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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

भागहारः। ( १३ )
प्रकारान्तरम्–दूसरी रीति-
( सूत्र ८) समेन केनाप्यपवर्त्य हारभाज्यौ
भवेद्वा सति सम्भवे तु ॥ ७ ॥
अन्वयः-अथवा सति सम्भवे हारभाज्यौ केन अपि समेन अङ्केन अपवर्त्य
फलम् भवेत् ॥ ७ ॥
अर्थः-अथवा हो सके तो भाज्य और भाजक दोनोंमें किसी सम अंकका भाग
देकर परिवर्तन कर लेय; फिर भाज्यकी लब्धिमें भाजककी लब्धिका भाग देनेसे जो
लब्धि प्राप्त होती है वह फल होता है ॥ ७ ॥
अथवा भाज्यहारौ त्रिभिरपवर्तितौ ५४०/४ चतुर्भिर्वा ४०५/३
स्वस्वहारेण हृते फलं तदेव १३५ ॥
फैलाव-अथवा ऊपर कही हुई रीतिके ३) १६२० (५४० ३ ) १२ ( ४
अनुसार भाज्य और भाजक दोनोंमें १५ | ४ ) ५४० ( १३५ | १२
तीनका भाग दिया अर्थात् भाज्य १६२० १२ | ४ | ००
में तीनका भाग दिया तो ५४० पांचसौ १२ | १४ |
चालीस लब्धि हुआ; और भाजक १२ में ०० | १२ |
तीनका भाग दिया तो ४ चारं लब्धि हुआ; | ०२० |
तदनन्तर भाज्यकी लब्धि ५४० में भाज- | २० |
| ०० |
ककी लब्धि ४ का भाग दिया तब वही १३५ एकसौ पैंतीस लब्धि हुआ सोई
फल है ॥
४ ) १६२० ( ४०५ | ४ ) १२ ( ३ | ३ ) ४०५ ( १३५ | अथवा भाज्य
१६ | १२ | ३ | १६२० में ४ का
००२० | ०० | १० | भाग दिया तब
२० | | ९ | ४०५ लब्धि हुआ
०० | | ०१५ | और भाजक १२
| | १५ | में ४ का भाग दिया
| | ०० | तब ३ लब्धि हुआ
तदनन्तर भाज्यकी लब्धि ४०५ में भाजककी लब्धि ३ का भाग लिया तब १३५
लब्धि हुआ वही फल है.