संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
घमंडमें आकर तुम युद्धकी अभिलाषा रखते हो
तो आओ। मेरी शिवाएँ (योगिनियाँ) तुम्हारे कच्चे
मांससे तृप्त हों' ॥२७॥ चूँकि उस देवीने भगवान्
शिवको दूतके कार्यमें नियुक्त किया था, इसलिये
वह 'शिवदूती' के नामसे संसारमें विख्यात
हुई ॥ २८ ॥ वे महादैत्य भी भगवान् शिवके मुँहसे
देवीके वचन सुनकर क्रोधमें भर गये और जहाँ
कात्यायनी विराजमान थीं, उस ओर बढ़े ॥ २९ ॥
तदनन्तर वे दैत्य अमर्षमें भरकर पहले ही देवीके
ऊपर बाण, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्रोंकी वृष्टि
करने लगे ॥ ३० ॥ तब देवीने भी खेल-खेलमें ही
धनुषकी टंकार की और उससे छोड़े हुए बड़े-
बड़े बाणोंद्वारा दैत्योंके चलाये हुए बाण, शूल,
शक्ति और फरसोंको काट डाला ॥ ३१ ॥ फिर
काली उनके आगे होकर शत्रुओंको शूलके प्रहारसे
विदीर्ण करने लगी और खट्वाङ्गसे उनका कचूमर
निकालती हुई रणभूमिमें विचरने लगी ॥ ३२ ॥
ब्रह्माणी भी जिस जिस ओर दौड़ती, उसी-उसी
ओर अपने कमण्डलुका जल छिड़ककर शत्रुओंके
ओज और पराक्रमको नष्ट कर देती थी ॥ ३३ ॥
माहेश्वरीने त्रिशूलसे तथा वैष्णवीने चक्रसे और
अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई कुमार कार्तिकेयकी
शक्तिने शक्तिसे दैत्योंका संहार आरम्भ किया ॥ ३४ ॥
इन्द्रशक्तिने वज्रप्रहारसे विदीर्ण हो सैकड़ों दैत्य-
दानव रक्तकी धारा बहाते हुए पृथ्वीपर सो
गये ॥ ३५ ॥ वाराही शक्तिने कितनोंको अपनी
थूथुनकी मारसे नष्ट किया, दाढ़ोंके अग्रभागसे
कितनोंकी छाती छेद डाली तथा कितने ही दैत्य
चक्रकी चोटसे विदीर्ण हो गये ॥ ३६ ॥ नारसिंही
भी दूसरे-दूसरे महादैत्योंको अपने नखोंसे विदीर्ण
करके खाती और सिंहनादसे दिशाओं एवं आकाशको
गुँजाती हुई युद्ध-क्षेत्रमें विचरने लगी ॥ ३७ ॥ कितने
ही असुर शिवदूतीके प्रचण्ड अट्टहाससे अत्यन्त
भयभीत हो पृथ्वीपर गिर पड़े और गिरनेपर उन्हें
शिवदूतीने उस समय अपना ग्रास बना लिया ॥ ३८ ॥
इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान्।
दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥ ३९ ॥
पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान्।
योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥ ४० ॥
रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः।
समुत्पतति मेदिन्यां१ तत्प्रमाणस्तदासुरः ॥ ४१ ॥
युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः।
ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥ ४२ ॥
कुलिशेनाहतस्याशु बहु२ सुस्राव शोणितम्।
समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥ ४३ ॥
यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥ ४४ ॥
ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः।
समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥ ४५ ॥
१. पा०—न्यास्तो। २. पा०—तस्य।