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सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 866 में से

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पृष्ठ 552

अतः इन स्मृतियोंके अनुसार ही श्रुतिका अर्थ होना चाहिये।' परन्तु यह ठीक
नहीं; क्योंकि सर्वात्मता-प्रतिपादक श्रुति-वचनोंके अनुसार ही स्मृतियोंका अर्थ करना
युक्त है। इस दृष्टिसे इन स्मृतियोंका यही अर्थ होता है कि 'नारायण ही भूमा है
और वही अहंकृति है' अर्थात् अहंकारोपलक्षित चित्तसे अभिन्न होनेके कारण वही
अहंकृति भी कहलाता है। अविद्याप्रतिबिम्बरूप जीवके आश्रित अविद्या, काम,
कर्मके अनुसार इहलोक-परलोकमें-कहींपर न रुकनेवाला अहंकार ही 'अनिरुद्ध'
है। इसमें और शुद्ध आत्मामें अवश्य ही भेद है। मोक्षधर्मके विवेचनसे यह
स्पष्ट हो जाता है 'परमात्मेति यं प्राहुः सांख्ययोगविशारदा । तस्मात्प्रसृतमव्यक्तं
प्रधानं तद्विदुर्जनाः ॥' अर्थात् सांख्ययोगविशारद जिसे परमात्मा कहते हैं उसीमे
प्रधान या अव्यक्त उत्पन्न होता है।
'अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् ।
अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्परः ॥
योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् ।
सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।
अहंकारप्रसूतानि महाभूतानि पञ्च च ॥'
(सर्वदर्शनसं०)
लोकसृष्ट्यर्थ अव्यक्त (अव्यक्तभावापन्न ईश्वर) से अनिरुद्ध या महान्
आत्मा (महत्तत्त्व, समष्टिबुद्धि, सूत्रात्मा या हिरण्यगर्भ) का प्रादुर्भाव हुआ। जिस
महान्ने व्यक्तभावापन्न होकर पितामह (विराट्) को रचा है, वही महान् आत्मा
(हिरण्यगर्भ) आगे चलकर अहंकार कहलाता है। वह बुद्धिरूप या तेज-(सत्त्व)
प्रधान सूक्ष्म शरीरका अभिमानी होनेसे ही तेजोमय है। उसी अहंकारसे फिर पञ्चभूतोंकी
रचना हुई। मोक्षधर्मके इन वाक्योंमें सांख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अहंकारमें ही
'महान्' और 'अहंकार' शब्दका प्रयोग हुआ है। वेदान्त-मतानुसार वीक्षण और
विविकीर्षा (प्रपञ्चरूपसे आविर्भावकी इच्छा) ही उनके अर्थ हैं। 'तदैक्षत' इस श्रुतिसे
जो ईक्षण कहा गया है, उसे ही महान् कहा जा सकता है। 'एकोऽहं बहु स्याम्' इत्यादि
श्रुतिके अनुसार अनेक होनेकी इच्छा ही अहंकार है, अतएव ईक्षणके पश्चात् ही
'अहं' पदका उल्लेख हुआ है। 'अहंकारश्चाहंकर्त्तव्यञ्च' 'महाभूतान्यहंकार'
इत्यादि श्रुति-स्मृतिमें अहंकारकी उत्पत्ति और लय बतलाया गया है। अत
उसमें व्यापकता कभी नहीं बन सकती। जहाँ भी कहीं अहमर्थकी व्यापकता कही
गयी है सर्वत्र ही अहंकारसे रहित, अहंकारके अधिष्ठानभूत व्यापक चैतन्यमें
ही लक्षणासे अहंपदका प्रयोग हुआ है। जैसे 'अहं मनुरभवं सूर्य्यश्च' इस
वामदेवकी उक्तिमें यद्यपि आपाततः प्रतीत होता है कि परिच्छिन्न जीवकी ही
सर्वरूपता कही जा रही है तथापि सिद्धान्ततः वहाँ लक्षणासे अहंकाररहित व्यापक