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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 296 में से

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पृष्ठ 222

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  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
    हुए, उनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया ॥४८॥
    कौमारीने शक्तिसे, वाराहीने खड्गसे और माहेश्वरीने
    त्रिशूलसे महादैत्य रक्तबीजको घायल किया ॥ ४९ ॥
    क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य रक्तबीजने भी गदासे
    सभी मातृ-शक्तियोंपर पृथक्-पृथक् प्रहार किया ॥५०॥
    शक्ति और शूल आदिसे अनेक बार घायल
    होनेपर जो उसके शरीरसे रक्तकी धारा पृथ्वीपर
    गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न
    हुए ॥ ५१ ॥ इस प्रकार उस महादैत्यके रक्तसे
    प्रकट हुए असुरोंद्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो
    गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ५२ ॥
    देवताओंको उदास देख चण्डिकाने कालीसे
    शीघ्रतापूर्वक कहा- 'चामुण्डे ! तुम अपना मुख
    और भी फैलाओ ॥ ५३ ॥ तथा मेरे शस्त्रपातसे
    गिरनेवाले रक्तबिन्दुओं और उनसे उत्पन्न होनेवाले
    महादैत्योंको तुम अपने इस उतावले मुखसे खा
    जाओ ॥ ५४॥ इस प्रकार रक्तसे उत्पन्न होनेवाले
    महादैत्योंका भक्षण करती हुई तुम रणमें विचरती
    रहो। ऐसा करनेसे उस दैत्यका सारा रक्त क्षीण हो
    जानेपर वह स्वयं भी नष्ट हो जायगा ॥५५॥ उन
    भयङ्कर दैत्योंको जब तुम खा जाओगी तो दूसरे
    नये दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेंगे।' कालीसे यों
    कहकर चण्डिका देवीने शूलसे रक्तबीजको मारा ॥५६ ॥
    और कालीने अपने मुखमें उसका रक्त ले लिया।
    तब उसने वहाँ चण्डिकापर गदासे प्रहार किया ॥ ५७ ॥
    किंतु उस गदापातने देवीको तनिक भी वेदना नहीं
    पहुँचायी। रक्तबीजके घायल शरीरसे बहुत-सा
    रक्त गिरा ॥ ५८ ॥ किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही
    चामुण्डा ने उसे अपने मुखमें ले लिया। रक्त
    गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न
    हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने
    रक्तबीजका रक्त भी पी लिया ॥ ५९ ॥ तदनन्तर
    देवीने रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डा ने पी
    लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदिसे
    मार डाला ॥ ६० ॥ राजन् ! इस प्रकार शस्त्रोंके
    समुदायसे आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य
    रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा। नरेश्वर ! इससे देवताओंको
    अनुपम हर्षकी प्राप्ति हुई ॥ ६१-६२ ॥ और मातृगण
    उन असुरोंके रक्तपानके मदसे उद्धत-सा होकर
    नृत्य करने लगा ॥ ६३ ॥
    इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये रक्तबीजवधो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
    उवाच १, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ६१, एवम् ६३, एवमादितः ॥५०२॥
    इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'रक्तबीज-वध'
    नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥८॥