लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
३८० | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'हे राजन्' यहां सम्बुद्धि का लोप होने पर भी प्रत्ययलक्षण परिभाषा द्वारा
सम्बुद्धि को मान कर नकारलोप का निषेध हो जाता है—हे राजन्' ।
[लघु०] वा०— (२५) ङावुत्तरपदे प्रतिषेधो वक्तव्यः ॥
ब्रह्मनिष्ठ । राजानौ । राजान । राज्ञ ॥
अर्थ—उत्तरपदपरक 'ङि' के परे होने पर न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र का
निषेध कहना चाहिये ।
व्याख्या—ङौ ।७।१। उत्तरपदे ।७।१। प्रतिषेध ।१।१। वक्तव्य ।१।१। अर्थ—
(उत्तरपद) उत्तरपद परे होने पर (ङौ) जो ङि, उस के परे होने पर (प्रतिषेध )
निषेध (वक्तव्य ) कहना चाहिये । किस का निषेध कहना चाहिये ? इस का उत्तर
यह है कि जिस सूत्र पर जो वार्त्तिक पढ़ा जाता है वह तत्सूत्रविषयक ही समझा जाना
है। यहां यह वार्त्तिक न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र पर पढ़ा गया है अतः यह न
ङिसम्बुद्धयो द्वारा प्राप्त नकार-लोप के निषेध का ही निषेध करेगा।¹
यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि व्याकरण में समास के अन्तिम पद को
उत्तरपद तथा आदिम पद को पूर्वपद कहते हैं। यथा—राज्ञ पुरुष = राजपुरुष ।
यहां 'राज्ञ' यह षष्ठ्यन्त पूर्वपद तथा 'पुरुष' यह प्रथमान्त उत्तरपद है।
ब्रह्मनिष्ठ । ब्रह्मणि निष्ठा यस्य स ब्रह्मनिष्ठ । ब्रह्म में स्थिति या विश्वास
रखने वाला पुरुष 'ब्रह्मनिष्ठ' कहाता है । 'ब्रह्मन्+ङि निष्ठा+सुं' यहां बहुव्रीहिसमास में
सुपो धातु० (७२१) सूत्र से ङि और सुं का लुक् हो कर न लोप प्रातिपदिकान्तस्य
(१८०) सूत्र से नकार का लोप प्राप्त होता है, परन्तु न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र
उस लोप का निषेध कर देता है क्योंकि प्रत्ययलक्षणपरिभाषा से 'ङि' परे स्थित है।
अब ङावुत्तरपदे० इस प्रकृत वार्त्तिक से उस निषेध का भी निषेध हो कर पुनः न लोपः
प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) से नकारलोप हो जाता है। यहां 'ङि' से परे 'निष्ठा' यह
उत्तरपद विद्यमान है। 'ब्रह्मनिष्ठा' ऐसा होने पर गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य (६५२) सूत्र
द्वारा ह्रस्व हो कर विभक्ति लाने से ब्रह्मनिष्ठ' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार—
'आत्मविश्वास, चर्मतिल' आदि प्रयोग जानने चाहियें।
'राजन्+शस्' (शस्) यहां अल्लोपोऽन (२४७) सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के
अकार का लोप हो कर—'राजन्+अस्' हुआ। अब स्तोः श्चुना श्चुः (६२) सूत्र से
नकार को ञकार करने पर—राज्ञ्+अस्='राज्ञ' प्रयोग सिद्ध होता है।
नोट—'ज्ञ्' यह संयुक्त व्यञ्जन है। ज् और ञ् के योग से इस की निष्पत्ति
होती है। लिखने की सुविधा के लिये इस का ऐसा स्वरूप माना गया प्रतीत होता है।
'ज्ञ' को पृथक् वर्ण मान कर इस का 'ग्य' वा 'ज्य, ग्न, जन' आदि उच्चारण करना
नितान्त अशुद्ध और शास्त्रविरुद्ध है। यदि यह अपूर्व वर्ण बन जाता तो शिक्षाकार
१ यदि ङावुत्तरपदेऽप्रतिषेधो वक्तव्यः कही पाठ मिले तो उस का भाव यह होगा कि
न ङिसम्बुद्धयो वाले निषेध को मत करो अर्थात् वहां पर 'न्' का लोप कर दो।
हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८१
इस के उच्चारण का भी कहीं निर्देश करते; परन्तु उन्होंने ऐसा कहीं नहीं किया ।
इस को अपूर्व वर्ण मानने से स्तोः श्चुना श्चुः (६२) द्वारा श्चुत्व भी न हो सकेगा ।
यथा — तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्, एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम्, यज्ज्ञात्वा मुच्यतेऽशुभात् इत्यादि ।
सिद्धान्तकौमुदी के जञोर्ज्ञः पर शेखरकार का वक्तव्य भी यहां द्रष्टव्य है—जञयोगे लोक-
वेदसिद्धतादृशध्वनेर्लिपिविशेषस्य चानुवादकमभियुक्तवचनं न त्विदं वर्णान्तरम्, शिक्षा-
दावपरिगणितत्वेन सत्सत्त्वे मानाभावात् । अत एव 'तज्ज्ञानम्' इत्यादौ श्चुत्वसिद्धिः ।
किञ्च यदि इस का उच्चारण 'ग्य' आदि होता तो प्राकृत में—मणोज्ज (मनोज्ञ),
जण्ण (यज्ञ), अहिज्जो (अभिज्ञ), सव्वज्जो (सर्वज्ञ) इत्यादियों में इस प्रकार आदि
में जकार वा णकार न होता । अतः 'ज्ञ' कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं यह सिद्ध होता है ।
इसी प्रकार 'क्ष्' के विषय में भी समझना चाहिये । यह भी 'क् + ष्' के योग से
उत्पन्न होता है ।
राजन् + आ (टा)। भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर श्चुत्व करने से—
राज्ज् + आ = 'राज्ञा' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'राजन् + भ्याम्' इस स्थिति में न लोपः० (१८०) से पदान्त नकार का लोप
हो जाता है । तब 'राज + भ्याम्' इस अवस्था में सुपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त होता
है । उस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] नियम-सूत्रम्— (२८२) नलोपः सुप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु कृति ।
८।२।२॥
सुब्विधौ स्वरविधौ सञ्ज्ञाविधौ कृति तुग्विधौ च नलोपोऽसिद्धो नान्यत्र
'राजाश्व' इत्यादौ । इत्यसिद्धत्वाद् आत्वमेत्वमैस्त्वं च न । राजभ्याम् ।
राजभिः । राजभ्यः २ । राज्ञि, राजनि । राजसु ॥
अर्थः—सुब्विधि, स्वरविधि, सञ्ज्ञाविधि तथा कृत्प्रत्ययपरक तुग्विधि करने में
ही नकार का लोप असिद्ध होता है अन्यत्र नहीं । यथा—'राजाश्वः' इत्यादियों में
असिद्ध नहीं होता । इत्यसिद्धत्वाद् इति — इस सूत्र से यहां नकारलोप के असिद्ध होने
से आ-भाव, ए-भाव, ऐस्-भाव नहीं होता ।
व्याख्या — नलोपः ।१।१। सुप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु ।७।३। कृति ।७।१। असिद्धः
।१।१। (पूर्वत्रासिद्धम् से लिङ्गविपरिणाम कर के) । समासः—नस्य लोपः=नलोपः,
षष्ठीतत्पुरुषः । सुँप् च स्वरश्च सञ्ज्ञा च तुक् च = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुकः, इतरेतरद्वन्द्वः ।
