मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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३४ मन्त्ररामायण
लिंगद्वयं राघवैकशरणम् ॥ २९ ॥
बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान् वाजी सहमान उग्रः ।
अभिवीरो अभिसत्त्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथ मातिष्ठ गोवित् ॥ ३०॥
ऋ० १०. १०३, ५
स्वयंवर को जीतने की इच्छा रखने वाले राम के देवरथ और
दिव्यायुधों ने उपस्थित होकर कहा : 'बल की परीक्षा करके शिव धनुष
को चढ़ाने वाले को कन्या दूँगा' ऐसी जनक की प्रतिज्ञा है । वृद्ध, वीर,
मनस्वी, शत्रु का दमन करने वाले, भाइयों से घिरे हुए जनक के पास
इस जयशाली रथ में चढ़कर जाइये ।
अथ स्वयंवरं जिगमिषोः रामस्य देवरथो दिव्यायुधानि चोपतिष्ठानीत्याह
बलविज्ञाय इति । बलेविषये विज्ञायो विज्ञेयः परीक्षणीयोऽसि त्रैयम्बकं धनुः
सज्यं कृतवते कन्यां दास्यामीत्याशयवता जनकेनेति शेषः । स्थविरो वृद्धः