संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा देवताओंको वरदान • २३३
मुखवाली मुण्डमालासे विभूषित मुण्डमर्दिनी
चामुण्डारूपा नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ २१ ॥
लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा,
ध्रुवा, महारात्रि तथा महा-अविद्यारूपा नारायणि !
तुम्हें नमस्कार है ॥ २२ ॥ मेधा, सरस्वती, वरा
(श्रेष्ठा), भूति (ऐश्वर्यरूपा), बाभ्रवी (भूरे रंगकी
अथवा पार्वती), तामसी (महाकाली), नियता
(संयमपरायणा) तथा ईशा (सबकी अधीश्वरी)
रूपिणी नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ २३ ॥
सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकारकी शक्तियोंसे
सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि ! सब भयोंसे हमारी
रक्षा करो; तुम्हें नमस्कार है ॥ २४ ॥ कात्यायनी !
यह तीन लोचनोंसे विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख
सब प्रकारके भयोंसे हमारी रक्षा करे। तुम्हें
नमस्कार है ॥ २५ ॥ भद्रकाली ! ज्वालाओंके कारण
विकराल प्रतीत होनेवाला, अत्यन्त भयङ्कर और
समस्त असुरोंका संहार करनेवाला तुम्हारा त्रिशूल
भयसे हमें बचाये। तुम्हें नमस्कार है ॥ २६ ॥ देवि !
जो अपनी ध्वनिसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके
दैत्योंके तेज नष्ट किये देता है, वह तुम्हारा घंटा
हमलोगोंकी पापोंसे उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे
माता अपने पुत्रोंकी बुरे कर्मोंसे रक्षा करती
है ॥ २७ ॥ चण्डिके ! तुम्हारे हाथोंमें सुशोभित
खड्ग, जो असुरोंके रक्त और चर्बीसे चर्चित है,
हमारा मङ्गल करे। हम तुम्हें नमस्कार करते
हैं ॥ २८ ॥ देवि ! तुम प्रसन्न होनेपर सब रोगोंको
नष्ट कर देती हो और कुपित होनेपर मनोवाञ्छित
सभी कामनाओंका नाश कर देती हो। जो लोग
तुम्हारी शरणमें जा चुके हैं, उनपर विपत्ति तो
आती ही नहीं। तुम्हारी शरणमें गये हुए मनुष्य
दूसरोंको शरण देनेवाले हो जाते हैं ॥ २९ ॥ देवि !
अम्बिके !! तुमने अपने स्वरूपको अनेक भागोंमें
विभक्त करके नाना प्रकारके रूपोंसे जो इस समय
इन धर्मद्रोही महादैत्योंका संहार किया है, वह
सब दूसरी कौन कर सकती थी ॥ ३० ॥ विद्याओंमें,
ज्ञानको प्रकाशित करनेवाले शास्त्रोंमें तथा आदिवाक्यों
(वेदों)-में तुम्हारे सिवा और किसका वर्णन है ?
तथा तुमको छोड़कर दूसरी कौन ऐसी शक्ति है,
जो इस विश्वको अज्ञानमय घोर अन्धकारसे
परिपूर्ण ममतारूपी गढ़ेमें निरन्तर भटका रही
हो ॥ ३१ ॥ जहाँ राक्षस, जहाँ भयङ्कर विषवाले
सर्प, जहाँ शत्रु, जहाँ लुटेरोंकी सेना और जहाँ
दावानल हो, वहाँ तथा समुद्रके बीचमें भी साथ
रहकर तुम विश्वकी रक्षा करती हो ॥ ३२ ॥ विश्वेश्वरि !
तुम विश्वका पालन करती हो। विश्वरूपा हो,
इसलिये सम्पूर्ण विश्वको धारण करती हो। तुम
भगवान् विश्वनाथकी भी वन्दनीया हो। जो लोग
भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं, वे
सम्पूर्ण विश्वको आश्रय देनेवाले होते हैं ॥ ३३ ॥
देवि ! प्रसन्न होओ। जैसे इस समय असुरोंका वध
करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी
प्रकार सदा हमें शत्रुओंके भयसे बचाओ।
सम्पूर्ण जगत्का पाप नष्ट कर दो और उत्पात
एवं पापोंके फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले महामारी
आदि बड़े-बड़े उपद्रवोंको शीघ्र दूर करो ॥ ३४ ॥
विश्वकी पीड़ा दूर करनेवाली देवि ! हम तुम्हारे
चरणोंपर पड़े हुए हैं, हमपर प्रसन्न होओ।
त्रिलोकनिवासियोंकी पूजनीया परमेश्वरि ! सब
लोगोंको वरदान दो ॥ ३५ ॥
देव्युवाच ॥ ३६ ॥
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ।
तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥ ३७ ॥
देवी बोलीं- ॥ ३६ ॥ देवताओ! मैं वर
देनेको तैयार हूँ। तुम्हारे मनमें जिसकी इच्छा हो,
वह वर माँग लो। संसारके लिये उस उपकारक
वरको मैं अवश्य दूँगी ॥ ३७ ॥