सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 553

शुद्ध चैतन्यमें 'अहं' का प्रयोग निर्णय किया गया है। वैसे ही जहाँ भी अहमर्थकी
व्यापकता सुनायी दे, वहाँ व्यापक चैतन्य ही 'अह' का अर्थ समझना चाहिये ।
कुछ लोग कहते हैं कि 'अहंकारश्चाहं कर्तव्यश्च' इत्यादि स्थलोंमें महत्तत्त्वका
कार्य और मन आदिका कारण अहन्तत्त्व लिया गया है । 'महत्तत्त्वाद्धिकुर्वाणाद्भ-
गवद्वीर्यसंभवात् । क्रियाशक्तिरहंकारस्त्रिविधः समपद्यत' ( श्रीमद्भा० ३ । २६ । २३ )
इत्यादि वचनोंके अनुसार यह सात्त्विक, राजस, तामस—त्रिविध अहकार
आत्मस्वरूप अहमर्थसे सर्वथा भिन्न है । यदि अहमर्थ और अहंकारमें भेद न माना
जायगा, तब तो इसी तरह 'बुद्धिरव्यक्तमेव च' ( गीता १३ । ५ ) इस वचनमें भी
विवाद खड़ा हो सकेगा । यहाँ 'बुद्धि' पद क्षेत्रान्तर्गत दृश्यविशेषके लिये आया
है । परंतु यदि 'बुद्धि' शब्दसे संवित् ( स्वप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा ) का बोध हो,
तब तो संवित्का भी क्षेत्रकोटिमें ही परिगणन होगा । अतः कहना होगा कि भले ही
कहीं 'बुद्धि' और 'ज्ञान' पदसे संवित् या आत्मा कहा जाय, पर 'बुद्धिरव्यक्तमेव
च' इस क्षेत्रस्वरूपके निरूपण-प्रसङ्गका 'बुद्धि' शब्द संवित्का बोधक नहीं
है । ठीक इसी तरह क्षेत्रमें प्रयुक्त अहंकार शब्दका अर्थ आत्मा नहीं है; किंतु
'अहमात्मा गुडाकेश' ( गीता १० । २० ) इत्यादि स्थलोंका ही 'अह'पद आत्मा-
का बोधक है । 'दम्भाहंकारसंयुक्ताः' ( गीता १७ । ५ ) इत्यादि स्थलोंमें 'अह'
पदका प्रयोग देहमें, अहंबुद्धि और गर्वमें होता है । 'गर्वोऽभिमानोऽहंकारः'
( अमर० १ । ७ । २१ ) इस कोषसे भी मालूम होता है कि अहंकार शब्द
केवल अहम