लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। (१५५)
रहजाते हैं; बुद्धिमान् इस रूपभेदकी परीक्षा रस्सीका क्षेत्राकार बनाकर प्रत्यक्ष
कर सकता है॥
लम्बज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्-
चतुर्भुजमें लम्बके जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजेऽवलम्बः प्राग्वद्भुजौ कर्णभुजौ मही भूः ॥२४॥
अन्वयः-चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजे प्राग्वत् अवलम्बः कार्य्यः। तदा कर्णभुजौ भुजौ स्तः
भूः मही स्यात् ॥ २४ ॥
अर्थः-चतुर्भुजके भीतर जो जात्यत्रिभुज है; उसमें लम्ब डाले; काण
और भुजको भुजाएँ माने महीको पृथ्वी जाने ॥ २४॥
अत्र लम्बज्ञानार्थं सव्यभुजाग्राद्दक्षिणभुजमूलगामी इष्टः
कर्णः सप्तसप्ततिमितः कल्पितस्तेन चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजं
कल्पितं तत्राऽसौ कर्णः एको भुजः ७७ द्वितीयस्तु
सव्यभुजः ६८ भूः सैव ७५ अत्र प्राग्वल्लब्धो लम्बः ३०८/५
फैलाव-यहां लम्ब जानना हो तो बाँई भुजके मूलसे रेखाको दक्षिण भुजके
अग्रमें पहुँचा दे, उसीको इष्टकर्ण कल्पना ७७ सतत्तर किया उसीसे चतुर्भुजके
भीतर एक त्रिभुज बनाया; उसमें यही कल्पित कर्ण ७७ एक भुज हुआ; दूसरा सव्य
भुज ६८ है; भूमि वही ७५ है यहां पहिले
कही हुई "त्रिभुजे भुजयोर्योगः" इत्यादि
रीतिसे आबाधा जाननेके लिये दोनों ७७।
६८ भुजोंका योग किया तब १४५ हुए
उन हीं भुजाओंके अन्तर ९ से गुणा किया
तब १३०५ हुए; इनमें भूमि ७५ का भाग दिया;
इत्यादि क्रिया करनेसे दोनों आबाधा २३१/५
१४४/५ मिली; इन हीं आबाधाओंपरसे लंब
मिला; ३०८/५