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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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पृष्ठ 125

श्रेढीव्यवहारः । ( १०९ )
समदिने गच्छे मध्यदिनाभावान्मध्यात्प्रागपरदिनधनयो-
र्योगाद्धं मध्यदिनधनं भवितुमर्हतीति प्रतीतिरुत्पाद्या ॥
फैलाव-यहां मुख सात ७ है, चय ५ पांच है, गच्छ ८ आठ है, ऊपर कही
हुई रीतिके अनुसार पद आठमें एक १ घटाया तब ७ रहे; इन ७ से चय ५
पांचको गुणा किया तब ३५ हुए; इसमें मुख ७ को जोडा तब ४२ बयालीस
हुए; यही अन्त्यके दिन जो धन दिया वह अन्त्यधन है. अब इसी अन्त्यधन ४२
में मुख ७ सात जोडा, तब ४९ उनचास हुए; इनको आधा किया तब ४९/२ हुए;
यही मध्यके दिन दिया हुआ मध्यधन है. इसी मध्यधन ४९/२ को गच्छ ८ से गुणा
किया तब १९६ एक सौ छियानवे हुए. यही सर्वधन अर्थात् आठ ८ दिनमें जो
सब धन दिया सो है. यद्यपि आठ दिन सम है इसमें कोई दिन मध्यका ठीक नहीं
हो सकता है; तथापि मध्यके आदिके और मध्यके अन्त्यके दिनके योगका जो
धन है उसका जो आधा होगा; उसीको मध्यधन मानकर प्रतीतिकी उत्पत्ति
करना ॥
मुखज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम् ॥
जहां मध्यधन जानते हैं और अन्त्यधन जानते हैं तथा सर्व धन जानते
ह परंतु आदिधन नहीं जानते हैं; तहां आदि धन जाननेकी रीति आधे श्लोकमें
लिखते हैं-
गच्छहृते गणिते वदनं स्याद्वेकपदघ्नचयार्द्धविहीने ॥
अन्वयः-गणित गच्छहृते व्येकपदघ्नचयार्द्धविहीने च वदनं स्यात् ॥
अर्थः-गणित ( श्रेढीव्यवहार अर्थात् सर्वधन ) में गच्छका भाग ले; जो लब्धि
आवे उसमें एक करके हीन पदसे गुणा किये हुए चयके आधेको घटावे जो शेष
रहे वही मुख ( आदिधन ) जानना ॥
उदाहरणम्-
पञ्चाधिकं शतं श्रेढीफलं सप्तपदं किल ॥
चयं त्रयं वयं विद्मो वदनं वद नन्दन ॥ १ ॥
अन्वयः-हे नन्दन ! किल पञ्चाधिकं शतं श्रेढीफलं सप्तपदं त्रयं
चयं वयं विद्मः तत्र वदनं वद ? ॥ १ ॥
अर्थः-हे अतिआनन्द देनेवाले मित्र ! निश्चय करके हम १०५ एकसौ पाँच
सर्वधन और ७ सात पद ( गच्छ ) ३ तीन चय हम जानते हैं तो तहां आदि धन
क्या होगा ? सो कहो ॥ १ ॥