मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्ररामायण ९१
हस्तेनेव ग्राह्य आधिरस्या ब्रह्मजायेयमिति चेदवोचन् ।
न दूताय प्रह्येतस्थ एषा तत्रा राष्ट्रं गुप्तं क्षत्रियस्य ॥१३४॥
ऋ. १०. १०६, ३
जैसे तारा को सभी देवताओं ने ब्रह्मपत्नी ब्रह्मचर्यवती कहा था,
उसी प्रकार इस निर्दोष सीता को ग्रहण करने से आपको दुःख नहीं
होगा। क्योंकि इस जन्म में रावण रूप भगवान के पार्षद के वेग
पूर्वक हरण करते समय इन्होंने उसका अनुसरण नहीं किया था। अतः
इनके द्वारा राम का कुलधर्म सुरक्षित है।
हस्तेनेति-अस्याः हस्तेनैव ग्राह्यः ग्रहणं तदेव आधिः दुःखं जातं न तारावत्
शङ्केन यतः सर्वे देवाः ब्रह्मजाया ब्रह्मचर्यवती परभार्येयमिति चाऽवाचन् इत एव
अनिच्छन्तीमेनां धर्षयतस्तव नलकुबरशापनाशो भविष्यतीत्यवदन्नित्यर्थः ॥ अतो
हन्तोः दूताय पार्षदाय रावणाय प्रह्ये प्रकर्षेण जिहीत इति प्रहीतस्मै, वेगेन
गच्छते एषा न तस्थे न तमनुसृतवती, तथा तेन प्रकारेणानया क्षत्रियस्य रामस्य
राष्ट्रोपलक्षितं कुलधर्मादिकं गुप्तं रक्षितम् ॥ १३४ ॥
देवा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तऋषयस्तपसे ये निषेदुः ।
भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धां दधाति परमे व्योमन् ॥१३५॥
ऋ. १०. १०६, ४
बलपूर्वक हरण करने वाले के लिये मृत्युप्रद, परलोक में कष्ट देने
वाली इनकी देवताओं और सप्तऋषियों ने वन्दना की ।
देवा इति-एतस्यां निमित्तभूतायां भीमा मृत्युप्रदा उपनीता बलाद्गृहीता
ब्राह्मणस्य ब्रह्मविदः दुर्धां नरकयातनां दधाति परमे व्योमन् परलोके ॥ १३५ ॥
ब्रह्मचारी चरति वेविषद्विषः स देवानां भवत्येकमङ्गम् ।
तेन जायामन्वविन्दद्बृहस्पतिः सोमेन नीतां जुह्वं१न देवाः ॥१३६॥
ऋ. १०. १०६, ५
ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई शत्रु के लिए विष के समान सोम के
द्वारा लायी गयी पत्नी को बृहस्पति ने जैसे स्वीकार किया था आप भी
सीता को स्वीकार कीजिये ।
ब्रह्मचारीति-ब्रह्मचारी प्राणः स्वाभाविकसंगृहीतः विषो व्याप्याः प्रजाः