सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मानमेयोदय (नारायण भट्ट - भाट्ट मीमांसा प्रमाण एवं प्रमेय शास्त्र सटीक)

Manameyodaya of Narayana Bhatta with Commentary

नारायण भट्ट एवं नारायण पण्डित द्वारा

DevanagariHindipublished672 पृष्ठ

आकारग्रन्थसंकेतः | xx..
पुट. पङ्कि. सङ्केताः | पुट. पङ्कि. सङ्केताः
271 11 श्लोक 475 | 297 17 न्या. म 15
273 5 स. सि 4-18 | 298 5 स. सि 4-25
274 3 श्लोक 249 | 298 9 न्या. म 87
275 15 शा. भा 2-1-7 | 299 4 प्र. क 4 प्र
276 15 न्या.प.अनुमानाध्यायः | 300 12 श्लोक 242
277 7 न्यायबिन्दुटीका | 301 6 प्रमाणपद्धतिः
278 3 श्लोक 157 | 301 12 श्रीभा. ख्यातिवादः
278 8 प्र. त 1-3 | 302 14 स. सि 4-11
278 11 ,, 90 | 302 17 खण्डनखण्डखाद्यम्
279 1 न्या. कु 4 स्त. | 303 1 वेदान्तपरिभाषा
279 7 न्या. र 157 | 303 15 स. सि 4-16
280 5 श्लोक 318 | 304 15 श्लोक 255
280 17 ,, 833 | 305 7 काव्यप्रकाश सं 67
281 1 प्रक. 5 प्र. | 306 7 स. सि 3-50
281 17 न्या. सू 1-1-15 | 306 9 ,, 4-18
282 9 आत्मसिद्धिः 21 | 306 20 श्री भा. ख्यातिवाद
283 5 न्यायपरिशुद्धिः 21 | 307 7 श्लोक 218
284 17 न्या. म 432 | 310 2 वा. प 2-441
284 19 प्रमाणपद्धतिः | 310 5 न्या. म 448
285 4 न्यायपरिशुद्धेः | 311 11 वा. प. 2-347
287 1 श्लोक 54 | 312 3 शा. भा 1-1-5
290 2 त. कौ 64 का | 312 15 पात. 4-19
290 11 प्र. क 4 प्र. | 313 9 स. सि 4-2
291 5 न्या कु 2 स्त. | 317 9 त. कौ 5 का
294 14 भा. भा 123 | 317 17 न्या. म 23
294 20 न्या. म 17 | 317 19 न्या. म 33
295 3 अधिकरण 2-2-30 | 318 3 पात. 4-1
295 15 श्लोक 327 | 319 11 श्लोक. 88
296 7 स. सि 4-30 | 319 12 तञ्च. 178
297 3 श्लोक 279 | 319 15 श्लोक. 75
M. R. | c

xxxiv \qquad\qquad आकरग्रन्थसंकेतः
पुट. \quad पङ्क्ति. \quad सङ्केताः \qquad\qquad\quad\mid\quad पुट. \quad पङ्क्ति. \quad सङ्केताः
३२१ \quad १ \quad आप. ध. व्या १-१-२ \quad\mid\quad ३४५ \quad १९ \quad न्या. सू २-१-२८
३२१ \quad १७ \quad श्लोक. ९१ \qquad\qquad\mid\quad ३४६ \quad ३ \quad न्या. म ४३२
३२२ \quad ३ \quad न्या. सि १ परि \qquad\quad\mid\quad ३४६ \quad ५ \quad न्या र १७६
३२२ \quad १३ \quad न्या. म १०५ \qquad\qquad\mid\quad ३४७ \quad ७ \quad ,, \qquad ५९०
३२४ \quad १ \quad स. सि ३-२ \qquad\qquad\mid\quad ३४७ \quad ९ \quad ,, \qquad ५९२
३२४ \quad ३ \quad ,, \qquad ३-७६ \qquad\mid\quad ३४७ \quad १३ \quad श्लोक. १६९
३२४ \quad ६ \quad न्या. म १०८ \qquad\qquad\mid\quad ३४७ \quad १७ \quad वा. प १-१२४
३२४ \quad १० \quad स. सि ४-११६ \qquad\quad\mid\quad ३४८ \quad ७ \quad न्या. सू १-१-४
३२५ \quad १९ \quad स. सं ३ द \qquad\qquad\mid\quad ३४९ \quad १ \quad सि. मु १३५ का
३२६ \quad ३ \quad भ. गी ४-३८ \qquad\qquad\mid\quad ३४९ \quad ३ \quad वि. वि ११४
३२६ \quad ७ \quad भा. भा १२३ \qquad\qquad\mid\quad ३४९ \quad ११ \quad त कौ २७ का
३२६ \quad १९ \quad वै. भाष्यम्. \qquad\qquad\mid\quad ३५० \quad १ \quad न्या. र ५७८
३२७ \quad ३ \quad न्या. म ५३६ \qquad\qquad\mid\quad ३५० \quad ७ \quad श्लोक १७३
३२९ \quad ५ \quad न्या. र २६४ \qquad\qquad\mid\quad ३५२ \quad १ \quad वे. सं ४९
३३३ \quad ३ \quad त. कौ ११ का \qquad\quad\mid\quad ३५२ \quad १९ \quad न्यायबिन्दुटीका
३३३ \quad ६ \quad न्या. ता १४६ \qquad\qquad\mid\quad ३५४ \quad ७ \quad मानमेयोदयः
३३३ \quad १३ \quad श्लोक. २९२ \qquad\qquad\mid\quad ३५४ \quad ११ \quad प्र. क ५ प्र
३३४ \quad १ \quad ,, \qquad २८५ \qquad\mid\quad ३५६ \quad ५ \quad न्या. म ६४
३३६ \quad १९ \quad स. सि ४२० \qquad\qquad\mid\quad ३५६ \quad १५ \quad न्या. र ७५९
३३८ \quad १९ \quad न्या. म ४४८ \qquad\qquad\mid\quad ३५८ \quad ७ \quad श्लोक. ७७५
३४० \quad ७ \quad ,, \qquad ४५३ \qquad\mid\quad ३५९ \quad १६ \quad श्लोक. ४१३
३४१ \quad ११ \quad श्लोक. ८४१ \qquad\qquad\mid\quad ३६० \quad १ \quad स. सि ४-४१
३४३ \quad १ \quad न्या. सू ३-१-१९ \qquad\mid\quad ३६२ \quad ५ \quad प्र. त ३-९
३४३ \quad ९ \quad स. सि १-२६ \qquad\qquad\mid\quad ३६२ \quad ७ \quad स. सि ४-५८
३४३ \quad १७ \quad न्या. कु १ स्त \qquad\quad\mid\quad ३६३ \quad ९ \quad न्या. म १२४
२४३ \quad १९ \quad न्या. सि १ परि \qquad\quad\mid\quad ३६४ \quad ७ \quad न्या र ४८८
३४४ \quad ९ \quad तन्त्र. ८१ \qquad\qquad\mid\quad ३६४ \quad ९ \quad न्या. त १०५
३४४ \quad १३ \quad न्या. सू ४-२-२९ \qquad\mid\quad ३६६ \quad २ \quad स. सं २ द्.
३४५ \quad ७ \quad न्या. म ९२ \qquad\qquad\mid\quad ३६६ \quad ५ \quad न्या. कु. १ स्त
३४५ \quad १५ \quad प्रक. ५ प्र \qquad\qquad\mid\quad ३६६ \quad १५ \quad न्या. र ३९६

