मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐतिहासिक भौतिकवाद ४२१
परिवर्तनके कारण
मार्क्सके मतानुसार 'परिवर्तनका कारण न तो भौगोलिक अवस्था ही है
न जनसङ्ख्या ही, क्योंकि यूरोप सदियोंसे अपरिवर्तनशील रहा है, फिर भी वहाँ
पंचायती व्यवस्था, दासप्रथा, सामन्तवादी, पूँजीवादी व्यवस्था आदि अनेक
परिवर्तन हुए । जनसङ्ख्या भारतमें इंग्लैंड, अमेरिकासे अधिक होनेपर भी वहाँ
इतने परिवर्तन नहीं हुए ।' स्टालिनका कहना है कि 'ऐतिहासिक भौतिकवादके
अनुसार आवश्यक जीवन-साधनोंको प्राप्त करनेकी प्रणाली ही सामाजिक परिवर्तन-
की नियामक शक्ति है । व्यक्तिको जीवित रहनेके लिये भौतिक मूल्यों (वस्तुओं)
की आवश्यकता पड़ती है । उत्पादनके सिलसिलेमें वह अन्य व्यक्तियोंसे सम्बन्ध
स्थापित करता है । यह उत्पादन स्वेच्छापर आश्रित नहीं होता, किंतु उत्पादन-
शक्तियोंके रूपपर ही आश्रित रहता है । उत्पादन किसी अवस्थामें देरतक
स्थिर नहीं रहता, अपितु विकासकी दिशामें उसका परिवर्तन होता रहता है ।
उत्पादन-पद्धतिमें परिवर्तन होनेसे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था, विचारों, राजनीतिक
मतों और राजनीतिक संस्थाओंमें परिवर्तन अवश्यम्भावी हो जाता है ।'
मार्क्सके शब्दोंमें 'सामाजिक सम्बन्ध उत्पादक शक्तियोंसे जुड़े हुए होते
हैं । नयी उत्पादक शक्तियोंके अर्जनमें मनुष्य अपनी उत्पादन-पद्धति बदल देते
हैं । अपनी उत्पादन-पद्धति तथा अपनी जीविकोपार्जनकी प्रणाली बदलनेमें वे
सभी सामाजिक सम्बन्धोंको परिवर्तित करते हैं । हाथकी चक्कीकी अवस्थामें
सामन्तशाही सामाजिक सम्बन्ध व्याप्त होते हैं । भापसे चलनेवाली चक्कीमें वह
समाज बनता है, जिसमें औद्योगिक पूँजीपतियोंका प्रभुत्व होता है । सामाजिक प्रगति-
में विचारों, सिद्धान्तों, मतों और संस्थाओंका भी स्थान होता है । ये सब भौतिक
जीवनपर तो अवश्य आश्रित होते हैं, किंतु इनका सामाजिक शक्तियोंके
समेटने, संघटित करनेमें महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । नये विचार, नये सिद्धान्त
और नयी भौतिक परिस्थितियोंमें उत्पन्न इनके द्वारा जनसाधारणको भौतिक
त्रुटियोंका ज्ञान होता है । यह विचार सामाजिक परिवर्तनमें बहुमूल्य होते हैं ।
इन्हींके आधारपर जनता उन शक्तियोंका विध्वंस करती है, जो प्रगतिमें बाधक
होती हैं ।'
अध्यात्मवादी रामराज्यके मतानुसार कोई मौलिक सिद्धान्त एवं विचार
नये नहीं होते हैं । असत्का अर्थात् अत्यन्त अविद्यमानका कभी भाव नहीं होता,
सत्का अर्थात् विद्यमानका कभी अभाव नहीं होता—'नासतो विद्यते भावो नाभावो
विद्यते सतः।' (गी० २ । १६) तिलमें तेल है तभी वह प्रकट होता है । सिकतामें तेल
नहीं होता है, अतः लाख प्रयत्न करनेपर भी सिकतासे कभी तेल प्रकट नहीं
होता । मार्क्सवादी कुछ प्रादेशिक घटनाओंके आधारपर कार्य-कारण-भाव निश्चित