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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

२१६ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू।
युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि ॥ २४॥
चण्डको मारा गया देख मुण्ड भी देवीकी
ओर दौड़ा। तब देवीने रोषमें भरकर उसे भी
तलवारसे घायल करके धरतीपर सुला दिया ॥ २१ ॥
महापराक्रमी चण्ड और मुण्डको मारा गया देख
मरनेसे बची हुई बाकी सेना भयसे व्याकुल हो
चारों ओर भाग गयी ॥ २२ ॥ तदनन्तर कालीने
चण्ड और मुण्डका मस्तक हाथमें ले चण्डिकाके
पास जाकर प्रचण्ड अट्टहास करते हुए कहा- ॥ २३ ॥
'देवि ! मैंने चण्ड और मुण्ड नामक इन दो
महापशुओंको तुम्हें भेंट किया है। अब युद्धयज्ञमें
तुम शुम्भ और निशुम्भका स्वयं ही वध करना' ॥ २४ ॥
ऋषिरुवाच ॥ २५ ॥
तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ।
उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः ॥ २६ ॥
यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता।
चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ॥ ॐ ॥ २७ ॥
ऋषि कहते हैं- ॥ २५ ॥ वहाँ लाये हुए उन
चण्ड मुण्ड नामक महादैत्योंको देखकर कल्याणमयी
चण्डीने कालीसे मधुर वाणीमें कहा- ॥ २६ ॥
देवि ! तुम चण्ड और मुण्डको लेकर मेरे पास
आयी हो, इसलिये संसारमें चामुण्डाके नामसे
तुम्हारी ख्याति होगी ॥ २७ ॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये चण्डमुण्डवधो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
उवाच १, श्लोकाः १५, एवम् २७, एवमादितः ॥ ४३१ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें
'चण्ड-मुण्ड-वध' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