्पन्न होना सिद्ध नहीं होता।
किंतु सबसे प्रथम उत्पन्न एक कोष्ठवाला अमीबा भी अबतक मौजूद है। इतना
ही नहीं, वे अन्तिम प्राणी मनुष्यसे भी अधिक हैं। अतः यह सत्य नहीं है कि