संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished296 पृष्ठ
पृष्ठ 221, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 221
- रक्तबीज-वध * २२१
पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा।
ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥४६॥
वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह।
गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥४७॥
वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः।
सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥४८॥
शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना।
माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥ ४९ ॥
स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाह्नत् पृथक्।
मातृः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥५०॥
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि।
पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥५१॥
तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत्।
व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥५२॥
तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा।
उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं' वदनं कुरु ॥ ५३ ॥
मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान् ।
रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना ॥५४॥
भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान् ।
एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ॥५५॥
भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे ।
इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूसेनाभिजघान तम् ॥५६॥
मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्।
ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥५७॥
न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि ।
तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥५८॥
यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति ।
मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः ।
तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम् ॥५९॥
देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः।
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् ॥६०॥
स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ५।
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः ॥६१॥
ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥६२॥
तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥ॐ॥ ६३ ॥
इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए मातृगणोंको नाना
प्रकारके उपायोंसे बड़े-बड़े असुरोंका मर्दन करते
देख दैत्यसैनिक भाग खड़े हुए ॥३९॥ मातृगणोंसे
पीड़ित दैत्योंको युद्धसे भागते देख रक्तबीज
नामका महादैत्य क्रोधमें भरकर युद्धके लिये
आया ॥४०॥ उसके शरीरसे जब रक्तकी बूँद
पृथ्वीपर गिरती, तब उसीके समान शक्तिशाली
एक दूसरा महादैत्य पृथ्वीपर पैदा हो जाता ॥४१॥
महासुर रक्तबीज हाथमें गदा लेकर इन्द्रशक्तिके
साथ युद्ध करने लगा। तब ऐन्द्रीने अपने वज्रसे
रक्तबीजको मारा ॥४२॥ वज्रसे घायल होनेपर
उसके शरीरसे बहुत सा रक्त चूने लगा और
उससे उसीके समान रूप तथा पराक्रमवाले योद्धा
उत्पन्न होने लगे ॥४३॥ उसके शरीरसे रक्तकी
जितनी बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गये।
वे सब रक्तबीजके समान ही वीर्यवान्, बलवान्
तथा पराक्रमी थे ॥४४॥ ये रक्तसे उत्पन्न होनेवाले
पुरुष भी अत्यन्त भयङ्कर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार
करते हुए वहाँ मातृगणोंके साथ घोर युद्ध करने
लगे ॥४५॥ पुनः वज्रके प्रहारसे जब उसका
मस्तक घायल हुआ तो रक्त बहने लगा और
उससे हजारों पुरुष उत्पन्न हो गये ॥४६॥ वैष्णवीने
युद्धमें रक्तबीजपर चक्रका प्रहार किया तथा
ऐन्द्रीने उस दैत्य-सेनापतिको गदासे चोट
पहुँचायी ॥ ४७ ॥ वैष्णवीके चक्रसे घायल होनेपर
उसके शरीरसे जो रक्त बहा और उससे जो
उसीके बराबर आकारवाले सहस्रों महादैत्य प्रकट
१. पा०-विस्तरं। २. पा०-योगिना। ३. इसके बाद कहीं कहीं 'ऋषिरुवाच' इतना अधिक पाठ है।
४. पा०- चक्रेण । ५. पा०-शस्त्रैरगणितैर्हतः ।