महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2307, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमं च विषमं चैव न प्राज्ञायत किंचन ।
योधानामयुतं हत्वा तस्मिन् स दशमेऽहनि ।। ७८ ।।
अतिष्ठदाहवे भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु ।
वहाँ ऊँची और नीची भूमिका भी कुछ ज्ञान नहीं हो पाता था, दसवें दिनके उस युद्धमें अपने मर्मस्थानोंके विदीर्ण होते रहनेपर भी भीष्मजी दस हजार योद्धाओंको मारकर वहाँ खड़े हुए थे ।। ७८ १/२ ।।
ततः सेनामुखे तस्मिन् स्थितः पार्थो धनुर्धरः ।। ७९ ।।
मध्येन कुरुसैन्यानां द्रावयामास वाहिनीम् ।
उस समय सेनाके अग्रभागमें खड़े हुए धनुर्धर अर्जुनने कौरव-सेनाके भीतर प्रवेश करके आपके सैनिकोंको खदेड़ना आरम्भ किया ।। ७९ १/२ ।।
(तथा च तव सैन्यानि तापयामासुरोजसा ।
शरैरशनिसंकाशैः पाण्डवाश्चेतरे नृपाः ।।
तत्राद्भुतमपश्याम पाण्डवानां पराक्रमम् ।
द्रावयामासुरिषुभिः सर्वान् भीष्मपदानुगान् ।।)
पाण्डवों तथा अन्य राजाओंने वज्रके समान बाणोंद्वारा आपकी सेनाओंको बलपूर्वक पीड़ित किया। वहाँ हमने पाण्डवोंका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि उन्होंने अपने बाणोंकी वर्षासे भीष्मका अनुगमन करनेवाले समस्त योद्धाओंको मार भगाया।
वयं श्वेतहयाद् भीताः कुन्तीपुत्राद् धनंजयात् ।। ८० ।।
पीड्यमानाः शितैः शस्त्रैः प्राद्रवाम रणे तदा ।
राजन्! उस समय श्वेतवाहन कुन्तीपुत्र धनंजयसे डरकर उनके तीखे अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित हो हम सभी लोग रणभूमिसे भागने लगे थे ।। ८० १/२ ।।
सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः ।। ८१ ।।
अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ।
शाल्वाश्रयास्त्रिगर्ताश्च अम्बष्ठाः केकयैः सह ।। ८२ ।।
सर्व एते महात्मानः शरार्ता व्रणपीडिताः ।
संग्रामे न जहुर्भीष्मं युध्यमानं किरीटिना ।। ८३ ।।
सौवीर, कितव, प्राच्य, प्रतीच्य, उदीच्य, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि, वसाति, शाल्वाश्रय, त्रिगर्त, अम्बष्ठ और केकय—इन सभी देशोंके ये सारे महामनस्वी वीर बाणोंसे घायल और घावोंसे पीड़ित होनेपर भी अर्जुनके साथ युद्ध करनेवाले भीष्मको संग्रामभूमिमें छोड़ न सके ।। ८१—८३ ।।
ततस्तमेकं बहवः परिवार्य समन्ततः ।
परिकाल्य कुरून् सर्वान् शरवर्षैरवाकिरन् ।। ८४ ।।