मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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सामाजिक वर्गोंद्वारा आविष्कृत होती हैं । आदर्शविषयक विकास समाजके
भौतिक जीवनके विकासपर अवलम्बित है तथा आदर्शादि वर्गविशेषकी रुचियों
या स्वार्थोंकी पूर्ति करते हैं । परन्तु इसके साथ-ही-साथ यह भी आवश्यक
है कि आदर्शवाद ऐसा बनाया जाय कि वह बौद्धिक आवश्यकताओंकी
भी पूर्ति कर सके । इसीके परिणामस्वरूप आदर्शवादोंके विकास तथा उनकी
आलोचनामे निरन्तर वदतोव्याघात या विरुद्धताएँ रहा करती हैं और
इसीलिये उसकी आलोचना भी की जाती है । इसीलिये आदर्शवादोंमें सत्य एव
कल्पना-मृगमरीचिका दोनोंके तत्त्व साथ-साथ रहते हैं ।”
वस्तुतः सूक्ष्मबोधतक बुद्धिके न पहुँचनेके कारण ही भौतिकवादियोंको
बहुत-से निगूढ़ तत्त्वोंमें केवल कल्पना ही दृष्टिगोचर होती है । व्यवहारमे उच्च
आदर्शके अनुसार देह-इन्द्रियादिकी प्रवृत्ति बनानेकी चेष्टा होती है, पर कभी-कभी
बाह्य प्रवृत्तियाँ वहाँतक नहीं पहुँच पातीं । उन्हीं उच्च आदर्शोंको भौतिकवादी
मृगमरीचिकातुल्य समझने लगते हैं ।
“आदर्शवादी मृगमरीचिकाओं; स्वप्नोंका उद्गम है समाजके उत्पादन-
सम्बन्धोंसे, परन्तु वे इस उद्गम या स्रोतसे विदितरूपमें उद्भूत नहीं होतीं,
परन्तु अविदित या अप्रतिभातरूपमें अनजाने या सहजरूपमें ही उद्भूत हो
आती हैं । आदर्शवादियोंको यह ज्ञात ( पता ) तो रहता नहीं कि
उनकी इन भ्रान्त स्वाप्निक धारणाओंका वास्तविक मूलस्रोत क्या
है; वे सोचते हैं कि ‘हमने शुद्ध विचारकी पद्धतिसे इन्हें जन्म दिया ।’ और
इसलिये आदर्शवादमें प्रतीपन ( उलट देने ) की प्रक्रियाका आगमन होता है,
जिसके द्वारा वास्तविक सामाजिक सम्बन्धोंको काल्पनिक धारणाओंके प्रतिनिधि-
रूपमें दिखलाया जाता है । अन्तमें, आदर्शवादी स्वप्न एक वर्गविशेषलक्षित
प्रवञ्चनापद्धति ( धोखेकी पद्धति ) का निर्माण करते हैं ।”
यह भी ‘अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते’ का ही उदाहरण
है । सदा ही आत्मचालित स्थूल-सूक्ष्म देहके समान ही सम्पूर्ण जड़-
जगत्की चेष्टाएँ अध्यात्मनियन्त्रित होती हैं—यही तथ्य है । सुतरा इनकी
प्रवृत्तिका निर्धारण भी ज्ञान-विज्ञानके आधारपर ही होता है ।
“आदर्शवादी मृगमरीचिकाओंके ठीक विपरीत, लोग अपने व्यावहारिक
प्रत्यक्ष क्रियाकलापों या प्रवृत्तियोंकी शृंखलामे सत्यकी खोज करते
हैं । ऐसी खोजका प्रथम मूलस्रोत सामाजिक उत्पादनमें निहित है ।
उत्पादन-विषयकी प्रक्रियासे आविष्कृत धारणाओंसे प्राकृतिक विज्ञान
( नेचुरल साइंस ) उत्पन्न होते हैं, जो कि उत्पादनसे पृथक्कृत, विशिष्ट