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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1876, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1876

स भिन्नहृदयो वाली वक्त्राच्छोणितमुद्वमन् ।
ददर्शावस्थितं रामं ततः सौमित्रिणा सह ।। ३७ ।।
इससे वालीका वक्षःस्थल विदीर्ण हो गया और वह अपने मुँहसे रक्त वमन करने लगा। सामने ही उसे लक्ष्मणके साथ खड़े हुए श्रीराम दिखायी दिये ।। ३७ ।।

गर्हयित्वा स काकुत्स्थं पपात भुवि मूर्च्छितः ।
तारा ददर्श तं भूमौ तारापतिसमौजसम् ।। ३८ ।।
तब वह (छिपकर आघात करनेके कारण) श्रीरामचन्द्रजीकी निन्दा करके पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। ताराने चन्द्रमाके समान तेजस्वी अपने वीर पति वालीको प्राणहीन होकर पृथ्वीपर पड़ा देखा ।।

हते वालिनि सुग्रीवः किष्किन्धां प्रत्यपद्यत ।
तां च तारापतिमुखीं तारां निपतितेश्वराम् ।। ३९ ।।
वालीके मारे जानेपर अनाथ हुई किष्किन्धापुरी तथा चन्द्रमुखी तारा सुग्रीवको प्राप्त हुई ।। ३९ ।।

रामस्तु चतुरो मासान् पृष्ठे माल्यवतः शुभे ।
निवासमकरोद् धीमान् सुग्रीवेणाभ्युपस्थितः ।। ४० ।।
परम बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने माल्यवान् पर्वतकी सुन्दर घाटीमें वर्षाके चार महीनोंतक निवास किया। समय-समयपर सुग्रीव भी उनकी सेवामें उपस्थित होते रहते