तेषां विधयः = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधयः, तेषु = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु, षष्ठीतत्पुरुषः ।
विधिशब्दोऽत्र भावसाधनः । विधानं विधिः । यहां सुँवादिगत शेषषष्ठी के साथ विधि-
शब्द का समास हुआ जानना चाहिये । सुब्विधिः—सुँपो विधिः । यहां शेष में षष्ठी
होने के कारण 'सुँप्सम्बन्धी विधि' ऐसा अर्थ हो जाता है । सुँप्सम्बन्धी विधि दो प्रकार
की हो सकती है; एक तो सुँप् के स्थान पर, यथा—राजभिः । यहां अतो भिस ऐस्
(१४२) सूत्र से भिस्=सुँप् के स्थान पर ऐस् प्राप्त होता है । दूसरी सुँप् परे होने
३८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
पर, यथा—राजभ्याम्, राजभ्यः। यहां सुँप् परे होने पर आत्त्व तथा एत्त्व प्राप्त होता
है। स्वरविधि = स्वरस्य विधिः। यहां स्वर कर्म में शेषत्व की विवक्षा में षष्ठी
विभक्ति हुई है। 'स्वर को विधान करना' यह अर्थ यहां अभिप्रेत है। सञ्ज्ञाविधि =
सञ्ज्ञायाः विधिः। यहां भी कर्म में शेषत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति हुई है। 'सञ्ज्ञा
को विधान करना' यह अर्थ यहां अभिप्रेत है। तुग्विधि = तुको विधिः। यहां भी तुँक्
कर्म में शेषत्व की विवक्षा से षष्ठी विभक्ति जाननी चाहिये। 'कृति' यह 'तुग्विधि' के
साथ ही सम्बन्ध रखता है, असम्भव होने से अन्यों के साथ नहीं। अतः 'कृत् परे होने
पर तुँक् को विधान करना' यह अर्थ निष्पन्न होता है। अर्थ —(सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्वि-
धिषु) सुँप्सम्बन्धी विधान, स्वरविधान, सञ्ज्ञाविधान तथा कृत् प्रत्यय परे होने पर
तुग्विधान करने में (नलोपः) नकार का लोप (असिद्धः) असिद्ध होता है।
ये जितनी विधियां गिनाई गई हैं, सब अष्टाध्यायी के सवा सात अध्यायों में
स्थित हैं। अतः इन विधियों के प्रति नकार का लोप त्रिपादीस्थ होने से ही पूर्वत्रा-
सिद्धम् (३१) द्वारा असिद्ध है, पुनः यहां इन विधियों में नकारलोप को असिद्ध कहना
नियमार्थ है—सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः। अर्थात् इन विधियों में ही नकार का लोप
असिद्ध हो अन्य विधियां में न हो। यथा—राज्ञोऽश्वः = राजाश्वः। 'राजन्ङस् अश्वसुँ'
यहां षष्ठीतत्पुरुषसमास में सुँपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र से ङस् और सुँ का
लुक् हो—राजन् अश्व। न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप
हो—राज अश्व। अब यहां नलोप के असिद्ध होने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा
सवर्णदीर्घ नहीं हो सकता। पुनः इस उपर्युक्त नियम से नकारलोप के सिद्ध हो जाने
से वह हो जाता है। तो इस प्रकार—'राजाश्वः' रूप निष्पन्न होता है। इसी प्रकार
—दण्ड्यश्वः, योग्यात्मा, मन्त्राज्ञा आदि प्रयोगों में नकारलोप के सिद्ध होने से यण्,
'राजेन्द्रः' आदि प्रयोगों में गुण तथा 'राजीयति, राजायते' में क्रमशः क्यचि च (७२२)
में ईत्व और अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः (४८३) से दीर्घ हो जाता है। इस सूत्र का यही
प्रयोजन है।
'राज् + भ्याम्' यहां सुँपि च (१४१) से आत्त्व, 'राज् + भिस्' यहां अतो भिस
ऐस् (१४२) से भिस् का ऐस्, 'राज् + भ्यस्' यहां बहुवचने झल्येत् (१४५) में एत्त्व
ये सुँब्विधियां प्राप्त होती हैं। इन के प्रति नकारलोप असिद्ध ही है अतः इन में से
कोई भी कार्य न होगा। राजभ्याम्, राजभिः, राजभ्यः।
राजन् + ङि(डि)। यहां विभाषा ङिश्योः (२४८) सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के
अकार का वैकल्पिक लोप हो जाना है। लोपपक्ष में श्चुत्व हो कर—'राज्ञि'। लोपा-
भाव में—'राजनि'। 'राजन्' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
प्र० राजा राजानौ राजानः । प० राज्ञः राजभ्याम् राजभ्यः
द्वि० राजानम् " राज्ञः । ष० " राज्ञोः राज्ञाम्
तृ० राज्ञा राजभ्याम् राजभिः । स० राज्ञि, राजनि " राजसु
च० राज्ञे " राजभ्यः । सं० हे राजन्! हे राजानौ! हे राजानः!
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८३
इसी प्रकार निम्नस्थ शब्दों के रूप होते हैं। [ * यह चिह्न णत्वबोधक है ]
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
(१) अकिञ्चनिमनू = निर्धनता | (२४) प्रेमन्* = प्रियत्व, प्रेम, स्नेह
(२) अणिमन् = अणुत्व, अणुपना | (२५) बधिरिमन्* = बहरापन
(३) अम्लिमन् = अम्लत्व, खट्टापन | (२६) बंहिमन् = बाहुल्य, आधिक्य
(४) आशिमन् = आशुता, शीघ्रता | (२७) बालिमन् = बालपन, लड़कपन
(५) उष्णिमन् = उष्णता, गरमी | (२८) भूमन् = बहुत्व, आधिक्य
(६) ऋजिमन् = ऋजुता, सरलता | (२९) भृशिमन् = भृशता, बहुतायत
(७) कालिमन् = कालापन, कृष्णता | (३०) मधुरिमन्* = माधुर्य, मिठास
(८) कृष्णिमन् = कृष्णता, कालापन | (३१) मन्दिमन् = मन्दत्व, मन्दपना
(९) कृशिमन् = कृशत्व, दुबलापन | (३२) महिमन् = महत्त्व, गौरव
(१०) क्षेपिमन्* = क्षिप्रता, शीघ्रता | (३३) मूकिमन् = मूकता, गूंगापन
(११) क्षोदिमन् = क्षुद्रता, छुटप्पन | (३४) म्रदिमन् = मृदुता, कोमलता
(१२) गरिमन्* = गुरुत्व, गौरव | (३५) रक्तिमन् = रक्तता, लाली
(१३) चण्डिमन् = चण्डता, तीव्रता | (३६) लघिमन् = लघुता, हल्कापन
(१४) जटिमन् = जड़त्व, मूर्खता | (३७) लवणमन् = लवणता, नमकीनपन
(१५) तनिमन् = तनुत्व, पतलापन | (३८) लोहितिमन् = लोहितत्व, लाली
(१६) द्रढिमन् = दृढ़ता, कठोरता | (३९) वरिमन्* = उरुत्व, विशालता
(१७) द्राघिमन्* = दीर्घता, लम्बाई | (४०) शीतिमन् = शीतत्व, ठण्डक
(१८) पटिमन् = पटुता, चतुराई | (४१) शुक्लिमन् = शुक्लत्व, सुफेदी
(१९) पण्डितिमन् = पाण्डित्य, विद्वत्ता | (४२) श्वेतिमन् = श्वेतता, सुफेदी
(२०) परिवृढिमन् = स्वामित्व | (४३) साधिमन् = साधुत्व, सज्जनता
(२१) पाण्डिमन् = पाण्डुता, पीलापन | (४४) स्थेमन् = स्थिरता, दृढ़ता
(२२) पाण्डुरिमन्* = पीलापन, सुफेदी | (४५) स्वादिमन् = स्वादुपना
(२३) प्रथिमान् = पृथुता, विस्तार | (४६) ह्रसिमन् = ह्रस्वत्व, छुटप्पन
इसी प्रकार—अश्वत्थामन्, उक्षन्, तक्षन्, वृषन्, मूर्धन् प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।
