महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2306, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतनन्दन! समस्त कौरव वीरोंके देखते-देखते गंगानन्दन भीष्मने मृत्यु अथवा विजय इन दोमेंसे किसी एकका वरण करनेके लिये अपने हाथमें सुवर्णभूषित ढाल और तलवार ले ली॥ ६९ १/२॥
तस्य तच्छतधा चर्म व्यधमत् सायकैस्तथा ॥ ७० ॥
रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् ।
परंतु वे अभी अपने रथसे उतर भी नहीं पाये थे कि अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा उनकी ढालके सौ टुकड़े कर दिये, वह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ ७० १/२॥
ततो युधिष्ठिरो राजा स्वान्यनीकान्यचोदयत् ॥ ७१ ॥
अभिद्रवत गाङ्गेयं मा वोऽस्तु भयमण्वपि ।
इसी समय राजा युधिष्ठिरने अपने सैनिकोंको आज्ञा दी—'वीरो! गंगानन्दन भीष्मपर आक्रमण करो। उनकी ओरसे तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये'॥ ७१ १/२॥
अथ ते तोमरैः प्रासैर्बाणौघैश्च समन्ततः ॥ ७२ ॥
पट्टिशैश्च सुनिस्त्रिंशैर्नाराचैश्च तथा शितैः ।
वत्सदनैश्च भल्लैश्च तमेकमभिदुद्रुवुः ॥ ७३ ॥
तदनन्तर वे पाण्डव-सैनिक सब ओरसे तोमर, प्रास, बाणसमुदाय, पट्टिश, खड्ग, तीखे नाराच, वत्सदन्त तथा भल्लोंका प्रहार करते हुए एकमात्र भीष्मकी ओर दौड़े॥ ७२-७३॥
सिंहनादस्ततो घोरः पाण्डवानामभूत् तदा ।
तथैव तव पुत्राश्च नेदुर्भीष्मजयैषिणः ॥ ७४ ॥
तदनन्तर पाण्डवोंकी सेनामें घोर सिंहनाद हुआ। इसी प्रकार भीष्मकी विजय चाहनेवाले आपके पुत्र भी उस समय गर्जना करने लगे॥ ७४॥
तमेकमभ्यरक्षन्त सिंहनादांश्च चक्रिरे ।
तत्रासीत् तुमुलं युद्धं तावकानां परैः सह ॥ ७५ ॥
आपके सैनिक एकमात्र भीष्मकी रक्षा और सिंहनाद करने लगे। वहाँ आपके योद्धाओंका शत्रुओंके साथ भयंकर युद्ध हुआ॥ ७५॥
दशमेऽहनि राजेन्द्र भीष्मार्जुनसमागमे ।
आसीद् गाङ्ग इवावर्तो मुहूर्तमुदधेरिव ॥ ७६ ॥
राजेन्द्र! दसवें दिन भीष्म और अर्जुनके संघर्षमें दो घड़ीतक ऐसा दृश्य दिखायी दिया, मानो समुद्रमें गंगाजीके गिरते समय उनके जलमें भारी भँवर उठ रही हो॥ ७६॥
सैन्यानां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् ।
असौम्यरूपा पृथिवी शोणिताक्ताभवत् तदा ॥ ७७ ॥
उस समय एक-दूसरेको मारनेवाले युद्धपरायण सैनिकोंके रक्तसे रंजित हो वहाँकी सारी पृथ्वी भयानक हो गयी थी॥ ७७॥