मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० मन्त्ररामायण
ऋ॒तस्य॑ गो॒पा न दभा॑य सु॒क्रतु॑स्त्री॒षप वि॒त्राह्य(?)न्तर्राद्दधे ।
वि॒द्वान्त्स विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प॑श्यत्यवा॑ जु॒ष्टान्वि॑ध्यति क॒र्ते अव्र॑तान् ॥९॥
ऋ. ९. ७३, ८
भगवान् के कीर्तन से वाणी को पवित्र करने का क्या फल है,
उसे कहते हैं-इस प्रकार आत्मतत्त्व का रक्षक, विद्या के माहात्म्य से
दीनता और दंभ आदि से मुक्त हो जाता है । ज्ञान, दया और शौर्य
ये तीन बातें उसके हृदय में रहती हैं । वह आत्मज्ञ होकर सारे संसार
को देखता है, दीनों की रक्षा करता है और योग से अपने कर्मों को
नष्ट कर देता है ।
एवं परमेश्वरे वाचं पुनानस्य किं फलमत आह-ऋतस्येति । य एवंविधो
भगवद्गुणगानेन वाचं पुनाति स ऋतस्य गोपाः दम्भाय न भवति, आत्मतत्त्वस्य
रक्षकः विद्यामाहात्म्यादन्यैर्दम्भनाय अभिभवितुं न शक