[लघु०] यज्वा । यज्वानौ । यज्वानः ॥
व्याख्या—यजें (भ्वा० उभ०) धातु से सुयजोर्ङ्वनिँप् (३.२.१०३) सूत्र
१. ये सब शब्द पृथादिभ्यः इमनिँचू (११५२) सूत्र द्वारा भाव में इमनिँच् प्रत्यय करने से निष्पन्न होते हैं। इमनिँचूप्रत्ययान्त शब्द पुंल्लिङ्ग हुआ करते हैं। केवल 'प्रेमन्' शब्द कहीं २ नपुंसक में प्रयुक्त होता है।
३८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
द्वारा भूतकालिक 'क्वनिँप्' प्रत्यय हो कर 'यज्वन्' शब्द सिद्ध होता है। इष्टवान्
इति यज्वा, जो यज्ञ कर चुका है वह 'यज्वन्' कहाता है।
'यज्वन्' शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'राजन्' शब्दवत् होती है, केवल भसञ्ज्ञकों
में अल्लोपोऽनः (२४७) द्वारा प्राप्त अत् के लोप का निषेध हो जाता है—
[लघु०] निषेध-सूत्रम् (२८३) न संयोगाद्वमन्तात् ।६।४।१३७॥
वमन्तसंयोगादनोऽकारस्य लोपो न। यज्वनः। यज्वना। यज्वभ्याम्।
ब्रह्मन् । ब्रह्मणा ॥
अर्थ—वकारान्त वा मकारान्त संयोग से परे अन् के अकार का लोप न हो।
व्याख्या—वमन्तात् ।५।१। संयोगात् ।५।१। अनः ।६।१। अल्लोपः ।१।१।
(अल्लोपोऽनः से)। न इत्यव्ययपदम्। समास—वश्च म् च=वमौ, इतरेतरद्वन्द्वः ।
वकारादकार उच्चारणार्थः। वमौ अन्तो यस्य स वमन्, तस्मात् =वमन्तात्, बहुव्रीहि-
समासः। अर्थ—(वमन्तात्) वकारान्त और मकारान्त (संयोगात्) संयोग से परे
(अनः) अन् के (अल्लोपः) अकार का लोप (न) नहीं होता।
'यज्वन् + टा (शस्)' यहां 'यज्व्-अन्' शब्द में 'ज्व्' यह वकारान्त संयोग
है अतः इस से परे अन् के अकार का लोप न हुआ—'यज्वनः' सिद्ध हुआ। एवम् आगे
भी भसञ्ज्ञाओं में समझ लेना चाहिये। रूपमाला यथा—
प्र० यज्वा यज्वानौ यज्वानः | प० यज्वनः यज्वभ्याम् यज्वभ्यः
द्वि० यज्वानम् ,, यज्वनः | ष० ,, यज्वनोः यज्वनाम्
तृ० यज्वना यज्वभ्याम् यज्वभिः | स० यज्वनि ,, यज्वसु
च० यज्वने ,, यज्वभ्यः | सं० हे यज्वन् ! हे यज्वानौ ! हे यज्वानः !
मकारान्त संयोग का उदाहरण 'ब्रह्मन्' (ब्रह्मा अथवा ब्राह्मण) है। 'ब्रह्मन्
- टा (शस्)' यहां 'ब्रह्म-अन्' शब्द में 'ह्म' यह मकारान्त संयोग है अतः इस से परे
भसञ्ज्ञा अन् के अकार का लोप न हुआ—'ब्रह्मणा'। रूपमाला यथा—
प्र० ब्रह्मा ब्रह्माणौ ब्रह्माणः | प० ब्रह्मणः ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभ्यः
द्वि० ब्रह्माणम् ,, ब्रह्मणः | ष० ,, ब्रह्मणोः ब्रह्मणाम्
तृ० ब्रह्मणा ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभिः | स० ब्रह्मणि ,, ब्रह्मसु
च० ब्रह्मणे ,, ब्रह्मभ्यः | सं० हे ब्रह्मन् ! हे ब्रह्माणौ ! हे ब्रह्माणः !
इसी प्रकार—१ आत्मन् (आत्मा)। २ अश्मन् (पत्थर)। ३ पुण्ड्रधन्वन्
(कामदेव)। ४ शार्ङ्गधन्वन् (विष्णु)। ५ सुपर्वन् (बाण, देवता)। ६ अनर्वन् (शत्रु-
रहित)। ७ पृषत्त्वन्मन् (अग्नि)। ८ मातरिश्वन् (वायु)। ९ सुधमँन् (देवसभा)।
१० प्रकृष्टवर्मन् (शुभ वर्मों वाला)। ११ अग्रजन्मन् (बड़ा भाई, ब्राह्मण)। १२.
अन्तरामन् (परमात्मा)। १३ अभ्रिधन्वन् (मित्र)। १४ अनुजन्मन् (छोटा भाई)।
१५ अध्वन्मन् (अनभ्यासी)। १६ अनात्मन् (जो पदार्थ आत्मा नहीं—शरीर आदि)।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८५
१७. सुशर्मन् (प्राचीनकाल का एक राजा, अच्छी तरह सुखी) । १८. शतधन्वन्
(प्राचीनकाल का एक राजा)। १६. पाप्मन् (पाप)। २०. अध्वन् (मार्ग)-इत्यादि
शब्दों के रूप होते हैं।
वृत्रं हतवान् इति वृत्रहा । वृत्रकर्मोपपदाद् हन हिंसागत्योः (अदा० प०) इति
धातोर् ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विप् (३.२.८७) इति भूते कर्तरि क्विप् । वृत्र को मारने के
कारण इन्द्र का नाम 'वृत्रहन्' है ।
वृत्रहन् + स् (सुं) । यहां सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) द्वारा नान्त की
उपधा को दीर्घ प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है-
[लघु०] नियम-सूत्रम्-(२८४) इन्हन्पूषार्यम्णां शौ ।६।४।१२॥
एषां शावेवोपधाया दीर्घा नान्यत्र । इति निषेधे प्राप्ते-
अर्थः-इन्नन्त, हन्शब्दान्त, पूषन्शब्दान्त तथा अर्यमन्शब्दान्त अङ्गों की उपधा
को शि परे होने पर ही दीर्घ हो अन्यत्र न हो। इस से निषेध प्राप्त होने पर (अग्रिम-
सूत्र प्रवृत्त होता है।)
व्याख्या-इन्हन्पूषार्यम्णाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य का वचन-
विपरिणाम हो जाता है)। शौ ।७।१। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से)। दीर्घः ।१।१।
(ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । 'अङ्गानाम्' का विशेषण होने से 'इन्हन्पूषार्यम्णाम्' से
तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः- (इन्हन्पूषार्यम्णाम्) इन्नन्त, हन्नन्त, पूषन्दशब्दान्त तथा
अर्यमन्दशब्दान्त (अङ्गानाम्) अङ्गों की (उपधायाः) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ
हो जाता है (शौ) शि परे होने पर।
नपुंसकलिङ्ग में 'शि' की शि सर्वनामस्थानम् (२३८) सूत्र-द्वारा सर्वनाम-
स्थानसञ्ज्ञा होती है, अतः उस के परे होने पर सूत्र में गिनाये सब शब्दों की उपधा
को सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से ही दीर्घ हो सकता है। पुनः इस सूत्र द्वारा
दीर्घविधान सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः के अनुसार नियमार्थ है। अर्थात्-इन की
उपधा को यदि दीर्घ हो तो 'शि' परे होने पर ही हो, अन्यत्र न हो-यह नियम फलित
होता है।
'वृत्रहन् + स्' यहां हन्शब्दान्त से परे 'सुं' वर्तमान है 'शि' नहीं, अतः प्रकृत-
नियम से यहां दीर्घ प्राप्त नहीं हो सकता। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है-
[लघु०] विधि-सूत्रम्-(२८५) सौ च ।६।४।१३॥
इन्नादीनामुपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सौ (परे) । वृत्रहा । हे वृत्रहन् ! ॥
अर्थः- इन्नन्त आदि अङ्गों की उपधा को दीर्घ हो, सम्बुद्धि-भिन्न सुं परे हो तो।
व्याख्या-इन्हन्पूषार्यम्णाम् ।६।३। (इन्हन्पूषार्यम्णां शौ से)। अङ्गानाम्
