सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1875, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1875

उभौ जघ्नतुरन्योन्यमुभौ भूमौ निपेपतुः ।
उभौ ववल्गतुश्चित्रं मुष्टिभिश्च निजघ्नतुः ।। ३१ ।।
दोनों दोनोंपर प्रहार करते, दोनों जमीनपर गिर जाते, फिर दोनों ही उछल-कूदकर विचित्र ढंगसे पैंतरे बदलते तथा मुक्कों और घूसोंसे एक-दूसरेको मारते थे ।। ३१ ।।
उभौ रुधिरसंसिक्तौ नखदन्तपरिक्षतौ ।
शुशुभाते तदा वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ।। ३२ ।।
दोनों नख और दाँतोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो रक्तसे लथपथ हो रहे थे। उस समय वे दोनों वीर खिले हुए पलासके दो वृक्षोंकी भाँति शोभा पाते थे ।। ३२ ।।
न विशेषस्तयोर्युद्धे यदा कश्चन दृश्यते ।
सुग्रीवस्य तदा मालां हनुमान् कण्ठ आसजत् ।। ३३ ।।
जब युद्धमें उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी दिया, तब हनुमान्‌जीने सुग्रीवकी पहचानके लिये उनके गलेमें एक माला डाल दी ।। ३३ ।।
स मालया तदा वीरः शुशुभे कण्ठसक्तया ।
श्रीमानिव महाशैलो मलयो मेघमालया ।। ३४ ।।
कण्ठमें पड़ी हुई उस मालासे वीर सुग्रीव उस समय मेघपंक्तिसे सुशोभित महापर्वत मलयकी भाँति शोभा पा रहे थे ।। ३४ ।।
कृतचिह्नं तु सुग्रीवं रामो दृष्ट्वा महाधनुः ।
विचकर्ष धनुः श्रेष्ठं वालिमुद्दिश्य लक्ष्यवत् ।। ३५ ।।
विस्फारस्तस्य धनुषो यन्त्रस्येव तदा बभौ ।
वितत्रास तदा वाली शरेणाभिहतोूरसि ।। ३६ ।।
महाधनुर्धर श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवको चिह्न धारण किये देख वालीको लक्ष्य बनाकर अपना महान् धनुष खींचा। उस धनुषकी टंकार मशीनकी भयंकर आवाजके समान जान पड़ती थी। उसे सुनकर वाली भयभीत हो उठा। इतनेमें ही श्रीरामके बाणने उसकी छातीपर भारी चोट की ।। ३५-३६ ।।