महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2305, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुसला इव मे घ्नन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।
वज्रदण्डसमस्पर्शा वज्रवेगदुरासदाः ॥ ६२ ॥
‘क्योंकि ये मेरे सुदृढ़ कवचको छेदकर मर्मस्थानोंमें आघात कर रहे हैं, ये बाण मेरे शरीरपर मुसलके समान चोट करते हैं। इनका स्पर्श वज्र और यमदण्डके समान असह्य है। इनका वेग वज्रके समान होनेके कारण निवारण करना कठिन है। ये शिखण्डीके बाण कदापि नहीं ॥ ६१-६२ ॥
मम प्राणानारुजन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।
नाशयन्तीव मे प्राणान् यमदूता इवाहिताः ॥ ६३ ॥
‘ये मेरे प्राणोंमें व्यथा उत्पन्न कर देते हैं। अहितकारी यमदूतोंके समान मेरे प्राणोंका विनाश-सा कर रहे हैं। ये शिखण्डीके बाण कदापि नहीं हो सकते ॥
गदापरिघसंस्पर्शा नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।
भुजगा इव संक्रुद्धा लेलिहाना विषोल्बणाः ॥ ६४ ॥
‘इनका स्पर्श गदा और परिघकी चोटके समान प्रतीत होता है, ये क्रोधमें भरे हुए प्रचण्ड विषवाले सर्पोंके समान डसे लेते हैं। ये शिखण्डीके बाण नहीं हैं ॥ ६४ ॥
समाविशन्ति मर्माणि नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।
अर्जुनस्य इमे बाणा नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥ ६५ ॥
कृन्तन्ति मम गात्राणि माघमां सेगवा इव ।
‘ये बाण मेरे मर्मस्थानोंमें प्रवेश कर रहे हैं, अतः शिखण्डीके नहीं हैं। ये अर्जुनके बाण हैं। ये शिखण्डीके बाण नहीं हैं। जैसे केंकड़ीके बच्चे अपनी माताका उदर विदीर्ण करके बाहर निकलते हैं, उसी प्रकार ये बाण मेरे सम्पूर्ण अंगोंको छेदे डालते हैं ॥ ६५ १/२ ॥
सर्वे ह्यपि न मे दुःखं कुर्युुरन्ये नराधिपाः ॥ ६६ ॥
वीरं गाण्डीवधन्वानमृते जिष्णुं कपिध्वजम् ।
‘गाण्डीवधारी वीर कपिध्वज अर्जुनको छोड़कर अन्य सभी नरेश अपने प्रहारोंद्वारा मुझे इतनी पीड़ा नहीं दे सकते’ ॥ ६६ १/२ ॥
इति ब्रुवञ्छान्तनवो दिधक्षुरिव पाण्डवान् ॥ ६७ ॥
शक्तिं भीष्मः स पार्थाय ततश्चिक्षेप भारत ।
तामस्य विशिखैश्छित्त्वा त्रिधा त्रिभिरपातयत् ॥ ६८ ॥
भारत! ऐसा कहते हुए शान्तनुनन्दन भीष्मने पाण्डवोंकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें भस्म कर डालेंगे। फिर उन्होंने अर्जुनपर एक शक्ति चलायी; परंतु अर्जुनने तीन बाणोंद्वारा उनकी उस शक्तिको तीन जगहसे काट गिराया ॥ ६७-६८ ॥
पश्यतां कुरुवीराणां सर्वेषां तव भारत ।
चर्माथादत्त गाङ्गेयो जातरूपपरिष्कृतम् ॥ ६९ ॥
खड्गं चान्यतरप्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जयाय वा ।