।६।३। (अङ्गस्य यह अधिकृत है) । उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से) । दीर्घः ।१।१।
(ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। (सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ से)। सौ
।७।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थः-(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुं परे होने पर
ल० प्र० (२५)
१८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
(इन्हन्पूषार्यम्णाम्) इन्नन्त, हन्नन्त, पूषन्शब्दान्त तथा अर्यमन्शब्दान्त (अङ्गानाम्)
अङ्गो की (उपधाया ) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। पूर्वसूत्र के
नियम से 'सुं' मे दीर्घ नही हो सकता था, अब इस से 'सुं' मे हो जाता है। शेष 'शि'-
भिन्न सर्वनामस्थान मे पूर्वनियमानुसार निषेध ही रहेगा।
'वृत्रहन् + स्' यहा प्रकृतसूत्र से दीर्घ हो जाता है - वृत्रहान् + स् । अब हल्ङ्या-
ब्भ्य० (१७६) से सकारलोप तथा न लोप ० (१८०) से नकार का लोप हो कर
'वृत्रहा' प्रयोग सिद्ध होता है।
'वृत्रहन् + औ' यहा प्राप्त उपधादीर्घ का इन्हन्पूषार्यम्णां शो (२८४) सूत्र से
निषेध हो जाता है। अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व भी नही हो सकता क्योकि समान-
पद नही है। अत णत्व करने के लिये अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है-
[लघु०] विधि-सूत्रम् - (२८६) एकाजुत्तरपदे णः ।८।४।१२॥
एकाजुत्तरपदं यस्य तस्मिन्समासे पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य प्राति-
पदिकान्तनुम्विभक्तिस्थस्य नस्य ण स्यात् । वृत्रहणौ ॥
अर्थः-एक अच् वाला उत्तरपद है जिस के, ऐसे समास मे पूर्वपद मे ठहरे
निमित्त (ऋ, र् ष्) से परे प्रातिपदिकान्त, नुंम् तथा विभक्ति मे स्थित नकार को
णकार आदेश हो जाता है।
व्याख्या - एकाजुत्तरपदे ।७।१। पूर्वपदाभ्याम् ।५।२। (पूर्वपदारसञ्ज्ञायामगः
मे) । रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। ण. ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समानपदे से)। प्राति-
पदिकान्तनुम्विभक्तिषु ।७।३। (प्रातिपदिकान्त० से)। समास - एकोऽच् यस्मिन् तद्
एकाच्, बहुव्रीहिसमास । एकाच् उत्तरपदं यस्य स एकाजुत्तरपद. (समास), तस्मिन्
= एकाजुत्तरपदे, बहुव्रीहिसमास । पूर्व पदं ययोस्तो पूर्वपदो (रषौ), ताभ्याम् =
पूर्वपदाभ्याम् (रषाभ्याम्), बहुव्रीहिसमासः । प्रातिपदिकस्य अन्त = प्रातिपदिकान्त,
षष्ठीतत्पुरुष । प्रातिपदिकान्तश्च नुम् च विभक्तिश्च = प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तय,
तासु = प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ - (एकाजुत्तरपदे) जिस समास
में उत्तरपद एक अच् वाला हो उस समास मे (पूर्वपदाभ्याम्) पूर्वपद वाले (रषा-
भ्याम्) रेफ षकार से परे (प्रातिकान्तनुम्विभक्तिपु) प्रातिपदिक के अन्त मे, नुंम् मे,
तथा विभक्ति मे स्थित (न.) नकार के स्थान पर (ण) णकार आदेश हो जाता है।
'वृत्रहन् + औ' यहा उपपदसमास मे 'वृत्र' यह पूर्वपद तथा 'हन्' यह उत्तरपद
है। उत्तरपद 'हन्' एक अच् वाला है। पूर्वपद मे तकारोत्तर रेफ भी विद्यमान है अत
उस से परे प्रातिपदिक के अन्त मे स्थित नकार को णकार हो कर 'वृत्रहणौ' प्रयोग
सिद्ध होता है। इसी प्रकार आगे सर्वनामस्थानों मे - 'वृत्रहण, वृत्रहणम्, वृत्रहणौ' रूप
बनते हैं।
'वृत्रहन् + अस्' (शस्) यहा एकाजुत्तरपदे णः (८४ १२) के असिद्ध होने से
अल्लोपोऽन. (६४ १३४) द्वारा अन् के अकार का लोप हो जाता है। 'वृत्रहन् +
अस्' इस अवस्था में अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होना है-
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८७
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२८७) हो हन्तेर्ञ्णिन्नेषु ।७।३।५४॥
ञिति णिति प्रत्यये नकारे च परे हन्तेर्हकारस्य कुत्वं स्यात्।
वृत्रघ्नः। इत्यादि। एवं शार्ङ्गिन्, यशस्विन्, अर्यमन्, पूषन्॥
अर्थः—ञित् णित् प्रत्यय परे होने पर अथवा नकार परे होने पर हन् धातु के
हकार को कवर्ग (घकार) आदेश हो जाता है।
व्याख्या—हन्तेः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। हः ।६।१। ञ्णिन्नेषु
।७।३। कु ।१।१। (चजोः कु घिण्ण्यतोः से)। समासः—ञ् च् ण् च=ञ्णौ, इतरेतर-
द्वन्द्वः। ञ्णौ इतौ ययोस्तौ=ञ्णितौ (अङ्गाधिकारत्वात्प्रत्ययौ), बहुव्रीहिसमासः।
ञ्णितौ च नश्च=ञ्णिन्नास्तेषु=ञ्णिन्नेषु, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(ञ्णिन्नेषु) ञित्
णित् प्रत्यय अथवा नकार परे होने पर (अङ्गस्य) अङ्गसञ्ज्ञक (हन्तेः) हन् धातु के
(हः) हकार के स्थान पर (कु) कवर्ग आदेश हो जाता है। हकार का—संवार,
नाद, घोष तथा महाप्राण यत्न है; कवर्गों में तत्सदृश केवल घकार ही है, अतः हकार
के स्थान पर आन्तरतम्य से घकार ही कवर्ग आदेश होगा।¹
'वृत्रहन् + अस्' यहां नकार परे है अतः प्रकृतसूत्र से हकार को कवर्ग-घकार
आदेश हो कर 'वृत्रघ्नः' रूप सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां उत्तरपद के एकाच् न
रहने से पूर्वसूत्रद्वारा णत्व नहीं होता। इसी प्रकार आगे भसञ्ज्ञकों में जब अल्लो-
पोऽनः (२४७) से अन् के अकार का लोप हो जाता है तब नकार परे होने से हकार
को घकार हो जाता है। यथा—टा में—'वृत्रघ्ना'; ङे में—'वृत्रघ्ने'; ङसिं और ङस्
में—'वृत्रघ्नः'; ओस् में 'वृत्रघ्नोः'; आम् में—'वृत्रघ्नाम्' रूप बनते हैं। ङि में
विभाषा ङिश्योः (२४८) द्वारा अन् के अकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है
अतः लोपपक्ष में नकार परे रहने से 'वृत्रघ्नि' और लोपाभाव में नकार परे न होने के
कारण 'वृत्रहणि' रूप बनते हैं। रूपमाला यथा—
प्र० वृत्रहा वृत्रहणौ वृत्रहणः | प० वृत्रघ्नः वृत्रहभ्याम् वृत्रहभ्यः
द्वि० वृत्रहणम् ,, वृत्रघ्नः | ष० ,, वृत्रघ्नोः वृत्रघ्नाम्
तृ० वृत्रघ्ना वृत्रहभ्याम् वृत्रहभिः | स० वृत्रघ्नि, वृत्रहणि ,, वृत्रहसु
च० वृत्रघ्ने ,, वृत्रहभ्यः | सं० हे वृत्रहन्! हे वृत्रहणौ! हे वृत्रहणः!
