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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

मन्त्ररामायण ३१
कृत्यैषा पद्धती भूत्वा जाया विशते पतिम् ॥२४॥
ऋ. १०. ८५, २९
उन दोनों के प्रस्थान करने पर ताटका को आते हुए देखकर ऋषि
बोले : विजयश्री अथवा गृहश्री को प्राप्त करने की इच्छा करने पर
पराजयरूप अथवा दारिद्र्यरूप अलक्ष्मी पहले आती है। उसमें से प्रथम
को शस्त्र से और दूसरी को दानादि से मारना चाहिये। इस ताटका
रूप अमङ्गल को दूर से मारो। दूसरी के विनाश के लिए ब्राह्मणों को
धन दो। क्योंकि वध के योग्य यह राक्षसी पादवती होने पर पत्नी के
समान पति या राजा के घर में आ जाती है।
प्रस्थितयोस्तयोः पुरस्तात्ताटकामागतां वीक्ष्य ऋषिराह–परादेहीति। विजय-
श्रियं गृहश्रियं वा प्राप्तुं गच्छतः पूर्वं पराजयरूपा दारिद्रयरूपा वा अलक्ष्मी-
रायाति। तत्र पूर्वा शस्त्रेणैव हन्तव्या, परा दानादिना हन्तव्येत्यत उक्तम्।
सामूलममङ्गल्यम् इदं ताटकारूपं परा.देहि दूरतः खण्डय, इतरस्याः विनाशार्थं
ब्रह्मभ्यो ब्राह्मणेभ्यो वसु वित्तं विभज देहि। कुतः यत एषा कृत्या वधकामा
राक्षसी पद्धती पादवती जायेव सहचारिणी भूत्वा पतिं राजानं गृहपतिं वा
विशते आयाति। एवमुक्तमात्रेण रामेण ताटका निहता विवाहात् प्राक् ब्राह्मणेभ्यो
दानानि च दत्तानीत्युपरिष्टाद्द्रष्टव्यम्। पक्षे शामूलमर्थतृष्णा सा हि कर्मोपास्ति
प्रतिबन्धहेतुर्वैराग्येण सर्वत्यागेन च हन्तव्येति भावः। अयमपि पौर्वापर एव
मन्त्रः ॥ २४ ॥
उपप्रेत कुशिकाचेतयध्वमश्वं राये प्रमुञ्चतासु दासः ।
राजा वृत्रं जंघनत्प्रागपागुदगथायजायते वर आपृथिव्याः ॥२५॥
ऋ. ३. ५३, ११
हे विश्वामित्र ! विशेष रूप से सावधान हो जाओ। कर्म समृद्धि से
युक्त, सुदास गोत्रोत्पन्न राम की आज्ञा से यज्ञ प्रारम्भ करो। राजा
राम सभी दिशाओं में स्थित विघ्नकारी राक्षसों को मार कर, यज्ञस्थान
पर आकर यज्ञ करने की आज्ञा देते हैं।
एवं ताटकां हत्वा यज्ञवाटमागंत्याहतुः–उपप्रेति। भो कुशिकाःविश्वा-
मित्रीयाः उपप्रेत समीपे प्रकर्षेणायात चेतयध्वं सावधाना भवत। राये कर्म-
समृद्धये सुदासःसुदासगोत्रोत्पन्नस्य रामस्याज्ञया अश्वं यज्ञसाधनविशेषं प्रमुञ्चत
प्रचारयत। राजा रामो वृत्रं विघ्नकरम् असुरगणं जङ्घनत् निहन्ति प्रागपागुदक्