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महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 139 में से

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पृष्ठ 124

११४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
अर्थात् हे गरुत्मन् ! हे पक्षि-राज ! हे नारायण-प्रीति-प्रद ! हे वज्र-चोंच ! हे तीक्ष्ण-नख ! तुम्हारे पक्ष
स्वर्ण-मय हैं। हे खगेन्द्र ! हे पक्षि-राज ! तुम्हें बारम्बार नमस्कार है (२६०) । हे अरि-दर्पघ्न ! तुम जैसे विष्णु
के पास हाथ जोड़कर बैठते हो, वैसे ही मुझे भी विष्णु के आगे बैठाओ (२६१) । तुम्हारे प्रसन्न होने पर जगन्नाथ
प्रसन्न होकर सिद्धि देते हैं।
देवता के लिए दिए द्रव्यों को दक्षिणा देवता को प्रदान करे (२६२) । इसी प्रकार भक्ति-पूर्वक कर्म-फल
भी देवता को प्रदान करे (२६३) । नृत्य, गीत और वाद्य करते-करते बान्धवों के साथ गृह की प्रदक्षिणा कर
देवता को नमस्कार कर सभी ब्राह्मणों को भोजन कराये (२६४) ।
देव-गृह की प्रतिष्ठा में जो यह क्रम कहा है, यही उपवन, सेतु, संक्रम और वृक्ष की भी प्रतिष्ठा में
विहित है (२६५) । विशेष कर इन सभी कर्मों में सनातन विष्णु पूज्य हैं। पूजा, होम और अन्य सभी कर्म गृह-
दान की विधि के समान करे (२६६) । अप्रतिष्ठित देवता को गृहादि कुछ भी न दे; प्रतिष्ठित और अर्चित देव
के लिए ही पूजा, दान विहित है (२६७) ।
अब 'आद्या' की प्रतिष्ठा का क्रम बताता हूँ, जिसके अनुसार प्रतिष्ठिता देवी शीघ्र ही वाञ्छित फल देती
हैं (२६८) । 'आद्या' की प्रतिष्ठा के दिन साधक स्नान कर शुद्ध हो विधि-वत् सङ्कल्प-पूर्वक वास्तु-पति की पूजा
करे (२६६) । ग्रह, दिक्-पाल और गणेशादि-पूजा और पितृ-कर्म (आभ्युदयिक) कर साधक सभी विप्रों के साथ
प्रतिमा के पास जाये (२७०) । प्रतिष्ठित गृह में या किसी सुन्दर स्थान में साधक उत्तम प्रतिमा को लाकर पूजा-
पूर्वक स्नान कराये (२७१) । पहले भस्म से, फिर वल्मीक की मिट्टी से, तब क्रमशः वराह-दन्त और हस्ति-दन्त
की मृत्तिका से स्नान कराये (२७२) । फिर 'पञ्च-कषाय' और 'त्रि-पत्र' से स्नान कराये (२७३) । वाट्याल, बेर
जामुन, वकुल (मोलसिरो) और शाल्मली—ये पाँच वृक्ष 'पञ्च-कषाय' कहे गये हैं (२७४) । करवीर, जाती,
चम्पक, पद्म और पाटली (गुलाब)—ये 'पञ्च-पुष्प' कहे हैं (२७५) । बर्बुरा, तुलसी और बिल्व—ये 'त्रि-पत्र' कहे हैं
(२७६) । इन सभी द्रव्यों को जल में मिलाकर स्नान कराना विहित है किन्तु पञ्चामृत और गन्ध-तैल में जल
न मिलाये (२७७) । व्याहृति-सहित प्रणव, गायत्री और मूल-मन्त्र का उच्चारण कर अमुक द्रव्य के जल से तुम्हें
स्नान कराता हूँ, तुम्हें नमस्कार—यह कहकर स्नान कराये (२७८) । तदनन्तर पूर्वोक्त विधि से दुग्धादि अष्ट
घटों से और कुछ उष्ण जल से प्रतिमा को स्नान कराये (२७६) । श्वेत गोधूम-चूर्ण या तिल-कल्क या शालि-
तण्डुल-चूर्ण से मार्जन कर उसे सुखाये (२८०) । तीर्थ-जल से पूर्ण आठ घड़ों से स्नान कराकर सुन्दर वस्त्र से
पोंछकर स्वच्छ अङ्गोंवाली प्रतिमा को सजाकर पूजा-स्थान में ले जाये (२८१) । यदि तीर्थ-जल का संग्रह न कर
सके, तो पच्चास घड़े शुद्ध जल से भक्ति-पूर्वक प्रतिमा का स्नान कराये (२८२) । यदि समर्थ हो, तो प्रति स्नान
के बाद पूजा करे (२८३) । तब सुन्दर आसन पर प्रतिमा को स्थित कर पाद्यार्घ्यादि से पूजा कर हाथ जोड़कर
उसकी प्रार्थना करे (२८४)—
नमस्ते प्रतिमे ! तुभ्यं विश्वकर्म-विनिर्मिते ! नमस्ते देवतावासे भक्ताभीष्ट-प्रदे नमः ।
त्वयि सम्पूजयाम्यादां परमेशीं परात्परां, शिल्प-दोषावशिष्टाङ्गं सम्पन्नं कुरु ते नमः ।
अर्थात् हे विश्वकर्मा द्वारा निर्मित प्रतिमे ! तुम्हें नमस्कार । हे देवतावासे ! तुम्हें नमस्कार । हे भक्ताभीष्ट-
प्रदे ! तुम्हें नमस्कार । तुममें परात्परा परमेश्वरी आद्या की पूजा करता हूँ; शिल्प-दोष से बचे अङ्ग को सम्पन्न
करो; तुम्हें नमस्कार (२८५-८६) ।
अब शान्त हो प्रतिमा के मस्तक पर हाथ रखकर १०८ बार मूल-मन्त्र का जप कर प्रतिमा के सारे