आकरग्रन्थसङ्केतः
पुट. | पङ्कि. | सङ्केताः | पुट. | पङ्कि. | सङ्केताः
367 | 7 | न्या. र 402 | 383 | 16 | तत्त्वचिन्तामणि
368 | 7 | न्या. म 33 | 384 | 7 | न्या. म 122
368 | 9 | न्या. र 250 | 384 | 10 | न्या. मा 57
369 | 2 | न्यायक 167 | 384 | 11 | श्लोक 348
369 | 11 | स. सि 4-42 | 385 | 5 | न्या. मा 122
370 | 5 | न्या. म 109 | 385 | 17 | श्लोक 381
371 | 3 | सि. मु 136 ता. | 386 | 3 | न्या. मा 56
371 | 19 | श्लोक 359 | 386 | 13 | प्र. त 3-38
372 | 11 | स. सि 4-43 | 386 | 18 | न्या. म 111
374 | 8 | ,, 4-44 | 387 | 3 | न्या. र 387
374 | 15 | न्यायपरिशुद्धिः | 387 | 14 | श्लोक 585
375 | 13 | प्र. त 3-11 | 389 | 7 | न्यायपरि 79
375 | 14 | ,, 2-1 | 389 | 18 | स. सि 4-53
376 | 2 | न्यायपरि | 390 | 17 | तत्त्वमुक्ता 4-51
376 | 10 | न्या. र 402 | 391 | 2 | स सि 4-49
376 | 20 | प्र. त 13 | 391 | 15 | न्या. वा 120
377 | 7 | न्यायपरि 150 | 392 | 20 | न्या. म 118
377 | 17 | न्यायबिन्दुः | 393 | 3 | ,, 123
377 | 19 | न्या. र 377 | 394 | 3 | वैशेषिकभाष्यम्
378 | 8 | किर 143 | 394 | 6 | न्या. भा 1-1-32
378 | 11 | न्या. ता 109 | 395 | 8 | न्या. म 584
378 | 13 | वैशेषिकभाष्यम् | 395 | 11 | मानमेयोदयः
378 | 15 | न्या. सू 1-1-5 | 396 | 1 | प्र. त 3-9
379 | 5 | वै. सू 3-2-7 | 396 | 5 | ,, 3-13
380 | 1 | श्लोक 392 | 396 | 15 | ,, 3-42
381 | 9 | न्या. म 133 | 397 | 9 | न्या. र 250
381 | 15 | न्यायपरि 80 | 397 | 17 | ,, 258
382 | 7 | शा. भा 1-1-2 | 398 | 5 | श्लोक 260
382 | 10 | न्या. सू 2-1-8 | 398 | 11 | ब्र. सू. शं 2-1-1
383 | 7 | न्या. र 388 | 399 | 12 | मानमेय 305

