मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
ध्यान में मन की बाधा
ध्यान में मन की बाधा
जब भी आप ध्यान में बैठते हैं तो एक चीज़ ध्यान देना कि मन कहाँ है आपका। मन को ठूँढना। ‘मनवाँ तो दश दिशि फिरे, यह तो सुमिरन नाही।’ इच्छा भी क्रिया है, याद भी क्रिया है, निश्चय भी क्रिया है, क्रिया भी क्रिया है। इच्छा करेंगे तो इन्हीं पदार्थों में ध्यान लगेगा। वैसे गुरु कृपा से सब होना है। इच्छा का निरोध करोगे तो मन निश्चय की तरफ लगता है। फैंसला भी क्रिया है। इसे रोकोगे तो याद दिलाएगा। यह भी क्रिया है। आटोमेटिक नहीं है। याद दिलाएगा कि फसल काटनी है। दराट ठूँढेंगे। यह क्रिया है। इसलिए ध्यान में बैठो तो चार तरह से मन क्रिया करेगा। कोई बात याद आए तो चिंतन नहीं करना। स्वाँसा को समझना। स्वाँस भी क्रिया है। छोड़ने के लिए, लेने के लिए भी आप शामिल हैं। यह भी एक क्रिया है। सभी पर कण्ट्रोल कर लेंगे तो साँस अड़चन है। जब तक यह नाभि दल में घूमती रहेगी तो एकाग्र नहीं हो पाओगे। इसको पलटकर ‘शून्य में देय समय।’ यह चंचल है। शून्य समाधि का अर्थ है, जब मन संकल्प नहीं कर रहा। चारों तरफ की क्रियाओं को समाप्त कर शून्य में समाने को कहा। इसकी ताकत गुरु देगा। बिना ताकत के मन पर नियंत्रण नहीं कर पाओगे। अपनी बुद्धि, विचार से मन पर नियंत्रण नहीं हो सकता है। गुरु नाम देता है तो ‘सहजे सहज पाइये’ वाली बात हो जाती है। बहुत आराम से चीज़ें मिल जाती हैं। मन पर सवारी हो जायेगी। ‘मन ही निरंजन सबै नचावे।’ पर आगे कह रहे हैं—‘नाम होय तो माथ नमावे।।’
मन घुमाता रहता है, चंचल है। उदास हो जाते हैं, तो भी मन का हमला है। मन ड्यूटी का पाबंद है। यह तीव्र साधक है। इसने 70 युग एक बार तपस्या की है, 70 युग दूसरी बार और 64 युग तीसरी बार। यह
नहीं सोता है। आपको भटकाता रहता है। 24 घण्टे भ्रमित कर रहा है। आपको वजूद और स्वरूप की प्राप्ति नहीं होने दे रहा है। यह बड़ा ताकतवर है। सब पर मन माया का नशा है। चाहे कितना भी तप करे कोई। बड़े-2 साधकों ने तपस्याएँ भी की, पर नशा नहीं उतरा। मन का पिंजड़ा बड़ा तगड़ा है। अगर शरीर के अंदर आत्मा की कोई पहचान है तो ‘ध्यान।’ साहिब ने सुरति के अंग पर बहुत कहा। आत्मा इस पिंजड़े में कैसे रहती है ! जैसे पंछी असहाय-सा होकर पिंजड़े में बैठा रहता है। शिकारी उसका बहुत बड़ा शत्रु है। पंछी की आजादी छीन ली उसने। ऐसे ही आत्म-देव असहाय हो गया है। साहिब ने बड़े जोरदार शब्दों में कहा—‘तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन।’ मन जालिम है। यह मन काल है; सावधान रहना इससे। पंछी अपनी कोशिश से निकल नहीं सकता है। जब तक पिंजड़े का द्वार खोल ना दिया जाए। ऐसे ही ‘बिन सतगुरु बाँचे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय ॥’ आप मन को लाँघ कर नहीं जा सकते हैं। कोई न जा सका अपनी ताकत से। साहिब कह रहे हैं—‘ज्ञानहीन जाने ना भाई। जीव के संग मन काल रहाई ॥’ अब छुटकारा कैसे होगा! मन की आज्ञानुसार हम कर्म कर रहे हैं। इसी कारण जन्म-मरण में आ रहे हैं। कर्म ही कारण है जन्म-मरण का। कर्म का प्रेरक है, मन। याद रखें, अच्छे-बुरे दोनों कर्म मन के द्वारा होते हैं। ‘यह मन चीहने बिरला योगी।’
आइये, मैं थोड़ा अपने अतीत की तरफ चलता हूँ। नाम प्राप्ति के बाद मैं भजन करने लगा। स्मरण करते करते जब मैं एकाग्र हुआ तो मुझे कुछ डिस्टर्ब करने लगा। अपने अंदर जब मुझे डिस्टर्ब लगने लगे तो वो क्या कि मैं भजन करना चाहता हूँ, कोई मुझे नहीं करने दे रहा है, तो मुझे लगा कि कोई मुझे डिस्टर्ब कर रहा है। मैं और कन्संट्रेट हुआ। मैंने कहा, देखें, मुझे कौन डिस्टर्ब कर रहा है। पर मुझे डिस्टर्ब करने वाला नजर नहीं आ रहा है। मुझमें एक आकांक्षा उठी कि मैं डिस्टर्ब करने वाले को जरूर देखूँगा कि मुझे कौन व्यवधान डाल रहा है। मैं एकाग्रचित होकर काम करने लगा। धीरे धीरे वो डिस्टर्ब मुझे अब इस तरह करने लगा जैसे मेरे स्वरूप से हटकर कोई चीज कर रही है। तो मैं और सतर्क हुआ। मैंने कहा कि मैंने इस डिस्टर्ब को अच्छी तरह देखना है कि मुझे कौन