इसी प्रकार—ब्रह्महन्, भ्रूणहन् शब्दों के उच्चारण होते हैं।
शार्ङ्गिन् (विष्णु)। शार्ङ्गम्=शृङ्गनिर्मितं धनुरस्यास्तीति शार्ङ्गी। अत
इनिँठनौ (११८७) इतीनिँप्रत्ययः। रूपमाला यथा—
प्र० शार्ङ्गी* शार्ङ्गिणौ शार्ङ्गिणः | प० शार्ङ्गिणः शार्ङ्गिभ्याम् शार्ङ्गिभ्यः
द्वि० शार्ङ्गिणम् ,, ,, | ष० ,, शार्ङ्गिणोः शार्ङ्गिणाम्
तृ० शार्ङ्गिणा शार्ङ्गिभ्याम् शार्ङ्गिभिः | स० शार्ङ्गिणि ,, शार्ङ्गिषु
च० शार्ङ्गिणे ,, शार्ङ्गिभ्यः | सं० हे शार्ङ्गिन्! शार्ङ्गिणौ! शार्ङ्गिणः!
१. ञित् के उदाहरण 'घातः' आदि तथा णित् के उदाहरण 'जघान' आदि आगे
आयेंगे।
३८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२७४)' नियम से उपधादीर्घ के निषिद्ध होने पर 'सौ च
(२८५)' से दीर्घ हो सकार और नकार का लोप हो जाता है।
‡ 'शार्ङ्गिणौ' आदियों में अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व हो जाता है। 'हे
शार्ङ्गिन् !' में पदान्तस्य (१३६) सूत्र द्वारा णत्वनिषेध होता है।
† 'शार्ङ्गिषु' में सुब्विधि न होने से नकार का लोप असिद्ध नहीं होता, अतः
णत्व करने में बाधा नहीं होती।
इस प्रकार के इन्अन्त शब्द संस्कृतसाहित्य में बहुत हैं। कुछ का बालोपयोगि-
सङ्ग्रह नीचे दिया जा रहा है। यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का परिचायक है।
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
अनृच्छिन् = ऋणरहित | कृतिन् = पण्डित | नयशालिन् = नीतिज्ञ
अनृणिन् = " | केसरिन् = शेर | निवासिन् = रहने वाला
अक्षदेविन् = जुआरी | क्रोधिन् = क्रोधी | पक्षिन् = परिन्दा
अज्ञानिन् = अज्ञानी | क्षणविध्वंसिन् = क्षणिक | परदेशिन् = विदेशी
अतिशायिन् = बढ़ा हुआ | खड्गिन् = गैण्डा | परमेष्ठिन् = ब्रह्मा
अधिकारिन्* = अधिकारी | गुणिन् = गुणयुक्त | परिपन्थिन् = शत्रु
अधीतिन्¹ = विद्वान् | गृहमेधिन् = गृहस्थी | पादचारिन्* = पैदल
अनुजीविन् = सेवक | गृहिन्* = " | पाशिन् = यमराज
अनुयायिन् = अनुयायी | गृहीतिन् = समझा हुआ | पिनाकिन् = शिव
अन्तेवासिन् = शिष्य | घोणिन् = सूअर | पुष्करिन्* = हाथी
आगामिन् = आने वाला | चक्रवर्तिन् = सार्वभौम | प्रकम्पिन् = कापने वाला
आततायिन् = दुष्ट | चक्रिन्* = चक्रधारी | प्रणयिन् = प्रेमी
उपजीविन् = सेवक | जन्मिन् = प्राणी | प्रतिवेशिन् = पड़ौसी
उपयोगिन् = उपयोगी | जम्भभेदिन् = इन्द्र | प्रत्यर्थिन् = शत्रु
ऊर्मिमालिन् = समुद्र | ज्ञानिन् = ज्ञानी | प्रवासिन् = परदेश गया
एकाकिन् = अकेला | तपस्विन् = तपस्वी | प्राणिन् = प्राणी
कञ्चुकिन् = कञ्चुकी | त्यागिन् = त्यागी | फणिन् = फणधर सांप
कपटिन् = कपटी | दंष्ट्रिन्* = सूअर | फलिन् = फल वाला पेड़
कपालिन् = महादेव | दण्डिन् = दण्डधारी | बलशालिन् = बलवान्
करटिन् = हाथी | दन्तिन् = हाथी | बलिविध्वंसिन् = विष्णु
करिन्* = हाथी | दीर्घदर्शिन् = दूरदर्शी | बलिन् = बलवान्
कलापिन् = मोर | देहिन् = जीवात्मा | बुद्धिशालिन् = बुद्धि मान्
कामिन् = कामी | द्वारिन्* = द्वारपाल | ब्रह्मचारिन्* = ब्रह्मचारी
किरणमालिन् = सूर्य | दीपिन् = बाघ | ब्रह्मवादिन् = ब्रह्मवादी
कुण्डलिन् = सांप | धनिन् = धनवान् | भागिन् = हिस्सेदार
१ इस के योग में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है—व्याकरणेऽधीती।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८६
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
भिक्षाशिन् = भिक्षुक | वनमालिन् = श्रीकृष्ण | शिखण्डिन् = मोर
भोगिन् = सांप, राजा | वनवासिन् = वनवासी | शिल्पिन् = कारीगर
मनस्विन् = बुद्धिमान् | वशवर्त्तिन् = आज्ञाकारी | शेषशायिन् = विष्णु
मनीषिन्* = बुद्धिमान् | वशिन् = वशवर्त्ती | श्रमिन्* = परिश्रमी
मन्त्रिन्* = मन्त्री | वाग्मिन् = वाक्पटु | श्रेष्ठिन् = धनवान्
मरीचिमालिन् = सूर्य | विटपिन् = वृक्ष | संयमिन् = संयमी
मस्करिन्* = संन्यासी | वियोगिन् = विरही | सङ्गिन् = साथी
मानिन् = अभिमानी | वीचिमालिन् = समुद्र | सञ्चारिन्* = सञ्चारी
मालिन् = मालाधारी | वैरिन्* = शत्रु | सत्यवादिन् = सत्यवादी
मुण्डिन् = सिरमुण्डा | व्यभिचारिन्* = दुराचारी | सब्रह्मचारिन्* = सहपाठी
मेधाविन् = बुद्धिमान् | व्यवायिन् = व्यभिचारी | सव्यसाचिन् = अर्जुन
योगिन् = योगी | व्यापिन् = व्यापक | सहकारिन्* = सहयोगी
रथारोहिन्* = रथसवार | व्योमचारिन्* = नभचर | साक्षिन्* = गवाह
रूपधारिन्* = रूपधारी | व्रतिन् = व्रत वाला | सादिन् = घुड़सवार
रोगिन्* = रोगी | शमिन् = शान्त | स्वामिन् = स्वामी
लाङ्गलिन् = बलराम | शरीरिन्* = जीवात्मा | हस्तिन् = हाथी
लिङ्गिन् = साधु | शास्त्रदर्शिन् = शास्त्रज्ञ | हितैषिन्* = हितेच्छुक
लोभिन् = लोभी | शास्त्रिन्* = शास्त्रज्ञ |
नोट— ध्यान रहे कि इन्अन्त शब्दों का इकार, आम् में सदा ह्रस्व ही रहता
है। यथा—योगिनाम्, करिणाम्, धनिनाम् आदि। इस की दीर्घता केवल सुँ में ही हुआ
करती है—योगी, करी, धनी आदि। समास में नकार का लोप हो कर इकार ह्रस्व
ही रहता है। यथा—विटपिनः शाखा—विटपिशाखा। रोगिणश्चर्या—रोगिचर्या।
स्त्रीलिङ्ग में इन्अन्त शब्दों का प्रयोग करना हो तो इन के आगे ऋन्नेभ्यो ङीप्
(२३२) द्वारा ङीप् प्रत्यय किया जाता है। ङीप् के अनुबन्धों का लोप हो कर 'ई'
मात्र अवशिष्ट रहता है। तब इस की रूपमाला गौरीशब्द के समान होती है—
योगिनी, योगिन्यौ, योगिन्यः आदि।
हिन्दी में इन्अन्त शब्द ईकारान्त के रूप में प्रचलित हैं अतः कई लोग इन को
ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग समझने की भूल किया करते हैं। इस से सावधान रहना चाहिये।
पूषन् (सूर्य)। पूषन् शब्द श्वन्नुक्षन्पूषन्० (उणा० १५७) इस औणादिक
सूत्र द्वारा पुष पुष्टौ (क्र्या० प०) धातु से कनिन्प्रत्ययान्त निपातित होता है।
पुष्णातीति पूषा। जगत् को पुष्टि प्रदान करने के कारण सूर्य का नाम 'पूषन्'
है। विकर्त्तनाऽर्क-मार्तण्ड-मिहिराऽरुणपूषणः—इत्यमरः। 'पूषन्' शब्द की रूपमाला
यथा—
३६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
प्र० पूषा‡ पूषणौ† पूषण † प० पूष्ण * पूषभ्याम् पूषभ्य
द्वि० पूषणम्† ,† पूष्ण * ष० ,, * पूष्णो * पूष्णाम्*
तृ० पूष्णा* पूषभ्याम् पूषभि स० पूष्णि पूषणि✓ ,, पूषसु
च० पूष्णे* ,, पूषभ्य स० हे पूषन्' हे पूषणौ' हे पूषण '
‡ इनहन्पूषार्यम्णां शौ (२८४), सौ च (२८५) ।
† ष्ट हन्निति नियमात् दीर्घ । णत्वमत्र अट्कु० (१३८) इति सूत्रेण भवति ।
भसञ्ज्ञकेषु तु अल्लोपे कृते रषाभ्या नो ण समानपदे (२६७) इति णत्व बोध्यम् ।
*अल्लोपोऽन (२४७) । ✓ विभाषा ङिश्यो (२४८) ।
अर्यमन् (सूर्य) । इवन्वुक्षन्० (उणा० १५७) इत्युणादिसूत्रेण अर्योपपदाद्
माङ माने (जुहो० आ०) इत्यस्माद्धातो कनिन्प्रत्ययान्तो निपात्यते । रूपमाला
यथा-
प्र० अयमा अर्यमणौ अर्यमण प० अर्यम्ण अर्यमभ्याम् अर्यमभ्य
द्व० अर्यमणम् ,, अर्यम्ण ष० ,, अर्यम्णो अर्यम्णाम्
तृ० अर्यम्णा अर्यमभ्याम् अर्यमभि स० अर्यम्णि,अर्यमणि ,, अर्यमसु
च० अर्यम्णे ,, अर्यमम्य स० हे अर्यमन्' अर्यमणौ' अर्यमण '
णत्व सर्वत्र अट्कु० (१३८) सूत्र से ही होता है।
यशस्विन् (यशस्वी = कीर्तिमान्) । [यशोऽस्यास्तीति -- यशस्वी, अस्माया-
मेधास्रजो विनिः (११८४) इति मत्वर्थे विनिप्रत्यय ] । रूपमाला यथा-
प्र० यशस्वी यशस्विनौ यशस्विन प० यशस्विन यशस्विभ्याम् यशस्विम्य
द्वि० यशस्विनम् ,, ,, ष० ,, यशस्विनो यशस्विनाम्
तृ० यशस्विना यशस्विभ्याम् यशस्विभि स० यशस्विनि ,, यशस्विषु
च० यशस्विने ,, यशस्विम्य स० हे यशस्विन्' यशस्विनौ' यशस्विन '
नोट-यहाँ 'यशस्विन्' में विन्प्रत्यय होने से 'इन्' अनर्थक तथा शार्ङ्गिन्'
म इनप्रत्यय होने से इन्' सार्थक है-समुदायो ह्यर्थवान् तदेकदेशोऽनर्थक । सार्थक
और अनर्थक के मध्य सार्थक का ही ग्रहण किया जाता है, अत इस के अनुसार
'यशस्विन्' आदि शब्दो मे इनहन्० (२८४) तथा सौ च (२८५) सूत्र प्रवृत्त नही हो
सकते थे । परन्तु इस विषय की-अनिन्स्मन्गहणान्यर्थवता चानर्थकन च तदन्तविधि
प्रयोजयन्ति (जिन सूत्रो मे अन्, इन्, अस्, मन् का ग्रहण हो वे सूत्र इन के सार्थक
अथवा अनर्थक होने पर भी एतदन्तो मे प्रवृत्त हो जाते हैं) । इस परिभाषा से
१ परिभाषोदाहरणानि यथा -राज्ञ इत्यत्र अन् अर्थवान्, दाम्न इत्यत्र तु अनर्थक ।
शाङ्गों इत्यत्र इन् अर्थवान्, यशस्वी इत्यत्र तु अनर्थक । सुपया इत्यत्र अस् अर्थ-
वान्, सुश्रोता इत्यत्र तु अनर्थक । अमन्तत्वाद् उभयत्र दीर्घ (३४३) । सुशर्मा
इत्यत्र मन् अर्थवान्, सुप्रथिमा इत्यत्र तु अनर्थक । मन (४।१।१०) इति उभयत्र
न ङीप् ।
हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६१
अनर्थक 'इन्' होने पर भी इन्हुन्० आदि सूत्रों की प्रवृत्ति हो जाती है। इस बात को
जनाने के लिये ही ग्रन्थकार ने यहां 'यशस्विन्' यह इन् का दूसरा उदाहरण दिया है,
अन्यथा 'शार्ङ्गिन्' यह उदाहरण तो वे दे ही चुके थे।
मघवन् (इन्द्र)। श्वन्नुक्षन्० (उणा० १५७) इति सूत्रेण मह पूजायाम्
(भ्वा० प०) इति धातोः कनिन्प्रत्ययो हस्य घो वुंगागमश्च निपात्यते ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (२८८) मघवा बहुलम् ।६।४।१२८॥
'मघवन्' शब्दस्य वा तृँ इत्यन्तादेशः स्यात् । ऋ इत्¹॥
अर्थः— मघवन् शब्द को विकल्प कर के 'तृँ' अन्तादेश हो। ऋ इत्—ऋकार
की इत्सञ्ज्ञा हो जाती है।
व्याख्या—मघवा ।१।१। (छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति—के अनुसार यहां षष्ठी
विभक्ति के अर्थ में प्रथमा विभक्ति जाननी चाहिये)। बहुलम् ।१।१। तृँ ।१।१।
(अर्वणस्त्रसावनञः से। यहां प्रथमा विभक्ति का लुक् जानना चाहिये)। अर्थः—
(मघवा) मघवन् शब्द के स्थान पर (बहुलम्) विकल्प कर के² (तृँ) 'तृँ' यह
आदेश हो।
यद्यपि यह तृँ आदेश अनेकाल् होने से अनेकालशित्सर्वस्य (४५) सूत्र द्वारा
सम्पूर्ण 'मघवन्' शब्द के स्थान पर होना चाहिये; तथापि नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम्
(अनुबन्धों के कारण अनेकाल्ता नहीं माननी चाहिये) इस परिभाषा से इस के अने-
काल् न होने से सर्वादेश नहीं होता किन्तु अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्तादेश हो जाता है।
'मघवत्' यहां ऋकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा
और तस्य लोपः (३) से लोप हो कर 'मघवत्' शब्द बन जाता है। जिस पक्ष में
तृँ आदेश नहीं होता उस पक्ष में मघवन् ही रहता है उस का विवेचन आगे करेंगे।
'मघवत् + सु' (सुं) इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (२८६) उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः ।७।१।७०॥
अधातोरुगितो नलोपिनोऽञ्चतेश्च नुमागमः स्यात् सर्वनामस्थाने
परे। मघवान् । मघवन्तौ । मघवन्तः । हे मघवन् ! मघवद्भ्याम् । तृँत्वा-
ऽभावे—मघवा । सुंटि राजवत् ॥
अर्थः—सर्वनामस्थान परे होने पर धातुभिन्न उगित् को तथा जिस के नकार
का लोप हो चुका हो ऐसी 'अञ्चु' धातु को नुँम् का आगम हो जाता है।
व्याख्या—उगिदचाम् ।६।३। सर्वनामस्थाने ।७।१। अधातोः।६।१। नुँम् ।१।१।
१. यहां 'ऋ' यह विभक्तिरहित निर्दिष्ट किया गया है। प्रक्रियादशा में अविभक्तिक
निर्देश करने में भी कोई दोष नहीं होता।
