लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
पृष्ठ 126, कुल 268 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११० ) लीलावती।
न्यासः-आ० । च ० ३ ग० ७ सर्वधनं १०५ लब्धमादिधनम् ६
फैलाव-इस उदाहरणमें चय ३ तीन गच्छ ७ सात सर्वधन १०५ एकसौ पाँच
है केवल आदि धन नहीं जानते हैं उसके जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई
रीतिके अनुसार सर्वधन १०५ में गच्छ ७ सातका भाग लिया तब १५ पन्द्रह
लब्धि हुए. इनमें एक १ करके हीन जो पद अर्थात् ६ इससे चय ३तीनको गुणा
किया तब १८ अठारह हुए इसका आधा किया तब ९ नौ हुए इनको १५ में
घटाया तब ६ छ शेष रहे यही आदिधन है क्यों कि आदि धन जानकर सर्वधन
निकालते हैं तो वही १०५ आता है.
चयज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्-
आदिधन सर्वधन और गच्छ जानकर चय जाननेकी रीति आधे श्लोकम
लिखते हैं.
गच्छहृतं धनमादिविहीनं व्येकपदार्द्धहृतं च चयः स्यात् ॥ ३६॥
अन्वयः-धनं गच्छहृतम् आदिविहीनं व्येकपदार्द्धहृतं च चयः स्यात् ॥ ३६ ॥
अर्थः-सर्वधनमें गच्छका भाग दे, जो लब्धि आवे उसमें आदि धनको
घटा दे जो शेष रहे उसमें एक करके हीन पदका भाग दे तब जो लब्धि आव
उसको चय जानना ॥ ३६ ॥
उदाहरणम्-
प्रथममगदह्ना योजने यो जनेशस्तदनु ननु कयाऽसौ
ब्रूहि यातोऽध्ववृद्ध्या ॥ अरिकरिहरणार्थं योजनानाम-
शीत्या रिपुनगरमवाप्तः सप्तरात्रेण धीमन् ॥ १ ॥
अन्वयः-हे धीमन् ! यः जनेशः योजनानाम् अशीत्या अरिकरिहरणार्थं सप्तरा-
त्रेण रिपुनगरम् अवाप्तः असौ प्रथमम् अह्ना योजने अगमत् तदनु ननु कया
अध्ववृद्ध्या प्रयातः इति त्वम् ब्रूहि ? ॥ १ ॥
अर्थः-हे चातुरीधुरीणमित्र ! जो राजा ८० योजनपर अपने शत्रुरूप हस्तीके
मारनेके वास्ते सात दिनमें शत्रुके नगरको पहुँच गया. यहां राजा पहले दिन दो २
योजन मार्ग चला था; तो यह निश्चय करके कहो कि उसके बाद वह कितना रास्ता
प्रतिदिन ज्यादा चला ? ॥ १ ॥
न्यासः-आ० २ । च० । गच्छ ७ धन ८० । लब्धमुत्तरम् २२
फैलाव- इस उदाहरणमें आदि धन २ दो है; क्योंकि पहले दिन दो योजन
चला है और सात गच्छ है, क्योंकि सात ७ दिनमें पहुँचा है. सर्व धन ८० अस्सी