व्यवधान कर रहा है। और जब मुझे बहाया जाने लगा तो मैं एक ही वस्तु को पकड़े रहा—नाम को। तो मैं बहा नहीं। मैं अब एकाग्र होने लगा। धीरे धीरे मुझे अनुभव होने लगा। अब डिस्टर्ब जिन जिन चीजों से हो रहा है, साफ नजर आ रहा है। लेकिन अभी भी मुझे दिखाई नहीं दे रहा है। मैं स्मरण में ही रहा। मुझे जो व्यवधान आ रहा है, वो नजर आ रहा है। अभी भी व्यवधान कौन कर रहा है, यह नजर नहीं आ रहा है। मैं और कन्संट्रेट हुआ। मैं सब तरफ से सब काम छोड़कर भजन करने लगा, क्योंकि मेरे लिए एक ही चीज थी कि मुझे रुकावट कौन दे रहा है। मुझे देखना यही था। अब मैंने देखा, मुझे खाना-पीना भी डिस्टर्ब दे रहा था। मैंने कहा, छोड़ो खाने को। मैंने पक्का संकल्प किया कि जब मैं आत्मरूप हूँ तो खाना क्यों खाऊँ। मैं एकाग्र हुआ। अब मैं तो भोजन खाना नहीं चाह रहा हूँ, कोई मुझे प्रेरणा दे रहा है, अन्दर से कि खाना खाओ। मैं एकदम चेतन हुआ, मैं खाना नहीं खाना चाहता हूँ, कौन मुझे प्रेरणा दे रहा है। मैं पूरी तरह से कन्संट्रेट हुआ.....खाना नहीं खाना है। अब मुझे यूँ लगने लगा जैसे कोई कह रहा है—खाना खाओ। आपसे भी यूँ ही कहा जा रहा है। पर आप लैंगवेज पढ़ नहीं पा रहे हैं। मैंने कहा—नहीं, मैं खाना नहीं खाऊँगा, क्योंकि मैं शरीर नहीं हूँ। यह पूर्ण सच है कि मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ। खाना नहीं खाऊँगा। अब मैंने कहा कि आत्मा सोती जागती भी नहीं है। मैं जागरूक हो गया—सोऊँगा नहीं। मुझे कोई प्रेरणा दे रहा है, सो जाओ, वरना कमजोर हो जाओगे। मैंने कहा, यह तो मेरी सोच नहीं है कि सो जाओ वरना कमजोर हो जाओगे। यह कौन सोचवा रहा है। मैं और एकाग्र होने लगा। मैंने सोना भी छोड़ दिया, खाना भी छोड़ दिया और कर क्या रहा हूँ—स्मरण। अब तक एक भी श्वास मैं नहीं छोड़ना चाहता हूँ और मैं सुष्मना में आ गया। अब छः महीने जब मैं लगातार इस अवस्था में रहा तो मुझे आदेश देने वाला नजर आने लगा। मैंने कहा—तुम थे। इतने पीछे रहते हो....इतनी गहराई में। अब आमने सामने आदेश देने वाला मुझे नजर आ रहा था कि किस तरह बोलता है, किस बिंदू पर बैठा है। अब उसे कोई भी हरकत नहीं
करने दी। संसार की समग्र चीजों से मैं समग्र रूप से अलग हो गया। उसी बिंदू में मुझे परमानन्द की अनुभूति हुआ अर्थात उस आनन्द के पीछे ही मन बैठा हुआ था।
तब मैंने देखा, मैं शरीर नहीं हूँ। इन अवस्थाओं में अब एक वो आनन्द आ रहा था, आपने सुना होगा कि आत्मा आनन्द से परिपूर्ण है। यथार्थ में मैं आनन्द में था। अब मैंने कहा, शरीर की अनुभूति से ही पूरे दुख हैं, इसलिए जो भी भाव मन, शरीर हूँ, की तरफ लाता था, मैं वहीं पकड़ लेता था, यही मन है, अब बस हो चुकी है, अब अधिक धोखा नहीं, इसके बाद और कुछ नहीं।
‘मन को मार गगन चढ़ जाई।’ यह किसके द्वारा। मैंने एक चीज पकड़ी हुई थी, वरना मैं बहुत दूर बह जाता, वो था—नाम, जिसने मुझे इसके संकल्प, इसके भावों में, इसके बहाव में नहीं बहने दिया। उस बिंदू पर मैंने देखा, यही मौत है, यही काल है, इसलिए काल के अन्दर संसार के सभी जीव हैं। तब मैंने सोचा कि संसार के सभी जीव कितने बड़े धोखे में हैं। अब उसकी पूर्णता वहीं स्टाप कर दी। किसी भी आदमी को जब आप पूर्णरूप से जान जायेंगे, वो अपनी कला आपके साथ फिर नहीं करने वाला है, क्योंकि आपने उसे हकीकत में जान लिया है। पर इस बिंदु पर सब आदमी नहीं जा पायेंगे। अब आप सोचें, उसके बाद कैसी अनुभूति होगी। मैं शरीर में नीचे नहीं आता था। इसे विदेह मोक्ष कहते हैं। अर्थात—देह में विदेह दर्शै। अब विदेह पद को प्राप्त हो गया। जो इस चीज को जान जाता है, किसी भी समय मन पर विजय प्राप्त कर लेता है। अब वो अकाल हो गया, क्योंकि अब किसी भी देशकाल, अवस्था में मन से त्रुटि नहीं कर पाता है। समग्र विश्व इस मन के अन्दर है। तो मेरे भाई, यह कार्य बुद्धि से नहीं किया जा सकेगा। अब यह थी, नाम की महिमा।