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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 237
  • दवा-चारत्राक पाठका माहात्म्य * २३७
    है, उस स्थानको मैं कभी नहीं छोड़ती। वहाँ सदा
    ही मेरा संनिधान बना रहता है॥ ९॥ बलिदान,
    पूजा, होम तथा महोत्सवके अवसरोंपर मेरे इस
    चरित्रका पूरा-पूरा पाठ और श्रवण करना
    चाहिये ॥ १० ॥ ऐसा करनेपर मनुष्य विधिको
    जानकर या बिना जाने भी मेरे लिये जो बलि,
    पूजा या होम आदि करेगा, उसे मैं बड़ी
    प्रसन्नताके साथ ग्रहण करूँगी ॥ ११ ॥ शरत्कालमें
    जो वार्षिक महापूजा की जाती है, उस अवसरपर
    जो मेरे इस माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह
    मनुष्य मेरे प्रसादसे सब बाधाओंसे मुक्त तथा
    धन, धान्य एवं पुत्रसे सम्पन्न होगा- इसमें
    तनिक भी सन्देह नहीं है ॥ १२-१३॥ मेरा यह
    माहात्म्य, मेरे प्रादुर्भावकी सुन्दर कथाएँ तथा
    युद्धमें किये हुए मेरे पराक्रम सुननेसे मनुष्य
    निर्भय हो जाता है ॥ १४ ॥ मेरे माहात्म्यका
    श्रवण करनेवाले पुरुषोंके शत्रु नष्ट हो जाते हैं,
    उन्हें कल्याणकी प्राप्ति होती तथा उनका कुल
    आनन्दित रहता है ॥ १५ ॥ सर्वत्र शान्ति-कर्ममें,
    बुरे स्वप्न दिखायी देनेपर तथा ग्रहजनित भयङ्कर
    पीड़ा उपस्थित होनेपर मेरा माहात्म्य श्रवण
    करना चाहिये ॥ १६ ॥ इससे सब विघ्न तथा भयङ्कर
    ग्रह-पीड़ाएँ शान्त हो जाती हैं और मनुष्योंद्वारा
    देखा हुआ दुःस्वप्न शुभ-स्वप्नमें परिवर्तित हो जाता
    है ॥ १७ ॥ बालग्रहोंसे आक्रान्त हुए बालकोंके
    लिये यह माहात्म्य शान्तिकारक है तथा मनुष्योंके
    संगठनमें फूट होनेपर यह अच्छी प्रकार मित्रता
    करानेवाला होता है ॥ १८ ॥ यह माहात्म्य समस्त
    दुराचारियोंके बलका नाश करनेवाला है। इसके
    पाठमात्रसे राक्षसों, भूतों और पिशाचोंका नाश हो
    जाता है ॥ १९ ॥ मेरा यह सब माहात्म्य मेरे
    सामीप्यकी प्राप्ति करानेवाला है। पशु, पुष्प,
    अर्घ्य, धूप, दीप, गन्ध आदि उत्तम सामग्रियोंद्वारा
    पूजन करनेसे, ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे, होम
    करनेसे, प्रतिदिन अभिषेक करनेसे, नाना प्रकारके
    अन्य भोगोंका अर्पण करनेसे तथा दान देने
    आदिसे एक वर्षतक जो मेरी आराधना की जाती
    है और उससे मुझे जितनी प्रसन्नता होती है,
    उतनी प्रसन्नता मेरे इस उत्तम चरित्रका एक बार
    श्रवण करनेमात्रसे हो जाती है। यह माहात्म्य
    श्रवण करनेपर पापोंको हर लेता और आरोग्य
    प्रदान करता है ॥ २०-२१ ॥ मेरे प्रादुर्भावका
    कीर्तन समस्त भूतोंसे रक्षा करता है तथा मेरा
    युद्धविषयक चरित्र दुष्ट दैत्योंका संहार करनेवाला
    है ॥ २२ ॥ इसके श्रवण करनेपर मनुष्योंको शत्रु का
    भय नहीं रहता। देवताओ ! तुमने और ब्रह्मर्षियोंने
    जो मेरी स्तुतियाँ की हैं ॥ २४ ॥ तथा ब्रह्माजीने
    जो स्तुतियाँ की हैं, वे सभी कल्याणमयी बुद्धि
    प्रदान करती हैं। वनमें, सूने मार्गमें अथवा
    दावानलसे घिर जानेपर ॥ २५ ॥ निर्जन स्थानमें,
    लुटेरोंके दावमें पड़ जानेपर या शत्रुओंसे पकड़े
    जानेपर अथवा जंगलमें सिंह, व्याघ्र या जंगली
    हाथियोंके पीछा करनेपर ॥ २६ ॥ कुपित राजाके
    आदेशसे वध या बन्धनके स्थानमें ले जाये
    जानेपर अथवा महासागरमें नावपर बैठनेके बाद
    भारी तूफानसे नावके डगमग होनेपर ॥ २७ ॥
    और अत्यन्त भयङ्कर युद्धमें शस्त्रोंका प्रहार
    होनेपर अथवा वेदनासे पीड़ित होनेपर, किंबहुना
    सभी भयानक बाधाओंके उपस्थित होनेपर ॥ २८ ॥
    जो मेरे इस चरित्रका स्मरण करता है, वह
    मनुष्य संकटसे मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभावसे
    सिंह आदि हिंसक जन्तु नष्ट हो जाते हैं तथा