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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 268 में से

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पृष्ठ 172

( १५६ ) लीलावती।
लंबे ज्ञाते कर्णज्ञानार्थं सूत्रं वृत्तम्-
लम्ब जानकर कर्ण जाननेकी रीति श्लोक एक-
यल्लंबलम्बाश्रितबाहुवर्गविश्लेषमूलं कथिताऽबधा सा ॥
तदूनभूवर्गसमन्वितस्य यल्लंबवर्गस्य पदं स कर्णः ॥ २५ ॥
अन्वयः-यत् लम्बेलम्बाश्रितबाहुवर्गविश्लेषमूलं सा अबाधा कथिता। तदून
भूवर्गसमन्वितस्य लंबवर्गस्य यत् पदं स कर्णः ॥ २५ ॥
अर्थः-लंब और लम्बको आश्रय करनेवाला भुज इन दोनोंके वर्गान्तरका मूल
आबाधाका प्रमाण होता है; लम्बके प्रमाणसे होने जो भूमिके वर्गयुक्त लंबका वर्ग
उसका जो मूल सो कर्ण है ॥ २५ ॥
अत्र सव्यभुजाग्रालम्बः किल कल्पितः ३०८/५ अतो जाता-
बाधा १४४/५ तदूनभूवर्गसमन्वितस्येत्यादिना जातः कर्णः ७७॥
अर्थः-दहिने भुजके अग्रभागसे डाला हुआ लम्ब ३०८/५ है; इससे आबाधा
हुई १४४/५ "तदूनभूवर्गसमन्वितस्येत्यत्यादि" रीतिसे कर्णका प्रमाण हुआ॥ ७७ ॥
द्वितीयकर्णज्ञानार्थं सूत्रं वृत्तद्वयम्-
दूसरा कर्ण जाननेके लिये रीति दो श्लोकमें-
इष्टोऽत्र कर्णः प्रथमं प्रकल्प्यस्त्र्यस्रे तु कर्णोभयतः स्थिते ये॥
कर्णं तयोः क्ष्मामितरौ च बाहू प्रकल्प्य लम्बावबधे प्रसाध्ये२६
आबाधयोरेकककुप्स्थयोर्यत्स्यादन्तरं तत्कृतिसंयुतस्य ॥
लम्बैक्यवर्गस्य पदं द्वितीयः कर्णो भवेत्सर्वचतुर्भुजेषु ॥ २७ ॥
अन्वयः-प्रथमम् अत्र इष्टः कर्णः प्रकल्प्यः। कर्णोभयतः तु ये त्र्यस्रे स्थिते तयोः
कर्णं क्ष्मां प्रकल्प्य इतरौ च बाहू प्रकल्प्य लम्बावबधे प्रसाध्ये ॥ २६ ॥
सर्वचतुर्भुजेषु एकककुप्स्थयोः आबाधयोः यत् अन्तरं स्यात् तत्कृतिसंयुतस्य
लम्बैक्यवर्गस्य पदं द्वितीयः कर्णः भवेत् ॥ २७ ॥
अर्थः-पहले यहां इष्ट कर्ण कल्पना करे; कर्णके दोनों ओर जो दो जात्य-
त्रिभुज स्थित हैं उनके कर्णको भूमि कल्पना करके तथा और दोनोंको भुजकल्पना
करके लंब और आबाधा साधे ॥ २६ ॥
सब चतुर्भुजक्षेत्रोंमें एक दिशामें स्थित आबाधाओंका जो अन्तर हो उसके
वर्गसे युक्त लंब योगके वर्गका मूल ले; वही दूसरा कर्ण होगा ॥ २७ ॥