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सर्वकोश
मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)

मानसार शिल्पशास्त्र (प्रसन्ना कुमार आचार्य - प्राचीन भारतीय स्थापत्य, नगर-नियोजन व मूर्ति-शिल्प महाकोश)

Manasara on Architecture and Sculpture by P.K. Acharya

मानसार ऋषि (अनुवादक: डॉ. प्रसन्ना कुमार आचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished856 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 856 में से

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? Wait, look at: कारयेत्सर्वदोषद् भवेत्? Let's transcribe what's visibly printed: तुं [...] त्य [...] चित्तं कारयेत्सूर्वद् भवेत् ।`

:
कं [...] द त न कु [...] चिरं स्थाननाशं च निश्चयम् ॥ २७ ॥
Wait, look at the end of verse 27:
चिरं स्थाननाशं च निश्चयम् ॥ २७ ॥
The ॥ २७ ॥ is very clear!

:
अनेकजन्मकृतं पुण्यं क्षप्रमेवं विनश्यति ।
Wait, look at क्षप्रमेवं:
क्ष - प्र - म - े - व - ं = क्षप्रमेवं.
And बिनश्यति or विनश्यति?
In बिनश्यति, is the belly of ब slashed?
Look at ब in भवेत्: no, that's भ.
In विनश्यति: the circle of वि has a diagonal line inside, making it बि!
Yes, in Bengali/North Indian presses, ब is often printed with a diagonal stroke inside व. So it's बिनश्यति.

:
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पुतश(पूतं) च कारये