xxxvi आकारग्रन्थसंकेताः
पुट. पङ्कि. संकेताः | पुट. पङ्कि. संकेताः
399 13 वैशेषिकभाष्यम् | 419 7 श्लोक 488
400 1 सि. मु 71 का. | 419 13 न्याः र 482
400 13 प्र. त 6-47 | 419 17 श्लोक 197
401 3 स. सं 2 द् | 420 1 न्या. र 483
401 5 न्यायप 167 | 422 3 प्र. क 9 प्र.
401 8 न्या. कु 3 स्त. | 422 5 न्या. र 588
402 18 शास्त्रदी 1-1-5 | 422 17 ,, 941
403 5 श्लोक. 375 | 423 5 ,, 410
403 20 न्यायप. 175 | 423 7 ,, 562
404 5 न्या. म 590 | 424 5 श्लोक. 410
405 10 शतदू. 9 | 424 7 ,, 432
405 11 स सि 4-63 | 424 11 न्या. र 503
407 9 न्या. ता 499 | 425 10 मानमेय 411
408 11 श्लोक 433 | 427 17 सं. वा 500 श्लो
409 7 न्या. भा 1-1-6 | 427 20 न्या. र 402
409 17 न्या र 435 | 428 1 श्लोक. 418
409 19 न्या. कु 3 स्त | 428 8 न्याः कु 3 स्त
410 4 श्लोक. 433 | 428 19 श्लोक. 913
411 9 न्या. म 245 | 429 5 ध्वन्या 200
411 12 श्लोक. 680 | 430 12 मानमेयोदयः
411 17 वै. सू 7-2-20 | 430 17 मानमेय 110
412 3 श्लोक 450 | 431 7 न्या. कु 2 स्त
413 1 प्रक 5 प्र. | 431 9 न्या. र 909
413 19 न्या. कु. 3 स्त | 432 3 ,, 367
414 5 श्लोक 463 | 432 9 काव्यप्रकाशसं 2
415 3 पा. सू 1-4-36 | 433 2 मानमेय 519
415 7 श्लोक 49 | 433 11 न्या. सि 6 परि
415 11 ,, 475 | 434 9 स. सि 4-81
417 5 न्या. कु 3 स्त | 435 3 श्लोक. 924
418 1 न्या. र 486 | 435 6 शब्दशक्तिप्रका

आकरग्रन्थसङ्केतः
पुट. पङ्क्ति सङ्केताः | पुट. पङ्क्ति सङ्केताः
436 1 वा. प 1-134 | 458 1 न्या. ता 42
436 7 तन्त्र 199 | 458 8 तन्त्र 80
437 8 स्तोत्ररक्षा 4 श्लो. | 458 15 जै. मा 12
437 9 तन्त्र 233 | 460 7 प्रक. अतिदेशपार
438 1 ,, 157 | 463 6 तन्त्र 731
438 5 ,, 429 | 463 11 न्यायसु 3-3-14
438 11 ,, 535 | 463 13 बालप्रकाशः
441 17 ऋक्संहिता 10-71-3 | 463 19 न्या. म 589
441 18 मनु 2-1 | 465 10 बालप्रकाशः
442 2 तन्त्र 132 | 469 12 सुधीविलोचनम्
442 12 स. सि 4-113 | 470 9 वि. वि 450
443 15 तन्त्र 115 | 485 6 तन्त्र 337
444 19 श्लोक 59 | 487 5 वै. सू. वृ 5-1-1
445 19 तन्त्र 170 | 487 19 न्या. सू 3-1-25
446 10 स. सं 2 दृ | 488 19 न्यायसु 26
446 18 न्या. कु 1 स्त | 489 4 वि. वि 243
449 20 आप-परिभाषा | 489 7 न्या. सू 1-1-24
450 15 स. सि 594 | 489 15 न्या. कु 5 स्त
451 7 स्मृतिचन्द्रिका | 490 3 वा. प 2-1
452 11 आगमप्रामाण्यम् | 490 17 ,, 2-30
452 20 न्यायपरिशुद्धिः | 491 3 रघुवं 1-1
453 15 श्रुत. अथशब्दार्थः | 491 19 वा. प 2-145
454 14 न्यायसुधा 183 | 492 1 ,, 2-30
455 4 न्या. भा 4-1-62 | 494 7 ,, 2-57
455 8 ब्र. सू 2-1-1 | 494 11 न्या. म 330
455 14 न्या. भा 1-1-1 | 495 15 तन्त्र 345
455 18 मनु 7-43 | 496 7 पा. भा 4-20
456 3 न्यायपरिशुद्धिः | 497 11 तन्त्र 351
456 11 प. म 15 भ. | 498 5 ,, 345
457 7 श्लोक 209 | 498 8 न्यायसु 579

