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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

२२४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत्।
कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः ॥ २२॥
अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह।
तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ ॥ २३ ॥
दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा।
तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः ॥ २४॥
शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा।
आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया ॥ २५ ॥
सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्।
निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते ॥ २६॥
शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान्।
चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २७॥
ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम्।
स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह ॥ २८ ॥
ऋषि कहते हैं - ॥४॥ राजन् ! युद्धमें रक्तबीज
तथा अन्य दैत्योंके मारे जानेपर शुम्भ और निशुम्भके
क्रोधकी सीमा न रही ॥ ५॥ अपनी विशाल सेना
इस प्रकार मारी जाती देख निशुम्भ अमर्षमें
भरकर देवीकी ओर दौड़ा। उसके साथ असुरोंकी
प्रधान सेना थी ॥६॥ उसके आगे, पीछे तथा
पार्श्वभागमें बड़े-बड़े असुर थे, जो क्रोधसे ओठ
चबाते हुए देवीको मार डालनेके लिये आये ॥७॥
महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेनाके साथ मातृगणोंसे
युद्ध करके क्रोधवश चण्डिकाको मारनेके लिये
आ पहुँचा ॥८॥ तब देवीके साथ शुम्भ और
निशुम्भका घोर संग्राम छिड़ गया। वे दोनों दैत्य
मेघोंकी भाँति बाणोंकी भयंकर वृष्टि कर रहे
थे ॥ ९॥ उन दोनोंके चलाये हुए बाणोंको चण्डिकाने
अपने बाणोंके समूहसे तुरंत काट डाला और
शस्त्रसमूहोंकी वर्षा करके उन दोनों दैत्यपतियोंके
अङ्गोंमें भी चोट पहुँचायी ॥ १० ॥ निशुम्भने तीखी
तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर देवीके श्रेष्ठ
वाहन सिंहके मस्तकपर प्रहार किया ॥ ११ ॥ अपने
वाहनको चोट पहुँचनेपर देवीने क्षुरप्र नामक
बाणसे निशुम्भकी श्रेष्ठ तलवार तुरंत ही काट
डाली और उसकी ढालको भी, जिसमें आठ
चाँद जड़े थे, खण्ड-खण्ड कर दिया ॥ १२ ॥
ढाल और तलवारके कट जानेपर उस असुरने
शक्ति चलायी, किंतु सामने आनेपर देवीने
चक्रसे उसके भी दो टुकड़े कर दिये ॥ १३ ॥
अब तो निशुम्भ क्रोधसे जल उठा और उस
दानवने देवीको मारनेके लिये शूल उठाया; किंतु
देवीने समीप आनेपर उसे भी मुक्केसे मारकर
चूर्ण कर दिया ॥ १४॥ तब उसने गदा घुमाकर
चण्डीके ऊपर चलायी, परंतु वह भी देवीके
त्रिशूलसे कटकर भस्म हो गयी ॥ १५ ॥ तदनन्तर
दैत्यराज निशुम्भको फरसा हाथमें लेकर आते
देख देवीने बाणसमूहोंसे घायलकर धरतीपर
सुला दिया ॥ १६ ॥ उस भयंकर पराक्रमी भाई
निशुम्भके धराशायी हो जानेपर शुम्भको बड़ा
क्रोध हुआ और अम्बिकाका वध करनेके लिये
वह आगे बढ़ा ॥ १७ ॥ रथपर बैठे-बैठे ही उत्तम