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मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 145 में से

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पृष्ठ 84

४८ मन्त्ररामायण
यो वः सेनानीर्महतो गणस्य राजा व्रातस्य प्रथमो बभूव ।
तस्मै कृणोमि न धना रुणध्मि दशाहं प्राचीस्तदृतं वदामि ॥ ५६॥
ऋ. १०. ३४, १२
राम और लक्ष्मण के दूर चले जाने पर उनकी अनुयायिनी सीता
को अकेली देखकर रावण उनके पास आया । तब वह निवेदन करते हुए
रावण से बोलीं : हे राक्षसों की सेना के नायक, प्रमुख राजा ! तुम्हारा
मैं शीघ्र ही नाश करूंगी । मुझे तुम्हारे धन की आकांक्षा नहीं है ।
मैं यह सत्यवचन दशों दिशाओं को साक्षी मानकर कह रही हूँ !
ततो दूरस्थे रामे लक्ष्मणे च तदनुयायिनि शून्ये सीतां प्रार्थयमानं रावणं
प्रति सीता प्राह—यो व इति ॥ यो वो रक्षसां महतो गणस्य सेनानीः । यो वा
वो महतो व्रातस्य प्रथमो मुख्यो राजा बभूव । तस्मै ते कृणोमि निहन्मि शीघ्रमेव
नाशयिष्यामि । धना भवदीयानि धनानि न रुणध्मि न कांक्षे । तदिदम् ऋतं
वाक्यं दश प्राचीः प्रागादिदिशः प्रति वदामि ॥ ५६ ॥
इनो राजन्नरतिः समिद्धो रौद्रो दक्षाय सुषुमानदर्शि ।
चिकिद्विभाति भासा बृहता सिक्र्नीमेति रुशतीमपाजन् ॥ ५७॥
ऋ. १०. ३, १
इस प्रकार निरस्त किये गये रावण को सीता हरण के लिये उद्यत
देखकर अग्नि ने सोचा । मन से राम को सम्बोधित किया : 'हे राजन् !
बलशाली, काम सुख को नहीं प्राप्त करने वाला, प्रज्वलित कामाग्नि
वाला, भयङ्कर, साहस से समर्थ दिखने वाला, आपकी शक्ति को जानने
पर भी विपरीत कार्य करने वाला यह रावण कालरात्रि के समान इस
सीता को चुरा कर ले जाता है ।'
एवं निरस्तं रावणं सीताहरणोद्यतमालक्ष्याग्निरचिन्तयत्—इनोराजन्नति ।
मनसैव रामं सम्बोधयति । हे राजन् इनः बलीयान् अरतिः अलब्धकामसुखः
समिद्धः कामाग्निना प्रदीप्तः रौद्रो भयङ्करः दक्षाय साहसाय सुषुमान् समर्थः
अदर्शि दृष्टः । चिकित्वान्सामर्थ्यं जानन्नपि विभाति वैपरीत्येन दीप्यते, भासा
दीप्त्या बृहता बृहत्या असिक्नीं कालरात्रिमिव कृष्णां रुशतीं दह्यमानाम् एति
आयाति । अपाजन् अपसारयन्सेनां वारय