xxxviii आकरग्रन्थसंकेताः
पृट. पङ्क्ति सङ्केताः | पृट. पङ्क्ति सङ्केताः
499 5 भाट्टररहस्यम् | 526 12 रामा 7-74
499 15 वि. चि 48 | 526 16 हेमा 661
499 17 न्या. म 345 | 526 19 गौ. ध 3-36
501 3 तन्त्र 240 | 527 1 ब्र. सू 3-4-18
502 7 जै. सू 6-2-9 | 527 10 मनु 4-176
503 1 भगी 4-1 | 527 12 प. म 6 भ.
503 7 प्रक. वाक्यार्थमातृका | 528 3 भ. गी 16-21
507 11 वादावलिः | 528 5 बृ. उ 7-2
508 5 तात्पर्यदी 215 | 528 13 न्या. ता 97
508 11 श्लोक 930 | 528 17 संबन्ध. 1008 श्लो
511 5 याज्ञ 3-219 | 529 3 रामा 2-105
511 13 न्या. सु 603 | 531 3 गौ. का 2-29
512 2 न्या. सू 3-1-25 | 531 10 तै. उ 4-10
512 16 न्या. म 356 | 531 12 मनु. 2-94
513 17 तन्त्र 240 | 531 18 श्वेता. 4 अ.
514 14 न्या. सू 1-1-24 | 531 19 तै. सं 6-3-10
515 14 न्या. कु 5 स्त. | 531 20 गौ. ध 3-36
515 17 वे. सं 214 | 532 7 वे. सं 248
516 10 अधिकर 20 श्लो. | 532 15 स. सि 2-75
519 9 न्या. म 395 | 533 2 न्या. सि 2 परि.
519 18 स. सि 4-91 | 533 13 न्यायपरिशुद्धिः
520 8 श्लो. क 432 | 534 9 तै. उ. शं 1-1
521 1 न्या. र 909 | 534 11 किर. 8
521 17 न्या. म 401 | 534 14 तन्त्र. 241
523 4 मनु 2-224 | 534 14 प्रक. 8 प्र.
523 10 भारत 18-6 | 537 15 न्या. भा 4-1-63
524 9 विष्णु 1-18 | 540 7 प्रश्नो. शं 6-3
524 14 तन्त्र 16 | 540 11 स. सं 6 दृ.
525 10 वे. सं 199 | 541 4 श्लोक. 695
525 18 भ. गी 17-11 | 541 6 तन्त्र. 375

आकरग्रन्थसङ्केतः xxx
पृष्ट. पङ्क्ति. सङ्केताः | पृष्ट. पङ्क्ति. सङ्केताः
541 13 संवित्सिद्धिः | 552 7 भा. भा 175
542 17 स. सि 2-17 | 552 15 वि. वि 440
542 20 न्या. कु 1 स्त. | 553 11 जै. सू 6-2-9
543 5 श्लोक. 696 | 554 1 याज्ञ. 1-123
544 7 ,, 105 | 554 2 मनु. 11-16
544 13 श्रीभा. 2-2-3 | 554 7 न्या. मा 193
545 1 श्लोक. 667 | 554 13 श्लोक 671
545 9 पा. भा 2-22 | 555 10 न्या. कु 1 स्त
545 13 न्यायक. 270 | 555 17 स. सं 3 द.
545 17 वै. भा गुणभागः | 557 11 याज्ञ. 3-113
546 5 न्यायसु. 330 | 559 13 स. सि 1-4
546 13 श्लोक. 671 | 560 16 सिद्धान्तलेशः
546 17 पा. भा 2-13 | 562 11 स. सि 4-18
547 5 न्या. म 520 | 563 11 शतदू. 7 स.
547 10 भ. गी 18-66 | 565 9 तात्पर्यदी. 2-3
547 12 ब्र. सू 4-1-7 | 565 5 वे. सं 248
548 4 संबन्ध. 117 | 565 9 काव्यालंका 2-2-2
548 15 न्या. सु 330 | 567 1 आगमप्रामाण्यम्
548 19 तै. उ शं 1-1 | 568 15 श्रीभा. 2-2-42
549 5 मु. उ 1-2 | 569 12 श्रीभाष्यारम्भे
549 6 भ. गी. 2-42 | 569 16 अधिकरण 15 श्लो
549 10 किर 12 | 571 1 ब्र. सू. 4-4-22
549 17 संबन्ध 238 श्लो. | 571 3 ,, 2-3-46
549 19 ब्र. सू 3-4-2 | 571 5 ,, 1-3-22
550 3 संबन्ध. 1133 श्लो. | 571 8 भ. गी. शं. 13-4
550 5 ,, 345 श्लो. | 571 13 ब्र. सू. 1-1-1
550 9 बृ. उ 6-4 | 572 3 भामत्यारम्भे
550 11 सिद्धान्तलेशसंग्रहः | 572 8 तत्त्वटीका
551 11 भा. भा 207 | 573 12 नैष्कर्म्य 90 श्लो.
552 1 श्रीभा. 1-1-4 | 574 11 स. सि 3-79

