मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
मन की अवस्थाएँ
मन की अवस्थाएँ
अब मन की अवस्थाओं को देखते हैं। मन की आठ अवस्थाएँ हैं; लेकिन मूल रूप से इसकी चार अवस्थाएँ हैं—सुषुप्ति, स्वप्न, जाग्रत और तुरीया।
कई बार जब हम बेफिक्र होकर सो जाते हैं तो हमें गहरी नींद आ जाती है। उठने पर हमें थोड़ी देर तक कुछ याद नहीं आता कि हम कहाँ हैं, कौन हैं! यह सुषुप्ति अवस्था कहलाती है। पेड़-पौधे इसी अवस्था में रहते हैं। इस अवस्था में आत्मा का वास नाभि में रहता है। यह अवस्था महा अज्ञानमय है। इसमें मन 90 प्रतिशत सक्रिय होता है, जबकि आत्मा 10 प्रतिशत चेतन होती है।
इसके बाद स्वप्नावस्था है। यह अवस्था भी बड़ी अज्ञानमय है, मूर्खमय है। इसमें आत्मा का वास कण्ठ में होता है। यह अवस्था एक धोखा है। इस अवस्था में हम कई ऐसे कार्य भी कर डालते हैं, जो हम जाग्रत में कभी भी नहीं कर सकते हैं। इसमें प्राप्त होने वाली वस्तुएँ धोखा मात्र हैं। कभी हम स्वप्न में राजा भी बन जाते हैं; पर जब 4-5 घण्टे बाद नींद खुलती है तो राज भी खत्म, फौज भी खत्म, अब अस्त्र-शस्त्र भी खत्म, महल भी खत्म। इस अवस्था में मन 75 प्रतिशत सक्रिय होता है और आत्मा 25 प्रतिशत चेतन होती है।
इसके बाद जाग्रत अवस्था है। इस अवस्था में आत्मा का वास आँखों में हो जाता है। संतों का मानना है कि यह अवस्था भी बड़ी अज्ञानमय है। इसमें प्राप्त होने वाली वस्तुएँ भी धोखा है। जैसे हम स्वप्न
में थे तो स्वप्न की सब चीजों को सच मान रहे थे, पर जागने पर सब समाप्त। इसी तरह जाग्रत अवस्था में प्राप्त होने वाली चीजें भी धोखा है। इस अवस्था में मूर्खता समायी है। हम कई बार ऐसे मूर्खमय कार्य कर डालते हैं कि बाद में पछताना पड़ता है। हम कहते हैं—यह क्या किया! अच्छा नहीं किया, ठीक नहीं किया। यदि सपना हमसे 4-5 घण्टे का सम्बन्ध रख रहा था तो यह सपना हमसे 70-80 साल तक का सम्बन्ध रख रहा है। इस अवस्था में माँ सच लग रही है, बाप सच लग रहा है, भाई सच लग रहा है, बहन सच लग रही है, रिश्ते-नाते सब कुछ तो सच-सच लग रहा है। इस अवस्था में आत्मा और मन का आधा-आधा जोर चलता है। नानक देव जी ने इस अवस्था को यूँ कहा है—
यो सपना पेखना, जग रचना तिम जान।
इसमें कछु साँचो नहीं, यह नानक साँची मान।
साहिब कह रहे हैं—
जागो लोगो मत सुवो, न करो नींद से प्यार।
जैसा सपना रैन का, ऐसा यह संसार ॥
यहु ऐसा संसार है, जैसा सैंबल फूल।
दिन दस व्यौहार के, झूठे रंग न भूल ॥
इसके बाद तुरीया अवस्था आती है। इसमें मन की 25 प्रतिशत ताकत रह जाती है जबकि आत्मा 75 प्रतिशत चेतन हो जाती है। इस अवस्था में ऋषि मुनि आदि पहुँच जाते हैं। बाकी तीन अवस्थाएँ तो स्वाभाविक हैं, आती जाती रहती हैं, पर चौथी स्वाभाविक नहीं है। इसे जीवित मरना भी कहा गया है, यानी जीते जी मरकर इस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। यह जीते जी मरना कोई ज़हर खाकर मरना नहीं है, आत्महत्या करना नहीं है। यह अध्यात्म की कहानी है, समाधि वाली बात है। पर कलयुग में कुछ अटपटी बातें हो रही हैं।
एक जगह अध्यात्म पर बातचीत हो रही थी। बीच में गधों का ज़िकर आ गया। एक संत ने फरमाया कि गधे भी समाधि लगाना सीख
चुके हैं। सब भौचक्के रह गये—“यह क्या कह रहे हो!” “हाँ! मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूँ। अभी-अभी खबर मिली है कि कुछ गधों ने जल में डूब कर जल-समाधि ले ली है। लेकिन अभी तक उन्हें समाधि का खिताब नहीं मिल पाया है। अभी इस पर बहस चल रही है कि यह सब कैसे हुआ।”
