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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

गुणकर्मप्रकारः । (५९)
एवं सर्वेष्वपीष्टवशादानन्त्यम् ।
इस प्रकार जहां तक अङ्कोंको इष्ट मानोगे वहां तक अनन्त अङ्क होंगे ॥
पाटीसूत्रोपमं बीजं गूढमित्यवभासते ॥
नास्ति गूढममूढानां नैव षोढेत्यनेकधा ॥ १ ॥
अन्वयः-पाटीसूत्रोपमं बीजम् अस्ति । गूढम् इति अवभासते । अमूढानां गूढं
नास्ति । षोढा इति नैव किंतु अनेकधा अस्ति ॥ १ ॥
अर्थः-पाटीगणितके समानही बीजगणित है, अतिगूढ है ऐसा मालूम होता है.
बुद्धिमानोंके वास्ते कुछ गूढ नहीं है और ६ छह ही प्रकारका है यह भी बात नहीं
किंतु अनेक प्रकारका है ॥ १ ॥
अस्ति त्रैराशिकं पाटी बीजञ्च विमला मतिः ॥
किमज्ञातं सुबुद्धीनामतो मंदार्थमुच्यते ॥ २ ॥
अन्वयः-पाटी त्रैराशिकम् अस्ति । बीजं च विमलामतिः अस्ति । सुबुद्धीनां किम्
अज्ञातम् । अतः मन्दार्थम् उच्यते ॥ २ ॥
अर्थः-पाटीगणित त्रैराशिक है. अर्थात् त्रैराशिक में सब गतार्थ है और बीजगणित
निर्मलबुद्धिस্বরূপ है. परन्तु कुशाग्रबुद्धियोंको क्या नहीं मालूम है ? अर्थात् सब
मालूम है तथापि छोटी बुद्धिवालोंके वास्ते कहा है ॥ २ ॥
इति वर्गकर्म.
अथ गुणकर्म.
अब गुणकर्म लिखते हैं.
तत्र दृष्टमूलजातौ करणसूत्रं वृत्तद्वयम्-
गुणकर्ममें दृष्टमूलजातिविषयक रीति लिखते हैं-
गुणघ्नमूलोनयुतस्य राशेर्दृष्टस्य युक्तस्य गुणा‌र्द्धकृत्या ॥
मूलं गुणा‌र्द्धेन युतं विहीनं वर्गीकृतं प्रष्टुरभीष्टराशिः ॥ १५ ॥
अन्वयः-गुणा‌र्द्धकृत्या युक्तस्य गुणघ्नमूलोनयुतस्य दृष्टस्य राशेः मूलं गुणा‌र्द्धेन युतं
वा विहीनम् । ततः वर्गीकृतं प्रष्टुः अभीष्टराशिः भवति ॥ १५ ॥
अर्थः-जिस अङ्कसे गुणकर मूलको राशिमें घटावे वा जोडे उसी अङ्कको मूलगुण
कहते हैं. तिसी मूलगुणको आधा कर वर्ग करके दृष्टराशिमें जोडे. फिर उसका वर्ग-
मूल ले. उस मूलमें ( यदि गुणसे गुणा हुआ मूल राशिमें हीन हो तो ) गुणका
आधा जोड दे. ( और यदि गुणसे गुणा हुआ मूल राशिमें युक्त हो तो ) गुणका