२. 'बहुलम्' पद केवल विकल्प के लिये ही नहीं है अपितु—'मघवान्' रूप में उपधा-
दीर्घ करने पर संयोगान्तलोप असिद्ध न हो—इस के लिये भी समझना चाहिये।
३६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
(इदितो नुम् धातोः) । समास - उक् इत् येषां त=उगित्, बहुव्रीहिसमासः ।
उगितश्च अञ्च् च=उगिदञ्च्, तेषाम्=उगिदञ्चाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अञ्च्'शब्देनह
लुप्तनकारस्य अञ्चुँ गतिपूजनयोः (भ्वा० प०) इति धातोर्ग्रहणं भवति । न धातुः =
अधातुस्तस्य-अधातोः, नञ्समासः । अधातोरिति उगित्तावशेषणं सम्भवति न
तु अञ्चतेरिति वाच्यम् । अर्थ -(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर
(अधातोः) धातु से भिन्न (उगिदञ्चाम्) उक्-प्रत्याहार इत् वाले शब्दों का तथा
नकार लुप्त हुई अञ्चुँ धातु का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है।
भाव - जिन शब्दों में उकार, ऋकार, ऌकार वर्णों की इत्सञ्ज्ञा होती है
और यदि वे धातु नहीं तो सर्वनामस्थान परे होने पर उन को नुँम् का आगम हो
जाता है।
'मघवत् + सुँ' यहां 'तु' के ऋकार की इत्सञ्ज्ञा हुई है अतः यह उगित् है, इस
से पर 'सुँ' यह सर्वनामस्थान भी विद्यमान है। इसलिये मिदचोऽन्त्यात्परः (२६०)
परिभाषा की सहायता से प्रकृतसूत्र से अन्त्य अच् से परे नुँम् का आगम हो कर-
मघवन्ुँम् त् + सुँ = 'मघवन् त् + सुँ' हुआ। अब हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सकार
तथा संयोगान्तस्य लोपः (२०) से तकार का लोप हो कर- 'मघवन्' । पुनः प्रत्यय-
लक्षण द्वारा सुँ को मान कर सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ करने
से 'मघवान्' रूप निष्पन्न होता है।
नोट-यहां संयोगान्तस्य लोपः (८.२.२३) द्वारा किया लोप उपधा को
दीर्घ करने में असिद्ध नहीं होता। इस का कारण मघवा बहुलम् (२८६) सूत्र में
'बहुल' का ग्रहण है। 'बहुल' ग्रहण का तात्पर्य यह होता है कि लोकप्रसिद्ध इष्टरूप में
जितनी बाधाएं उपस्थित होती हैं न हों। 'मघवान्' रूप लोक में प्रसिद्ध है यथा-
हविर्भक्षिति विशङ्को मखेषु मघवानसौ (भट्टि०)। अतः इस की सिद्धि के अनुरूप
उपधादीर्घ करने में संयोगान्तलोप असिद्ध नहीं होता। नकार का लोप भी इसी कारण
नहीं होता। 'बहुल' शब्द पर विशेष विचार कृदन्तो में कृत्यल्युटो बहुलम् (७७२)
सूत्र पर किया जायेगा।
तुँत्वपक्ष में 'मघवन्'शब्द की रूपमाला यथा-
प्र० मघवान् मघवन्तौ* मघवन्तः | प० मघवतः मघवद्भ्याम् मघवद्भ्यः
द्वि० मघवन्तम् मघवन्तौ मघवतः | ष० मघवतः मघवतोः मघवताम्
तृ० मघवता मघवद्भ्याम् मघवद्भिः | स० मघवति मघवतोः मघवत्सु
च० मघवते मघवद्भ्याम् मघवद्भ्यः | सं० हे मघवन् ! हे मघवन्तौ ! हे मघवन्तः !
*यहाँ इतना विशेष है कि नुँम् का आगम होकर नश्चाऽपदान्तस्य झलि (७८)
१ लुप्तनकार अञ्चुँ धातु को नुँम् के उदाहरण-'प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः' आदि
आगे इसी प्रकरण में (३३४) सूत्र पर देखें।
हलन्त-पुलूँल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६३
सूत्र से अनुस्वार और अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६) से परसवर्ण—णकार हो
जाता है। इसी प्रकार जस्, अम् और औट् में भी प्रक्रिया होती है।
‡इत्यादियों में झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व-दकार हो जाता है।
†यहां नुम् का आगम हो कर हल्ङ्यादिलोप तथा संयोगान्तलोप हो जाता
है। सम्बुद्धि परे होने से सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) द्वारा उपधादीर्घ नहीं
होता। नकारलोप का निषेध पूर्ववत् न ङिसम्बुद्ध्योः (२८१) द्वारा हो जाता है।
तृँत्व के अभाव में—
जहां तृँ आदेश नहीं होता वहां सुट् अर्थात् सर्वनामस्थान तक तो मघवन्
शब्द के 'राजन्' शब्दवत् रूप बनते हैं। मघवा, मघवानौ, मघवानः, मघवानम्,
मघवानौ।
'मघवन् + अस्' (शस्) यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६०) श्वयुवमघोनामतद्धिते¹ ।६।४।१३३॥
अनन्तानां भसञ्ज्ञकानाम् एषाम् अतद्धिते परे सम्प्रसारणं स्यात्।
मघोनः। मघवभ्याम्। एवं श्वन्, युवन्॥
अर्थः—'अन्' शब्द जिन के अन्त में है ऐसे भसञ्ज्ञक श्वन्, युवन्, मघवन्
शब्दों को तद्धितभिन्न प्रत्यय परे होने पर सम्प्रसारण हो जाता है।
व्याख्या—अनाम् ।६।३। (अल्लोपोऽनः सूत्र से वचनविपरिणाम करके)।
भानाम् ।६।३। (भस्य इस अधिकार का वचनविपरिणाम हो जाता है)। श्वयुवमघो-
नाम् ।६।३। सम्प्रसारणम् ।१।१। (वसोः सम्प्रसारणम् से)। अतद्धिते ।७।१। समासः—
श्वा च युवा च मघवा च=श्वयुवमघवानः, तेषाम् = श्वयुवमघोनाम्, इतरेतरद्वन्द्वः।
न तद्धितः = अतद्धितस्तस्मिन् =अतद्धिते, नञ्समासः। यहां पर्युदास प्रतिषेध होने से
तद्धित से भिन्न तत्सदृश अर्थात् प्रत्यय का ग्रहण होता है। 'अनाम्' से तदन्तविधि
१. इस सूत्र पर एक सुभाषित अत्यन्त प्रसिद्ध है—
प्रश्नः— काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे
ग्रथ्नासि बाले! किमिदं विचित्रम्? उपजातिवृत्तम्
उत्तरम्ः— विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे
श्वानं युवानं मघवानमाह ॥
माला गूंथती हुई किसी बाला से प्रश्न किया गया कि तुम कांच, मणि और सोने
को एक—ही सूत्र (तागे) में क्यों गूंथ रही हो? वह उत्तर देती है—विचार-
वान् पाणिनिमुनि ने भी तो एक सूत्र में कुत्ते, युवा और इन्द्र को घसीट मारा है।
अत्यन्त समुचित उत्तर है। जब पाणिनि जैसे बुद्धिमान् लोग भी असमान वस्तुओं
को एक स्थान में बिठाते हैं तो भला मैं बाला (मूर्खा) ऐसा करूं तो इसमें
आश्चर्य की क्या बात है?
