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मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
Devanagarihipublished120 पृष्ठ
गुरु और सतगुरु में अंतर
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और माया से अजाद हो कर अमर-लोक चली जाती है। साहिब कहते हैं 'नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा'। इसीलिए साहिब बार-बार सुचेत करते हैं कि मैं बढ़ई वश नहीं कहता।
“जो वस्तु मेरे पास है वह ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।”
सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान।
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान ॥
पूरे संसार में गुरु और सतगुरु को एक ही सत्ता पर
स्थापत कर एक ही बात बोला जा रहा है।
आओ गुरु और सतगुरु के रहस्य को जाने
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<table border="1">
<thead>
<tr>
<th>“गुरु”</th>
<th>“सतगुरु”</th>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td>
<p>6. गुरु की पहुँच केवल दशम-द्वार तक है।</p>
<p>7. गुरु भक्ति केवल नाम-कमाई पर केंद्रित है।</p>
<p>8. गुरु भक्ति केवल सगुण-निगुण दायरे तक ही सीमित है।</p>
<p>9. गुरु तीन-लोक का गयाता है।</p>
<p>10. गुरु आत्मा का गयान नहीं दे सकता।</p>
<p>11. गुरु मुक्ति नहीं दे सकता।</p>
<p>12. गुरु मन-माया की सीमा में बँधा हुआ व्यक्तित्व है।</p>
<p>13. गुरु परमपुरुष का भेद नहीं जानता।</p>
<p>14. गुरु किसी भी जीव-आत्मा को भवसागर से पार करने की क्षमता नहीं रखता।</p>
<p>15. गुरु की पहुँच केवल निराकार सत्ता (काल निरंजन) तक ही है।</p>
<p>16. गुरु द्वारा बताए हुए सभी देशों अथवा धुनों का जिकर किया जा सकता है।</p>
</td>
<td>
<p>6. सतगुरु की पहुँच ग्यारहवें द्वार तक है।</p>
<p>7. सतगुरु भक्ति पूरी तरह गुरु ‘कृपा’ पर केंद्रित है।</p>
<p>8. सतगुरु भक्ति की सीमा अनन्त तक है, जो सगुण-निगुण से भी आगे है।</p>
<p>9. सतगुरु चौथे-लोक का गयाता है।</p>
<p>10. सतगुरु आत्मा का समर्पण गयान देता है।</p>
<p>11. सतगुरु ही केवल पूर्ण-मुक्ति का दाता है।</p>
<p>12. सतगुरु मन-माया की सीमा से ऊपर मुक्त एक अमर व्यक्ति तत्त्व है।</p>
<p>13. सतगुरु खुद परमपुरुष में मिला हुआ और उन्हीं का तदरूप है।</p>
<p>14. सतगुरु अपनी कृपा से किसी भी जीव-आत्मा को भवसागर से हमेशा के लिए पार करने की क्षमता रखता है।</p>
<p>15. सतगुरु की पहुँच सीधा परमपुरुष तक है।</p>
<p>16. सदगुरु के सार शब्द अथवा अमर लोक का खुलासा नहीं किया जा सकता।</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>