माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३३२ ) माधवनिदान ।
दाह तोद ( चोटनी ) संयुक्त, लाल, नरम, छोटी, मन्द पीडा करनेवाली ऐसी
फुन्सी नेत्रके कोएमें होय, उसको अंजना कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥
बहलवर्त्मके लक्षण ।
वर्त्मोपचीयते यस्य पिडिकाभिः समंततः ।
सवर्णामिः स्थिराभिश्च विद्याद्वहलवर्त्म तत् ॥ ८६ ॥
जिसके नेत्रका कोया त्वचाके समान वर्ण तथा कठिन फुन्सियोंसे व्याप्त होय
उसको बहलवर्त्म रोग कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥
वर्त्मबन्धके लक्षण ।
कण्डूमताऽल्पतोदेन वर्त्मशोथेन यो नरः ।
न संप्रच्छादयेदक्षि यत्रासौ वर्त्मबंधकः ॥ ८७ ॥
जिसके नेत्रके कोयोंमें सूजनसे नेत्रके बराबर सूजन आय जावे, उससे उस
मनुष्यको कुछ नहीं दीखे, इस रोगको वर्त्मबन्ध कहते हैं। इस सूजनमें खुजली
चले तथा तोद ( चोटनी ) होय, यह रोग त्रिदोषज है ॥
क्लिष्टवर्त्मके लक्षण ।
मृद्वल्पवेदनं ताम्रं यद्वर्त्म सममेव च ।
अकस्माच्च भवेद्रक्तं क्लिष्टवर्त्मेति तद्विदुः ॥ ८८ ॥
नेत्रके नीचे ऊपरके दोनों कोए नरम अल्प पीडा तांबेके वर्ण होकर अक-
स्मात् लाल हो जायँ तो इस रोगको क्लिष्टवर्त्मरोग कहते हैं, यह रोग कफरक्तज है
यही मत विदेहका है ॥
वर्त्मकर्दमके लक्षण ।
क्लिष्टं पुनः पित्तयुतं शोणितं विदहेद्यदा ।
ततः क्लिन्नत्वमापन्नमुच्यते वर्त्मकर्दमः ॥ ८९ ॥
क्लिष्टवर्त्म फिर पित्तयुक्त रुधिरको दहन करे, तब वह दही दूध माखनके समान
गीला होजाय, अतएव इस व्याधिको वर्त्मकर्दम कहते हैं, यह पित्ताधिक सन्नि-
पातात्मक है ॥
श्याववर्त्मके लक्षण ।
वर्त्म यद्बाह्यतोऽन्तश्च श्यावं शूनं सवेदनम् ।
तदाहुः श्याववर्त्मेति वर्त्मरोगविशारदाः ॥ ९० ॥
१ श्लेष्मा दुष्टेन रक्तेन क्लिष्टमांसमतः समम् । बंधुजीवनिभं वर्त्म क्लिष्टमांसं तदुच्यते ॥