xi आकारग्रन्थसंकेताः
पुट. पङ्क्ति. सङ्केताः | पुट. पङ्क्ति. सङ्केताः
575 11 वे. सं 170 | 593 13 स. सि 2-42
575 19 छान्दो 8-1-1 | 594 1 भ. गी 9 माध्यायः
576 19 तै. उ 4-50, 51 | 594 7 ,, 18-56
576 18 श्वेता 6-18 | 594 19 पाञ्चरात्ररक्षा
577 1 छान्दो 2-2-23 | 595 3 प्र. त 166
577 4 रहस्यत्रयसारः | 595 8 गौतमधर्ममस्करी
579 3 न्या. सि 2 प | 596 3 भ. गी भा व्या 18-
579 8 भ. गी 18-66 | 597 1 शा. भा 1-1-20
581 7 न्यासदशकम् | 597 1 ब्र. सू 4-4-5
581 9 न्या. म 507 | 598 9 पाणिनि 4-4-34
582 15 किर 12 | 598 19 मनु 12-9
584 7 दिनकरीयारम्भे | 599 2 श्रीभाष्य
584 13 तन्त्र 240 | 600 16 न्या. कु 1 स्त
586 7 श्लोक 669 | 602 3 तत्त्वचिन्ता मङ्गलव
586 11 ,, 667 | 603 8 श्रीभा महापूर्वपक्ष
586 13 ,, 670 | 603 14 श्लोक 362
587 9 तन्त्र 16 | 604 7 शतदू 11 भ
587 11 श्लोक 673 | 605 17 तै. ब्रा 3-12-9
589 20 शास्त्र-मोक्षवादः | 606 1 कठोप 2-8
590 1 जै. सू 6-1-2 | 606 3 ,, 6-12
590 6 ब्र. सू 1-3-33 | 606 7 ,, 2-9
590 7 बृ. उ 5-5 | 606 9 केनोप 4
590 13 स. सि 2-37 | 606 11 जै. सू 1-1-2
590 13 सिद्धान्तलेश 3 प. | 606 12 ब्र. सू 1-1-3
591 3 मुण्ड. शं 1-1-1 | 606 13 ,, 2-1-10
591 4 वेदान्तपरिभा. व्या | 606 15 वा. प 1-34
591 18 सिद्धान्तलेश 3 प. | 606 19 ,, 1-137
592 18 ब्र. सू. शं 3-4-50 | 607 1 ,, 2-316
593 5 छान्दो 8-15 | 607 3 ,, 1-139
593 7 बृ. उ 5-5 | 607 9 मनु. 12-106

आकरग्रन्थसङ्केतः XII
[पृ]ट. पङ्कि. सङ्केतः | पुट. पङ्कि. सङ्केतः
607 11 मनु. 4-256 | 614 3 श्लोक. 75
607 13 स्मृतिचन्द्रिका | 614 5 ,, 88
608 1 न्या. सु 350 | 614 7 तन्त्र. 178
609 18 तन्त्र. 104 | 614 11 आ. ध-व्या 1-1-2
610 7 वा. प 2-119 | 615 16 प्र. चं 2-4
610 9 ,, 1-123 | 615 18 विष्णु. 3-18
610 11 ,, 2-149 | 619 1 स. सि 3-68
611 5 न्या. म 589 | 619 5 श्लोक. 202
612 11 वृ.-उ 4-4 | 619 9 ,, 331
612 13 स्मृतिचन्द्रिका | 622 5 मा. वृ 4
613 5 वा. प 2-140 | 622 9 त. टी 86
613 11 श्लोक. 520 | 628 17 रामा. 2-105
613 17 वा. प 2-143 | 628 18 भारत. शा 328

The provided image appears to be a blank page (containing only a few minor scan artifacts/dots) with no readable text to transcribe.

॥ श्रीरस्तु ॥
मानमेय रहस्य श्लोकवार्तिक प्रारम्भः

प्रमेयकाण्डः.
(1) पीठिका
1 शुद्धस्वाभाविकप्रज्ञाशक्तिकारुण्यभूषणम् ।
नमिकर्मीकरोम्यद्यं विद्यादेवं श्रियः पतिम् ॥
अभिवन्द्य महोदारामस्मद्गुरुपरंपरम् ।
किंचित् करोमि जगतां प्रज्ञाविभवतोऽधुना ॥
2 यः श्रीलक्ष्मीपुरंश्रीनिवासार्यो विदुषां मणिः ।
यं जन्मना ब्रह्मणा च वेंकटस्वाम्यजीजनत् ॥
श्रीमान् रामानुजाचार्यो येन पौत्र्यजयत् क्षितौ
श्रीमत्तिरुमलै नल्लान् वात्स्यवंशाब्धिचन्द्रमाः ॥
श्रीमत्कस्तूरिरङ्गेन्द्रविद्वद्रत्नकृपाभरः ।
सर्वतन्त्रस्वतन्त्रत्वं यस्मै प्रायच्छदव्ययम् ॥
पितृव्यस्स विरक्तश्रीरघूद्वहगुरुद्वहः ।
आत्मरक्षाभरं यस्मादादत्त करुणाकरः ॥
यस्य वृत्तिं प्रतिष्ठां चानन्यतुल्यामकल्पयत् ।
महीशूरमहीधुर्यतुर्यश्रीकृष्णभूपतिः ॥

२ मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके
यस्मिन् लोकाः प्रसीदन्ति ताताम्बातपसां निधौ।
स व्यातानीत् मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिकम् ॥
३ शास्त्रेषु विस्तृतांशस्य गतार्थत्वान्न विस्तरः ।
सुखबोधाय सारांशः संक्षेपेण प्रदर्श्यते ॥
कुतो वा नूतनं वस्तु वयमुत्प्रेक्षितुं क्षमाः ।
वचोविन्यासवैचित्र्यमात्रमत्र विमृश्यताम् ॥
प्रायः प्रागनुभूतेषु सर्वेष्वपि च वस्तुषु ।
अपूर्वरचने तत्र तुष्यन्ति हि सुमानुषाः ॥
प्रज्ञाविवेकं लभते विभिन्नागमदर्शनैः ।
कियद्वा शक्यमुन्नेतुं स्वयत्नमनुधावता ॥
तत्तदुत्प्रेक्षमाणानां पुराणैरागमैर्विना ।
अनुपासितवृद्धानां विद्या नातिप्रसीदति ॥
संकेताद्वा वासनया तथा मीमांसयाऽपि वा ।
कस्मैचिद्रोचते किंचित् मध्यस्थमनसामपि ॥
सर्वसिद्धान्तसारार्थचिन्ताचातुर्यशालिनाम् ।
न कश्चिदपराधो नः निगूढार्थनिवेदनात् ॥
प्रकाश्यते च प्रायेण स्वाभिप्रायो निबन्धृभिः ।
अत्र त्वस्मदभिप्रायः सर्वाभिप्रायसंग्रहः ॥
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य ह्यशोच्यः शोचतो जनान् ।
भूमिस्थानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥

शास्त्रारम्भः
4 मेयं मानाधीनमपि तदेवादौ निरूप्यते ।
प्रोपसर्गप्रयोगस्तु प्रमाभ्रमविवेकतः ॥
विज्ञानाद्वैतसिद्धान्ते प्रविवेको न कश्चन ।
तथाऽसत्ख्यातिसिद्धान्ते व्यवहारो ह्युपप्लवः ॥
मानाधीना मेयसिद्धिः मानसिद्धिश्‍च¹ लक्षणात्
तल्लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिरितीर्यते ॥
ज्ञातं सम्यगसम्यग्वा यन्मोक्षाय भवाय वा ।
तत्प्रमेयमिहाभीष्टं न प्रमाणार्थमात्रकम् ॥
इति न्यायविदः प्राहुः प्रमाणपरिनिष्ठिताः ।
काणादास्तु पदार्थज्ञाः प्रमेयपरिनिष्ठिताः ॥
प्रमेयं च प्रमाणं च प्रयोजनमिति त्रिभिः ।
विभागैः प्रविभक्तोऽयं प्रबन्ध इति हि क्रमः ॥
(2) शास्त्रारम्भः.
1 विषयश्च फलं चैव संबन्धश्चाधिकार्यपि ।
प्रेक्षावतां प्रवृत्त्यङ्गमनुबन्धचतुष्टयम् ॥
अभिधेयादयश्शास्त्रे कथ्यन्ते प्रथमं बुधैः ।
न निश्चीयन्त एवैते कृत्स्नशास्त्रश्रुतेः पुरा ॥
प्रेक्षावतां प्रवृत्त्यङ्गं स्यात्तथाप्यर्थसंशयः ।
अनर्थसंशयो दृष्टः निवृत्त्यङ्गं परीक्षकैः ॥

4 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके
2 तेष्वनर्थेष्वशक्यानुष्ठानं प्रथममुच्यते ।
यथा च तक्षकमणिः ज्वरपीडां हरेदिति ॥
विफलं तु द्वितीयं स्यात् काकदन्तपरीक्षणम् ।
तृतीयं चानभिमतं जननीपाणिपीडनम् ॥
असंबद्धं तुरीयं स्यात् जरद्गववचो¹ यथा ।
संभावितेनाप्येकेन प्रवृत्तिः प्रतिबध्यते ॥
इति धार्मोत्तरं वर्त्म न्यायबिन्दुमुखे स्थितम् ।
न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकारम्भेऽपि सूचितम् ॥
व्यतिरेकदृशः केचित् केचिदन्वयदृष्टयः ।
प्राचीनाः प्रायशः पूर्वे पराचीनाः परे मताः ॥
ततोऽभिधेयसम्बन्धकथनं स्यादिहादितः ।
तच्चाभिधेयसम्बन्धसमर्थनमपीष्यते ॥
3 प्रमाणनयतत्त्वाख्यालोकालंकारमूलके ।
रत्नाकरावतारेऽस्य निदानं विदितं यथा ॥
शास्त्रादावभिधेयार्थो दुर्निंरूपोऽभिधित्सितः ।
सोऽसंबद्धोऽथ संबद्धः नाद्यः प्रागेकवाक्यतः ॥
सर्वशास्त्रार्थसंदर्भगर्भाविर्भावसंभवात् ।
कृतं शास्त्रेण शेषेण बहलक्लेशकारिणा ॥
¹ जरद्गवः कम्बलपादुकाभ्यां द्वारि स्थितो गायति मद्रकाणि ।
तं ब्राह्मणी पृच्छति पुत्रकामा राजन् रुमायां लवणस्य कोऽर्घः ॥

