मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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इसीलिये एक आधुनिक वैज्ञानिक अपनी ‘प्रिंसिपल्स ऑफ जुआलोजी’
( प्राणिविज्ञानके सिद्धान्त ) पुस्तकमें लिखता है कि ‘पृथ्वीपर उत्पन्न बिना
हड्डीके जन्तुओं और मनुष्यादि हड्डीवाले प्राणियोंमें एक समान ही उन्नति देखी
जाती है, परन्तु इस समानताका यह अर्थ नहीं कि एक प्रकारके प्राणीसे दूसरे
प्रकारके प्राणी विकसित हुए हैं । आदिम मत्स्य ही सर्पणशील प्राणियोंका
पूर्वज नहीं और न मनुष्य ही अन्य स्तनधारियोंसे विकसित हुआ है । प्राणियोंकी
शृङ्खला किसी अभौतिक तत्त्वसे सम्बन्ध रखती है, जिसने पृथ्वीपर अनेक
प्रकारके प्राणियोंकी सृष्टि करके अन्तमे मनुष्यको बनाया है—‘ब्रह्मावलोकधिषणं
सुदमाप देवः । ( श्रीमद्भा० ११ । ९ । २८ ) इसके अतिरिक्त परमेश्वरका अस्तित्व
माननेपर प्रकृतिकी स्वतन्त्रताका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता । फिर तो अनादिसिद्ध
जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार उनके सुख-दुःखादि फल-भोगार्थ ही देहका
निर्माण अपेक्षित होता है । सुख-दुःखकी न्यूनता-अधिकता देहकी बनावटपर
निर्भर है । इस दशामें जिन प्राणियोंको उनके कर्मानुसार जैसा सुख-दुःख देना
है, सीधे तदुपयोगी ही शरीरका निर्माण आवश्यक है । व्यर्थ असंख्य शरीरोंमें
घुमा-फिराकर जीवको उस शरीरमे लाना परमात्माके लिये उचित नहीं ।
कर्मफलोंको भोगानेके लिये यदि किसी अपराधीको तीन मासकी कालकोठरीकी
सजा देनी है, तो पुलिस उस व्यक्तिको वर्षों इधर-उधरकी हवालातोंमें
भटकाती फिरे, यह न्याय नहीं । अतः ईश्वर एवं जीव-तत्त्व मान लेनेपर फिर
क्रम-विकासका कोई भी स्थान नहीं रह जाता ।
विकास-सिद्धान्तकी मान्यता है कि ‘चेतनकोष्ठसे प्राणी बनता है । इन्हीं
चेतनकोष्ठोंसे समस्त प्राणियोंकी रचना हुई । इन सब जीवित प्राणियोंमें तीन
सामान्य बातें हैं—( १ ) सब प्राणियोंके शरीर एक ही सरल पदार्थोंसे बने
हैं । पशु-पक्षियोंके शारीरिक तत्त्वोंमें कोई अन्तर नहीं । ( २ ) सब प्राणी अपनी
क्षीण शक्ति फिरसे प्राप्त कर लेते हैं । प्रतिदिन काम करके श्रान्त होते हैं,
विश्रामके अनन्तर पुनः ताजे हो जाते हैं । ( ३ ) यन्त्रोंकी भाँति सुधरते-सुधरते
एक शरीरसे अन्य शरीरवाले होते हैं । सब प्राणियोंके आठ स्थान होते
हैं—( १ ) पोषण—बाहरसे पदार्थ लेना, पचाना और सारे शरीरमे
पहुँचाना, ( २ ) श्वासोच्छ्वास, ( ३ ) मलत्याग, ( ४ ) रक्तप्रसार, ( ५ )
प्रेरणा, ( ६ ) आधारस्थान ( जिससे शरीर सधारहता है ), ( ७ ) ज्ञानतन्तु (जिससे
समस्त शरीरका हाल मालूम होता है ) और ( ८ ) प्रसव । इस तरह सब
प्राणियोंके तत्त्व एक-से हैं और आठ स्थान भी एक-से होते है । किंतु ये सब बाते
भारतकेलिये कोई नयी खोज नहीं हैं। यहाँका एक गँवार भी जानता है कि ‘पंच रचित
यह अधम सरीरा ।’ जो जीते, खाते, काम करते तथा संतति उत्पन्न करते हैं, उनमें