मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 755, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरते हैं और उन्हींके आधारपर सिद्धान्त गढ़ते हैं । परंतु घटनाएँ अनुकूल-प्रतिकूल,
इष्ट-अनिष्ट दोनों ही ढंगकी होती हैं। चोरी, हिंसा, दुराचार आदिका भी कभी
विकास होता है, उसमें भी क्रम होता है, फिर भी वह सिद्धान्त नहीं बन जाता ।
व्यक्तिगत रूपसे तथा समाजगतरूपसे कभी विकास होता है और कभी ह्रास भी
होता है, इसीमें प्रमाद एवं पुरुषार्थका उपयोग होता है । जिस मजदूर-समाजको
मार्क्सने विकासोन्मुख माना है, उसकी ही अनुभूयमान हालत बहुत ही चिन्तनीय
है । मशीनयुगके कारण बेकारीकी भी समस्या खड़ी हुई समझी जाती है । विद्या-
बुद्धिका भी विकास नहीं कहा जा सकता है । फिर भी मार्क्स सर्वहाराका राज्य
अवश्यम्भावी कहता है । वह किसानको उदीयमान वर्ग नहीं मानता था । परंतु
चीनकी क्रान्तिमें किसानवर्ग उदीयमान वर्ग सिद्ध हो गया । यदि इसी प्रकार
किसी अन्य वर्गका उदय हो जायगा तो मार्क्सकी अन्य भविष्यवाणियाँ भी झूठी
सिद्ध हो जायेंगी ।
मार्क्सकी ऐतिहासिक कल्पनाएँ और तदनुसारी नियम-निर्धारण सहस्रों नहीं
सैकड़ों वर्षोंके ऐतिहासिक अनुभवोंके आधारपर हैं, परंतु अध्यात्मवादियोकी
धरित्री और उसका इतिहास सहस्रों, लक्षों नहीं अपितु अरबों वर्षोंके हैं । वहाँका
यह व्यापक नियम है कि शुभ कर्मोंसे सुख एवं तत्साधनोंकी समृद्धि होती है और
अशुभ कर्मोंसे दुःख एवं तत्साधनोंकी समृद्धि होती है । बुद्धिमानी, सावधानी एवं
तत्परतासे कर्तव्यपरायण होनेपर समृद्धि बढ़ती है और अविवेक, असावधानी
तथा प्रमादसे असमृद्धि बढ़ती है । धन-धान्य-समृद्धि बढ़नेसे जीवनस्तर उन्नत
होता है । प्रमादहीन होनेसे समृद्धिके कारण विद्या, विवेक, कला, काव्य,
संस्कृतिका विकास होता है । प्रमादयुक्त होनेसे समृद्धिके परिणामस्वरूप अनाचार,
दुराचार, भ्रष्टाचारकी वृद्धि होती है । असमृद्धिमें भी प्रमाद होनेपर अनाचार,
दुराचार आदि बढ़ते हैं और प्रमादहीन होनेसे असमृद्धि-दशामें भी विद्या, विवेक,
तपस्याका विस्तार होता है । विश्वकर्मा एवं मयकी शिल्पकला शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है ।
'समराङ्गण-सूत्रधार' के रचयिता भोजका काल ईसाकी १० वीं शतीमें माना जाता
है । उस ग्रन्थमें अनेक प्रकारके कला-कौशल, वायुयान आदिका वर्णन मिलता
है । राज्यधर तक्षा ( बढ़ई ) के द्वारा निर्मित वायुयान एक कीलके आघातसे आठ
सौ योजन चल सकता था । उस तक्षाद्वारा निर्मित यन्त्रमय महानगरके सभी
व्यवहार यन्त्रसे ही होते थे, तो भी तत्कालीन लोगोंके विचारों, सिद्धान्तोंमें कोई
अन्तर नहीं पड़ा । इसका उल्लेख 'कथासरित्सागर' में मिलता है । 'रामायण'
'महाभारत' के अनुसार बहुत विशाल पुष्पकयान आधुनिक सभी वायुयानोंसे
अधिक विशाल, कलापूर्ण, द्रुतगामी तथा निरापद था । ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र
आदि अस्त्र-शस्त्रोंका मुकाविला तो आधुनिक हाइड्रोजन बमसे करोड़ोंगुना अधिक
घातक अस्त्र बनाया जाय, तो भी नहीं किया जा सकता । तब भी उन