शास्त्रारम्भः 5
नान्त्यश्शब्दाभिसंबन्धे विकल्पानुपपत्तितः ।
संयोगाद्यास्तु संबन्धाः नैव संभावनापदम् ॥
तादात्म्यं वा तदुत्पत्तिः वाच्यवाचकताऽथवा ।
स्यादाद्यपक्षे प्रायेण जगतो मिश्ररूपता ॥
क्षुरमोदकशब्दाभ्यां स्यातां पाटनपूरणे ।
द्वितीयपक्षोऽपि मिथोऽनुपलम्भपराहतः ॥
तृतीयोऽपि स्वरूपं वा भिन्नो वेति विकल्प्यते ।
आद्ये नाधिकमुक्तं स्यात् अन्त्ये नित्योऽथवेतरः ॥
नित्यश्चेन्नित्यतापत्तिः एतत्संबंधिनोरपि ।
अनित्यश्चेत्स्वरूपं चेत् नाधिकं स्यादितीरितम् ॥
भिन्नश्चेदनवस्था स्यात् तादात्म्यादिविकल्पतः ।
सर्वेषामपि नित्यत्वं क्षणभङ्गपराहतम् ॥
दुर्ग्रहश्चापि संकेत: स्वरसक्षणभङ्गिनी ।
विकल्पयोनयश्शब्दा विकल्पाइशब्दयोनयः ॥
कार्यकारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यमी ।
इति प्राचामुक्तिरेषा सकलार्थप्रदर्शिनी ॥
अतोऽभिधेयसंबन्धभङ्गुरः शास्त्रडम्बरः ।
सोऽयं सौगतसिद्धान्तः शास्त्रारम्भप्रभञ्जकः ॥
4 क्षेप्तुं वादानवमादीन् दृश्यते किल वार्तिके ।
सिद्धे शब्दार्थसंबन्ध इति वाररुचं वचः ॥

6 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके
शब्दे चार्थे च संबन्धे नित्य एवेति तद्वचः ।
व्याख्यातं भाष्यकारेण पतञ्जलिमहर्षिणा ॥
औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन संबन्ध इत्यपि ।
जैमिनिसूत्रयामास शब्दार्थान्वयनित्यताम् ॥
नित्याश्शब्दार्थसंबन्धाः समाम्नाता महर्षिभिः ।
सूत्राणां सानुसन्त्राणां भाष्याणां च प्रणेतृभिः ॥
इति वाक्यपदीयेऽपि प्राह भर्तृहरिः स्वयम् ।
यश्शब्दाद्वैतसिद्धान्तप्रतिष्ठापनदेशिकः ॥
5 सर्वस्यैव हि शास्त्रस्य कर्मणो वाऽपि कस्य चित् ।
यावत्प्रयोजनं नोक्तं तावत्तत्केन गृह्यते ॥
सिद्धार्थं सिद्धसंबन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते ।
ग्रन्थादौ तेन वक्तव्यस्संबन्धः सप्रयोजनः ॥
संबन्धोऽस्ति च नित्यश्चेत्युक्तमौत्पत्तिकादिना ।
अप्रामाण्यनिरासार्थं, तद्द्वयं नेष्यते परैः ॥
वाच्यवाचकसंबन्धनिषेधे लोकबाधनम् ।
विरोधश्च स्ववाक्येन न हि संबन्धवर्जितैः ॥
प्रतिज्ञार्थं पदैः शक्यः प्रतिपादयितुं परः ।
तस्माद्गमकतारूपः वृद्धेभ्यस्त्विह शिक्ष्यते ॥
इति कौमारिले श्लोकवार्तिके चोपबृंहणम् ।
अत एव हि शब्दादेर्नित्यताऽस्थापि सूरिभिः ॥

मङ्गलविचारः
6 जात्याख्यस्यातिरिक्तस्य नित्यस्यापि च वस्तुनः
स्वीकारोऽपि च शिक्षायै स्यात्प्रपञ्चापलापिनाम् ।
कर्मैकं बुद्धिरप्येका जगत्येकस्सितो गुणः ।
वर्णोऽप्येको गकारादिरिति वादा अपीदृशाः ॥
तस्मादादौ शास्त्रकृतामर्थसम्बन्धसूचनम् ।
साधने पर्यवसितं शास्त्रारम्भोऽयमुच्यते ॥
इदानींतनशास्त्रेषु तद्विशेषविचिन्तना ।
प्रवर्तते युक्तिमूला सति कुड्येऽनुलेपवत् ॥
(3) मङ्गलविचारः.
1 प्रारिप्सितसमाप्त्यर्थं शिष्टाः कुर्वन्ति मङ्गलम् ।
आचारानुमितश्रुत्या तद्धेतुत्वं हि मीयते ॥
प्रमिते साधनत्वेऽस्मिन् श्रुत्यैव निरपेक्षया ।
व्यभिचारः परीहार्यः क्वचिच्चित्रादिनीतितः ॥
फलानन्तर्यनियमो यदि हेतुत्वमिष्यते ।
व्यभिचारस्य शङ्कैव न हि स्यादवकाशिनी ॥
तत्स्यादारब्धकर्माङ्गं प्रागनुष्ठानदर्शनात् ।
विघ्नध्वंसस्तदत्यन्ताभावो वा द्वारमिष्यते ॥
समाप्यतामिदं कर्म निर्विघ्नमिति कामना ।
यदा श्रुतित एव स्यात् तदा द्वारत्वनिर्णयः ॥