समस्या को सुलझाते हुए उसने फिर कहा—“पहले लोग ध्यान में खोकर समाधि लगाया करते थे। ऐसा करने से उनकी आयु में वृद्धि होती थी और वे अधिक-से-अधिक प्रभु का भजन कर पाते थे। आजकल यह काम थोड़ा मुश्किल हो गया है। समाधि का लगना आसान नहीं रहा। ऐसे में कुछ लोग विचार करके आसान-सी और बड़ी समाधि ले रहे हैं। शायद गधों ने भी किसी को ऐसी समाधि लेते देखा होगा। आखिर गधे तो ठहरे! बस लगा ली समाधि।”
समाधि का लेना कोई मज़ाक नहीं है। बड़ा ही कठिन कार्य है, यह। कोई अग्नि समाधि ले लेता है तो कोई जल-समाधि। अभी हमारा समाज इस दिशा में थोड़ा पिछड़ा हुआ है..... ज्यादा तरक्की नहीं हुई। अभी तक ट्रेन-समाधि, ट्रक-समाधि, आदि समाधियों वाले साधक उत्पन्न नहीं हुए। सुनने में आता है कि किसी ज़माने में जब लोग जिन्दगी से तंग आ जाते थे तो वे आत्म-हत्या कर लेते थे। आज लोग पहले से अधिक तंग हैं, पर आज पहले वाली कायरता लोगों में नहीं रही। पहले लोग खुदकुशी करके अपनी कायरता का परिचय देते थे। कोई जल में डूबकर मर जाता था तो कोई तेल छिड़क कर अपने को आग से खत्म कर देता था। आज आत्महत्या का स्थान समाधि ने ले लिया है। कोई जल-समाधि ले रहा है तो कोई अग्नि-समाधि। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि कई लोग ज़हर खाकर तो कई लोग ट्रेन के नीचे आकर भी आत्महत्या कर रहे हैं, पर उन्हें समाधि का खिताब नहीं मिल पा रहा। शोधकर्ता बताते हैं कि ये खिताब कुछ खास लोगों के लिए ही सुरक्षित होते हैं। आम जनता को ये खिताब कतई नहीं दिये जा सकते; इसलिए उन्हें बड़ी देर से इंतजार है कि कब कोई बड़ा खास आदमी ज़हर-
समाधि, ट्रेन-समाधि ले और कब समाधियों की संख्या में वृद्धि हो; क्योंकि अभी तक जल-समाधि और अग्नि-समाधि के खिताब ही बाँटे गये हैं।
कहने का भाव है कि तुरीया अवस्था ऐसी कायरता से प्राप्त नहीं होती। इसमें इंगला और पिंगला को लय कर देते हैं। इसमें साधक सब चिंताओं से मुक्त हो जाता है, क्योंकि मन, बुद्धि आदि का निग्रह हो जाता है। नींद में है तो भी चिंताओं में डूबा है, पर इसमें चिंतामुक्त हो जाता है। इसमें जाने के बाद साधक आन्तरिक जगत् को देखने में सक्षम हो जाता है। पर यह भी माया की भ्रमांक अवस्था है।
इसके बाद तुरीयातीत अवस्था आती है, जिसमें योगी लोग पहुँच जाते हैं। इसमें आत्मा बहुत चेतन हो जाती है और मन मात्र जीवित होता है। वास्तव में यह भी भ्रम है।
तुरीयातीत से परे एक अवस्था है, जिसमें योगेश्वर लोग पहुँचते हैं। इसमें मन अत्यंत सूक्ष्म होता है, पर होता है।
इसमें बड़ा अद्भुत शरीर मिलता है। इस शरीर में हाथ नहीं होते हैं, लेकिन फिर भी साधक अपने कार्य करता है। इसमें पैर भी नहीं होते, पर फिर भी साधक चलता है। गोस्वामी जी इस अवस्था को बड़े सुन्दर ढंग से बता रहे हैं—
पद बिनु चलै, सुनै बिनु काना । कर बिनु कर्म, करै विधि नाना ।
आनन रहित, सकल रस भोगी । बिन वाणी, वक्ता बड़ योगी ।
तन बिन परस, नैन बिन दरसे । गहे ज्ञान सब शेख विशेषे ।
यह विधि सब अलौकिक करनी । महिमा जाए कबन विधि वरनी ॥
यह ऐसी अवस्था है कि यहाँ देखा, वहीं पहुँच जाता है। लेकिन इस अवस्था में भी आत्मा अपने मूल रूप में नहीं आ पाती है; इसलिए ये सब अवस्थाएँ भ्रमांक हैं। मन सूक्ष्म रूप में रहता है। इस तरह मन और माया का बड़ा विशाल भ्रम है, जिसमें बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, संन्यासी, तपस्वी आदि भी झूल रहे हैं।