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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

५४ मंत्ररामायण
सकाम सुग्रीव को अनुगृहीत करने वाले राम से निष्काम हनुमान
ने कहा : 'शास्त्रीय दृष्टि से अन्तर्यामी होने से आप यज्ञादि के विषय
में यत्न करने पर फल देते हैं, ऐसा मैंने सुना है। किन्तु आपसे सम्बन्धित
मेरे जैसे लोग देने पर भी ग्रहण नहीं करते क्योंकि सखा निष्काम
दास होते हैं। इसलिये आपका जो भी कार्य है, वह सब मैं करूँगा
परन्तु उसके बदले में मैं कुछ भी नहीं चाहता !'
एवं सकामौ जाम्बवत्सुग्रीवावनुगृह्य निष्कामे हनुमत्यनुग्रहं चिकीर्षुः रामं
हनुमानाह-एवा हीति ॥ एष एवं शास्त्रदृष्टरीत्या हि निश्चितं त्वाम् श्रुतुथा
काले काले यातयंतम् अंतर्यामितया यज्ञादी विषये यत्नं कारयन्तं तत्फलभूतानि
मघा मघानि धनानि च विप्रेभ्यः श्रद्धावद्भ्यो ददतं शृणोमि परन्तु-किं कथं ते
त्वत्संबन्धिनो ब्रह्माणो ब्राह्मणाः मादृशाः गृह्णते गृह्णन्ति, अपितु दीयमानमपि न
गृह्णन्तीत्यर्थः । सखायो निष्कामदासाः । अत एव ये त्वा या त्वयि कामं विदधुः,
त्वत्काम्यमेव सर्वमहं करोमि न त्वत्तोऽन्यद्वाञ्छामीत्यर्थः । इदं मन्त्रत्रयं
कथानुपयुक्तगुणकथनपरत्वादसङ्गादुपन्यस्तम् ॥ ६६ ॥
कथा देवानां कतमस्य यामनि सुम॑तु नाम शृण्वतां मनामहे ।
को मृळा॑ति कतमो नो॒ मय॑स्करत्कत॒म ऊती अ॒भ्याव॑वर्त्तति ॥६७॥
ऋ० १०. ६४, १
'मुझे दो मैं तुम्हें दूँगा' इस प्रकार कहने वाले सुग्रीव के बालिवध
के कार्य को करके राम अपने कार्य के विषय में सोचते हैं : 'मेरे वचनों
को सुनने वाले वानर रूपी देवताओं के मध्य में किसके नाम और
स्वरूप को जानूँ जो सीता की खोज के विषय में मुझे सुखी करेगा और
सीता रूपी नवमूर्ति को लौटावेगा-यह मैं कैसे जानूँ ? अर्थात् मैं उस
उपयुक्त पात्र को नहीं जानता हूं !'
देहि मे ददामि त इति वदतः सुग्रीवस्य कार्यं बालिवधाख्यं येभिरौशद्वृत्रह-
त्याय वज्रीति सूचितं पूर्वमेव कृत्वा रामः स्वकार्यं चिन्तयते-कथा देवाना-
मित्यादिना । कथा केन प्रकारेण शृण्वतां मद्वाक्यमाकर्णयतां देवानां वानररूपाणां
मध्ये कतमस्य नामस्वरूपं सुमंतु शोभनतया मंतव्यं मनामहे जानीमहे । यामनि
सीताप्रवृत्त्यर्थे गमने विषये को नोऽस्मान् मृळाति सुखयेत् । कतमो वा नोऽस्माकं
मयः सुखं करत् कुर्यात् । कतमो वा ऊती अस्मदीयां विभूतिं सीताख्यां श्रियम्
अभ्याववर्त्तति अभ्यानयति, तं न जानीमः इति भावः ॥ ६७ ॥
ऋतून्य॑न्ति क्रत॑वो हृ॒त्सु धी॒तयो॒ वेन॑न्ति वेनाः पतय॑न्त्यादिशः॑ ।