8 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके
संशयो निश्चयो वाऽत्र विघ्नज्ञानं प्रवर्तकम् ।
समाप्तिकामो विघ्नज्ञः सोऽधिकार्यत्र बोध्यते ॥
२ प्रधानं मङ्गलं केचित् अदृष्टद्वारतः पुनः ।
फलं समाप्तिः तत्कामो ह्यधिकारीति जानते ॥
३ प्रारिप्सितं निमित्तं स्यादाविघ्नेन समापनम् ।
प्रचयश्च फलं चेति केचिन्नैमित्तिकं विदुः ॥
मङ्गलाचरणे तस्मात्काम्यशङ्का व्यपोद्यते ।
समाप्तिकामना तु स्यादधिकारिविशेषणम् ॥
४ परे त्वदृष्टद्वारेण मङ्गलस्य फलं विदुः ।
विघ्नसंसर्गविरहं समाप्तिस्तु ततः फलम् ॥
५ चतुर्षु पक्षेष्वेतेषु कंचित्स्वीकृत्य सूरयः ।
विवदन्ते गुरुलघुविमर्शनविचक्षणाः ॥
प्रथमं परिगृह्णन्ति पक्षं प्राञ्चस्तु तार्किकाः ।
नव्यनैयायिकानां तु तुरीयः पक्ष ईप्सितः ॥
६ आद्यपक्षे व्यभीचारं नास्तिकादिनिबन्धने ।
अन्यथासिद्धिमपि वा विघ्नध्वंसेन ते विदुः ॥
७ न मङ्गलं महाभाष्ये दृश्यते नापि पाक्षिले ।
न शाबरे शाङ्करे वा तथेदानींतने क्वचित् ॥
मङ्गलं न निबध्नन्ति ग्रन्थे केचिद्विपश्चितः ।
कुर्वन्तो वा न कुर्वन्तो न हि तद्वेदितुं क्षमम् ॥

सिद्धान्तविचारः 9
माण्डूक्यगौडपादीयभाष्ये श्रीमति शाङ्करे ।
यथाबलं नमस्कारो व्यवहार इतीरितः ॥
8 निबध्नतामयं भावश्शिष्याणां शिक्षणं तथा ।
महिष्ठमङ्गलावाप्तिः स्वकृतस्यानुकीर्तनात् ॥
9 दण्ड्यादिभिर्महाकाव्यारम्भस्याङ्गमितीरितम् ।
सर्गबन्धो महाकाव्यमुच्यते तस्य लक्षणम् ॥
आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम् ।
तदाहुः मङ्गलं काव्यस्यैवाङ्गमिति केचन ॥
10 तन्मानसं वाचिकं च कायिकं चेत्यपि त्रिधा ।
समष्टिव्यष्टिरूपेण सर्वत्रास्तीति केचन ॥
एवं मङ्गलतत्त्वार्थविचारो मङ्गलात्मकः ।
मङ्गलाचारयुक्तानां विनिपातं निवारयेत् ॥
(4) सिद्धान्तविचारः.
1 प्रामाणिक इति ज्ञातो ह्यर्थः सिद्धान्त इष्यते ।
आवापोद्वापभेदानामिदानीमपि दर्शनात् ॥
2 अभिमानैकमूलत्वात् अन्योन्यं च विरोधतः ।
न कश्चिद्यदि सिद्धान्तः नैवं तत्सिद्धयसिद्धितः ॥
सिद्धान्ताभाव एवायं प्रामाणिक इतीष्यते ।
नेष्यते वा द्विधाऽप्येवं सिद्धः सिद्धान्तसंग्रहः ॥
M.R. 2

10 मानमेयरहस्यश्लोकवार्तिके
3 सर्वं शून्यमिति प्राहुः केचिद्विज्ञानमित्यपि ।
अपोहवादिनस्सर्वं व्यावृत्तिरिति मेनिरे ॥
4 सर्वं सदित्येकमिति संख्येकान्तेषु चादिमः ।
शून्याद्वैतं सदद्वैतं विज्ञानाद्वैतमेव च ॥
शब्दाद्वैतं तथा कालाद्वैतमित्यादि विस्तरः ।
सर्वं नित्यमनित्यं च द्विसंख्येकान्तवादिनाम् ॥
ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयमिति त्रिसंख्येकान्तवादिनाम् ।
मानं मेयं मितिर्मातेत्याहुरेवं ततः परे ॥
रूपं संज्ञा च संस्कारः वेदनाऽनुभवस्त्विति ।
पञ्च स्कन्धा इति प्राहुः सौत्रान्तिकमुखाः परे ॥
जीवो धर्मोऽप्यधर्मश्च पुद्गलः काल एवच ।
आकाश इति षड्द्रव्यं षडभिज्ञाः प्रचक्षते ॥
एवं सप्तादिसंख्यानामेकान्ता अपि सम्मताः ।
ततश्च षष्टितन्त्रं यत्संदृष्टं कपिलादिभिः ॥
संख्येकान्तानुरोधेन तत्सांख्यं प्रथितं भुवि ।
सांख्या हि तत्त्वगणनापरायणतया स्थिताः ॥
प्रबोधचन्द्रोदयोक्तिरप्येवं तत्र साक्षिणी ।
ज्ञानप्रधानं यच्छास्त्रं तत्सांख्यमिति केचन ॥
तपःप्रधानं शास्त्रं तु पातञ्जलमिति स्थितम् ।
यमादयस्तपोरूपास्तत्रैव हि विशोधिताः ॥