माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 351, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ३३१ )
जिसके नेत्रके कोएके बाहर अथवा भीतर काली सूजन होय तथा पीडा होय
उसको वर्त्मरोगके जाननेवाले श्याववर्त्म कहते हैं, वह वाताधिक त्रिदोषजन्य है
विदेहने लिखा भी है ॥
प्रक्लिन्नवर्त्मके लक्षण ।
अरुजं बाह्यतः शूनं वर्त्म यस्य नरस्य हि ।
प्रक्लिन्नवर्त्म तद्विद्यात् क्लिन्नमत्यर्थमंततः ॥ ९१ ॥
जो कोया अल्पपीडा तथा बाहरसे सूजा हुआ अत्यन्त कीचडसे व्याप्त हो उसको
प्रक्लिन्नवर्त्म कहते हैं, यह कफज विकार है ॥
अक्लिन्नवर्त्मके लक्षण ।
यस्य धौतान्यधौतानि संबध्यंते पुनः पुनः ।
वर्त्मान्यपरिपक्वानि विद्यादक्लिन्नवर्त्म तत् ॥ ९२ ॥
जिसके नेत्रके पलक धोनेसे अथवा नहीं धोनेसे बारंबार चिपक जावें कोएँ पक-
कर राधसे नहीं चिकटें तो इस रोगको अक्लिन्नवर्त्म कहते हैं, इस रोगको विदेह
पिल्लारूया कहते हैं ॥
वातहतवर्त्मके लक्षण ।
विमुक्तसंधि निश्चेष्टं वर्त्म यस्य न मील्यते ।
एतद्वातहतं वर्त्म जानीयादक्षिचिन्तकः ॥ ९३ ॥
जिसके नेत्रके पलक पृथक् पृथक् होयँ तथा जिसके पलक मिचें और खुले नहीं
ऐसे नेत्रके कोए मिले नहीं उसको वातहतवर्त्म शालाक्यसिद्धान्तवाला कहता है ॥
अर्बुदके लक्षण ।
वर्त्मान्तरस्थं विषमं ग्रन्थिभूतमवेदनम् ।
आचक्षतेऽर्बुदमिति सरक्तमविलंबितम् ॥ ९४ ॥
नेत्रके कोएके भीतर गोल मन्दवेदनायुक्त कुछ लाल जल्दी बढनेवाली ऐसी
जो गांठ होय उसको अर्बुद कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥
निमेषके लक्षण ।
निमेषिणीः शिरा वायुः प्रविष्टो वर्त्मसंश्रयः ।
प्रचालयति वर्त्मानि निमेषं नाम तं विदुः ॥ ९५ ॥
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१-दुष्टं श्लेष्मानिलात्पित्तं वर्त्मनोऽश्रीयते यदा ।
अभिदग्धनिभं श्यावं श्याववर्त्मेति तद्विदुः ॥ इति ॥