लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) लीलावती ।
अथ भागहारः ।
( भाग लेनेकी रीति. ) ( क ) जिसमें भाग दिया जाता है वह भाज्य कहा
जाता है और जिसका भाग दिया जाता है वह भाजक कहाता है ॥
भागहारे करणसूत्रं वृत्तम्-
भाग लेनेकी रीति के विषयमें एक श्लो०-
( सू० ७ ) भाज्याद्धरः शुद्ध्यति यद्गुणः स्यादंत्यात्फलं तत्खलु
भागहारे ॥
अन्वयः-अन्त्यात् भाज्यात् हरः यद्गुणः शुद्ध्यति खलु भागहारे तत् फलं
स्यात् ॥
अर्थः-भाज्यके अन्तके अङ्कसे लेकर भाजक जितना गुणा ( दफा ) भाज्यमें
बँट सकेगा निश्चय करके भाग लेनेमें वही फल होगा ।
अत्र पूर्वोदाहरणे गणिताङ्कानां स्वगुणच्छेदानां भाग-
हारार्थं न्यासः-भाज्यः १६२० । भाजकः १२ ।
भजनाल्लब्धो गुण्यः १३५ ॥
फैलाव-पहले गुणाके उदाहरणमें गुणा भाजक भाज्य फल
किये हुए अंकोंमें भाग लेनेके वास्ते उसी १२ ) १६२० ( ०१३५
उदाहरणमें भागका फैलाव दिखलाते हैं भाज्य १६२० १२
एक हजार छ सौ बीस है और भाजक १२ बारह है ४२
ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार अन्तके अङ्क १ एकमें ३६
बारहका भाग लेनेसे कोई अङ्क लब्ध नहीं हुआ किन्तु ०६०
शून्य लब्धि हुआ; उसको भाज्यके दहिने भागमें लिखा ६०
फिर १६ सोलहमें भाग लिया तब एक लब्धि हुआ ००
और ४ चार शेष रहा. लब्धि एकको ० शून्यके दाहिनी तरफ स्थापित किया और
४ चारके ऊपर २ दोका अङ्क आगया तब बयालीस हुआ; उसमें तिन दफा भाजक
का भागलगा तब ४२ बयालीसमें त्रिगुणित भाजक ३६ छत्तीसको घटाया तब
छ शेष रहा लब्धि तीनको पहली लब्धिके अंकोंके दाहिने भागमें स्थापित किया
और शेष ६ पर शून्य ० आगया तब ६० साठ हुए; उसमें ५ दफा भाजकका
भाग लगा; तब ६० में पंच गुणित भाजक ६० साठको घटाया तब निःशेष
होगया; लब्धि ५ पांचको पहली लब्धिके दाहिने भागमें स्थापित किया तब सब
लब्धि १३५ एकसौ पैंतीस हुआ.