मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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आश्चर्य है कि इस विज्ञानके युगमें जब कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म वस्तुओकी खोज
हो रही है, तब भी मन-जैसी सूक्ष्मवस्तुको जड स्थूल देहकी ही एक अवस्था
माना जाता है । इसपर आगे पर्याप्त विवेचन किया जायगा कि मन दर्शन, श्रवण
आदि इन्द्रियजन्य क्रियाओमे सहकारी सूक्ष्म देहसे भिन्न तत्त्वान्तर है ।
'मनुष्यकी मानसिक क्रियाओंका विकास उसके सामाजिक कार्यकलापोंसे
उद्भूत होता है । इसकी प्रक्रिया है—दर्शन, प्रेक्षण, अनुभूति, प्रतीति,
ज्ञान ( Perception ) से विचारणा । विचारने एवं बोलनेकी क्षमता उत्पन्न
होती है, सामाजिक श्रमकी प्रक्रियासे; जो ( सामाजिक श्रम ) कि मनुष्यका
मूलभूत ( आधारभूत ) सामाजिक कार्य ( प्रवृत्ति ) है ।''
सामाजिक कार्य-कलापोका प्रभाव यद्यपि क्रियाओपर अवश्य पड़ता है,
परन्तु एतावता प्रकाशस्वरूप बोध, जड, बाह्य वस्तुओ एवं उनकी जड़
क्रियाओका परिणाम नहीं हो सकता ।
“विचारनेमें हम उन प्रारम्भिक धारणाओंसे, जिनके अनुसार साक्षादिन्द्रिय-
गम्य वस्तुएँ हैं—प्रारम्भकर कल्पनामयी धारणाओकी ओर आगे बढ़ते हैं ।
कल्पनामयी धारणाओका उद्गम है सामाजिक सम्बन्धोंके विकास तथा बाह्य
प्रकृतिसे सम्बद्ध उत्पादनविषयक एवं अन्य प्रवृत्तियोंके विकाससे, जब कि
मनुष्योके अज्ञान तथा असहायता जन्म देती है रहस्यमयी, इन्द्रजालमयी तथा
स्वप्निक, मृगमरीचिकामयी काल्पनिक धारणाओको । मानसिक श्रम,
मस्तिष्किक श्रम (दिमागी मेहनत) का भौतिक श्रमसे विभाजन काल्पनिक
धारणाओसे ही प्रारम्भ होता है और फिर सैद्धान्तिक प्रवृत्तियोंका व्यावहारिक
प्रवृत्तियोंसे सम्बन्धविच्छेद होता है; जिसमें कि सिद्धान्तकी सत्यसे दूर उड़
चलनेकी प्रवृत्ति हो जाती है । आदर्शवादी एवं भौतिकवादी दलोकी
विचारपद्धतिके विरोधकी शाखाएँ ही नहीं, स्कन्ध भी यहींसे पृथक् होते हैं ।”
वस्तुतः किन्हीं भी प्रवृत्तियोंमें ज्ञान ही मूल होता है । ज्ञानसे ही
संघ या समाजका निर्माण होता है । स्थूल बाह्य-जगत्की अपेक्षा मन बहुत सूक्ष्म
है । अतः मानसिक ज्ञान-विज्ञान तथा कल्पनामें एक ही भौतिक स्थूल प्रवृत्तियाँ
आगे बढ़ी होती हैं, यह स्वाभाविक है । इतना ही क्यों, मन ही तो सबका मूल
भी है ।
आदर्शवाद
‘काल्पनिक धारणाओका प्रयोग किसी न-किसी प्रकारकी वस्तुओ अथवा
विचार-पद्धतियोकी सुव्यवस्थित दृष्टियोंके निरूपणमें ही किया जाता है । ये
दृष्टियाँ या विचारपद्धतियाँ समाज-विकासकी विभिन्न अवस्थाओमें विभिन्न