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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 109

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एकादशोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका भगवान् श्रीकृष्णकी संक्षिप्त लीलाओंका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना

धृतराष्ट्र उवाच

शृणु दिव्यानि कर्माणि वासुदेवस्य संजय ।
कृतवान् यानि गोविन्दो यथा नान्यः पुमान् क्वचित् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके दिव्य कर्मोंका वर्णन सुनो। भगवान् गोविन्दने जो-जो कार्य किये हैं, वैसा दूसरा कोई पुरुष कदापि नहीं कर सकता ॥ १ ॥

संवर्धता गोपकुले बालेनैव महात्मना ।
विख्यापितं बलं बाह्वोस्त्रिषु लोकेषु संजय ॥ २ ॥
संजय! बाल्यावस्थामें ही जब कि वे गोपकुलमें पल रहे थे, महात्मा श्रीकृष्णने अपनी भुजाओंके बल और पराक्रमको तीनों लोकोंमें विख्यात कर दिया ॥ २ ॥

उच्चैःश्रवस्तुल्यबलं वायुवेगसमं जवे ।
जघान हयराजं तं यमुनावनवासिनम् ॥ ३ ॥
यमुनाके तटवर्ती वनमें उच्चैःश्रवाके समान बलशाली और वायुके समान वेगवान् अश्वराज केशी रहता था। उसे श्रीकृष्णने मार डाला ॥ ३ ॥

दानवं घोरकर्माणं गवां मृत्युमिवोत्थितम् ।
वृषरूपधरं बाल्ये भुजाभ्यां निजघान ह ॥ ४ ॥
इसी प्रकार एक भयंकर कर्म करनेवाला दानव वहाँ बैलका रूप धारण करके रहता था, जो गौओंके लिये मृत्युके समान प्रकट हुआ था। उसे भी श्रीकृष्णने बाल्यावस्थामें अपने हाथोंसे ही मार डाला ॥ ४ ॥

प्रलम्बं नरकं जम्भं पीठं चापि महासुरम् ।
मुरं चान्तकसंकाशमवधीत् पुष्करेक्षणः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् कमलनयन श्रीकृष्णने प्रलम्ब, नरकासुर, जम्भासुर, पीठ नामक महान् असुर और यमराजसदृश मुरका भी संहार किया ॥ ५ ॥

तथा कंसो महातेजा जरासंधेन पालितः ।
विक्रमेणैव कृष्णेन सगणः पातितो रणे ॥ ६ ॥
इसी प्रकार श्रीकृष्णने पराक्रम करके ही जरासंधके द्वारा सुरक्षित महातेजस्वी कंसको उसके गणोंसहित रणभूमिमें मार गिराया ॥ ६ ॥