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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 139 में से

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पृष्ठ 123

तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । ११३
ऊपर देव-स्थापन करे (२४६) । देवता के दोनों पैर छूकर—'मूलं स्थां स्थों स्थिरोभव वासस्ते कल्पितो मया'
अर्थात् 'तुम्हारे आवास को मैंने बनाया है, इसमें स्थिर हों', इस मन्त्र से देवता को स्थिर कर पुनः गृह की प्रार्थना
करे (२४७)—
गृह ! देव-निवासाय सर्वथा प्रीतिदो भव, उत्सृष्टे त्वयि मे लोकाः स्थिराः सन्तु निरामयाः ।
द्वि-सप्तातीत-पुरुषान् द्वि-सप्तानागतानपि, मां च मे परिवारांश्च देव-धाम्नि निवासय ।
यजनात् सर्व-यज्ञानां सर्व-तीर्थ-निषेवणात्, यत्-फलं तत्-फलं मेऽद्य जायतां त्वत्-प्रसादतः ।
यावत् वसुन्धरा तिष्ठेत् यावदेते धरा-धराः, यावद्-दिवा-निशा-नाथौ तावन्मे वर्ततां कुलम् ।।
अर्थात् हे गृह ! देव-निवास के लिए सब प्रकार से प्रीति-दायक हो । तुम्हें देने से मेरे लिए सभी लोक
पुण्यद हों (२४८) । मेरे पिछले चौदह पुरखों और अगले चौदह वंशजों को, मुझे और मेरे परिवार-जनों को
देव-लोक-वासी बनाओ (२४९) । सब यज्ञों और सब तीर्थों के सेवन से जो फल मिलता है, वह फल आज तुम्हारी
प्रसन्नता से मुझे मिले (२५०) जब तक पृथ्वी, पर्वत, सूर्य, चन्द्र हैं, तब तक मेरा कुल रहे (२५१) ।
इस प्रकार गृह की प्रार्थना कर पुनः देवार्चन कर दर्पणादि अन्य वस्तुएँ और ध्वज प्रदान करे (२५२) ।
तब देवता के योग्य वाहन दान करे। महादेव को 'वृषभ' का दान देकर हाथ जोड़कर उसकी प्रार्थना करे
(२५३)—
वृषभ ! त्वं महा-कायस्तीक्ष्ण-शृङ्गोऽरि-घातकः, पृष्ठे वहसि देवेशं पूज्योऽसि त्रिदशैरपि ।
खुरेषु सर्व-तीर्थानि रोम्नि वेदाः सनातनाः, निगमागम-तन्त्राणि दशनाग्रे वसन्ति ते ।
त्वयि दत्ते महा-भाग ! सुप्रीतः पार्वती-पतिः, वासः ददातु कैलासे त्वं मां पालय सर्वदा ।
अर्थात् हे वृषभ ! तुम बड़े शरीरवाले, तेज सींगवाले और शत्रु-घाती हो । तुम देवेश को पीठ पर बैठाते
हो, अतः देवों द्वारा भी पूज्य हो (२५४) । तुम्हारे खुरों में सब तीर्थ, रोमों में चारों सनातन वेद और दाँतों के
अग्र-भाग में निगमागम तन्त्र रहते हैं (२५५) । हे महा-भाग ! तुम्हारे दिए जाने से पार्वती के पति प्रसन्न होकर
कैलास में मुझे आवास दें। तुम सदा मेरा पालन करो (२५६) ।
महा-देवो को 'सिंह' और विष्णु को 'गरुड़' का दान देकर उन वाहनों की स्तुति क्रमशः जिस प्रकार
करे, वह बताता हूँ, सुनो (२५७)—
सुरासुर-नियुद्धेषु महा-बल-पराक्रमः, देवानां जयदो भीमो दनुजानां विनाश-कृत् ।
सदा देवी-प्रियोऽसि त्वं ब्रह्म-विष्णु-शिव-प्रियः, देव्यै समर्पितो भक्त्या जहि शत्रून्नमोऽस्तु ते ॥
अर्थात् हे सिंह ! देवासुर-संग्राम में तुम महा-बली, पराक्रमी हो, देवों को जय-दाता हो, भयङ्कर और
असुर-नाशक हो (२५८) । तुम सदा देवों और ब्रह्मा, विष्णु, शिव के प्रिय हो; भक्ति-पूर्वक देवी के लिए अर्पित
होकर तुम मेरे सभी शत्रुओं का नाश करो। तुम्हें नमस्कार है (२५९) ।
गरुत्मन् ! पतग-श्रेष्ठ ! श्री-पति-प्रीति-दायक !
वज्र-चञ्चो ! तीक्ष्ण-नख ! तव पक्षा हिरण्मयाः ।
नमस्तेऽस्तु खगेन्द्राय पक्षिराज ! नमोऽस्तु ते । यथा कर-पुटेन त्वं संस्थितो विष्णु-सन्निधौ ।
तथा मामरि-दर्पघ्न ! विष्णोरग्रे निवासय । त्वयि प्रीते जगन्नाथः प्रीतः सिद्धिं प्रयच्छति ॥
फा०—१५