वस्तुतः यह कोई काव्य नहीं कि 'सहचरभिन्नता' दोष हो। शब्दशास्त्र में ऐसी
बात नहीं देखी जानी चाहिये। इस पद्य को कवि का विनोद समझना चाहिये।
३६४ भौमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
होती है। अर्थ — (अनाम्) अन्नन्त (भानाम्) भसञ्ज्ञक (श्वयुवमघोनाम्) श्वन्,
युवन् तथा मघवन् शब्दों को (अतद्धिते) तद्धितभिन्न प्रत्यय परे होने पर (सम्प्रसार-
णम्) सम्प्रसारण हो जाता है।
'मघवन् + अस्' यहाँ मघवन् शब्द अन्नन्त भी है, भसञ्ज्ञक भी है और इस
पर तद्धितभिन्न 'शस्' प्रत्यय भी विद्यमान है अतः इग्यण सम्प्रसारणम् (२५६) के
अनुसार प्रकृतसूत्र से वकार को उकार सम्प्रसारण हो कर—'मघ् उ अन् + अस्' ।
सम्प्रसारणाच्च (२५८) से उकार और अकार के स्थान पर पूर्वरूप उकार हो—
'मघ् उ न् + अस्' । अब आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण एकादेश करने पर—मघोन्
- अस् = मघोनस् = 'मघोनः' रूप सिद्ध होता है। इसी प्रकार अन्य भसञ्ज्ञकों में भी
जानना चाहिये। भ्याम् आदियों में राजन्शब्दवत् नकार का लोप (१८०) हो जाता
है—मघवभ्याम्, मघवद्भिः, मघवभ्यः। इस तृत्वाभावपक्ष में मघवन् शब्द की रूप-
माला यथा—
प्र० मघवा मघवानौ मघवानः | पं० मघोनः मघवभ्याम् मघवभ्यः
द्वि० मघवानम् ,, मघोनः | ष० ,, मघोनोः मघोनाम्
तृ० मघोना मघवभ्याम् मघवद्भिः | स० मघोनि ,, मघवसु
च० मघोने ,, मघवभ्यः | सं० हे मघवन् ! मघवानौ ! मघवानः !
यद्यपि श्वन्, युवन् तथा मघवन् शब्द स्वयम् अन्नन्त ('अन्' अन्त वाले) हैं,
इन के लिये 'अनाम्' पद का अनुवर्त्तन करना कुछ उचित प्रतीत नहीं होता, तथापि
यदि यहाँ 'अनाम्' पद का अनुवर्त्तन न करते तो तृँ आदेश के पक्ष में 'मघवत, मघ-
वन्तौ' आदि रूपों में एकदेशविकृतमनन्यवत् के न्यायानुसार 'मघवन्' शब्द समझ लिये
जाने से सम्प्रसारण हो जाता जो अनिष्ट था। परन्तु अब 'अन्नन्त मघवन्' इस प्रकार
के कथन से कुछ भी दोष नहीं होता, क्योंकि तृत्त्वपक्ष में अन्नन्त मघवन् नहीं किन्तु
तान्त मघवत् है। यदि यहाँ कोई यह शङ्का करे कि एकदेशविकृतन्याय से इसे अन्नन्त
भी मान लेंगे अतः आप का 'अनाम्' यह वचन दोषनिवृत्ति के लिये नहीं बन सकता
तो उस का उत्तर यह है कि एकदेशविकृतन्याय लोकमूलक है। जैसे लोक में पुच्छकटे
कुत्ते में कुत्ते का तो व्यवहार होता है परन्तु पूंछ के विषय में पूंछ का व्यवहार
नहीं होता, इसी प्रकार यहाँ 'मघवत्' शब्द में 'मघवन्' शब्द का तो व्यवहार होता है
परन्तु अन्नन्तत्व का व्यवहार नहीं होता अतः 'अनाम्' का अनुवर्त्तन करने से दोष
निवृत्त हो जाता है।
'तद्धितभिन्न' कथन का यह अभिप्राय है कि माघवनम् [मघवा देवता अस्य
हविष तत् = माघवनम्। साऽस्य देवता (१०३८) इति मघवञ्छब्दादरण तद्धितेऽव्-
त्वाभावे (६३८) इत्यादिवृद्धौ विभक्त्युत्पत्तौ—'माघवनम्' इति सिध्यति] यहाँ 'अण्'
तद्धित के परे होने पर सम्प्रसारण आदेश न हो।
श्वन् (कुत्ता)। यह शब्द व्युत्पत्तिपक्ष में श्वन्नुक्षन्० (उणा० १५३) सूत्र
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६५
द्वारा टुओँश्वि गतिवृद्ध्योः (भ्वा० प०) धातु से कनिँन् प्रत्यय तथा इकारलोप करने
पर निपातित हुआ है। इस की रूपमाला यथा—
प्र० श्वा श्वानौ श्वानः प० शुनः श्वभ्याम् श्वभ्यः
द्वि० श्वानम् ,, शुनः† प० ,, शुनोः शुनाम्
तृ० शुना श्वभ्याम् श्वभिः स० शुनि ,, श्वसु
च० शुने ,, श्वभ्यः सं० हे श्वन्! हे श्वानौ! हे श्वानः!
† 'श्वन्+शस्' (शस्) यहां श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से सम्प्रसारण
हो—शु अन्+अस् । सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप हो—शुन्+अस् = 'शुनः' ।
इसी प्रकार आगे भी भसञ्ज्ञकों में समझ लेना चाहिये ।
युवन् (जवान, श्रेष्ठ) । [व्युत्पत्तिपक्षे यु मिश्रणामिश्रणयोः (अदा० प०)
इति धातोः कनिँन् यु-वृषि-तक्षि-राजि-धन्वि-द्यु-प्रतिदिवः (उणा० १५४) इति सूत्रेण
कनिँन्प्रत्यये युवन्शब्दः सिध्यति] ।
सर्वनामस्थानों में इस की प्रक्रिया राजन्शब्दवत् होती है । युवा, युवानौ,
युवानः, युवानम्, युवानौ ।
'युवन्+अस्' (शस्) यहां श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से वकार को
सम्प्रसारण-उकार हो जाता है—यु उ अन्+अस् । अब सम्प्रसारणाच्च (२५८) से
पूर्वरूप तथा अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ करने पर—'यून्+अस्' बन
जाता है । अब इस स्थिति में श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से यकार को भी
इकार सम्प्रसारण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है—
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२६१) न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् ।६।१।३६॥
सम्प्रसारणे परतः पूर्वस्य यणः सम्प्रसारणं न स्यात् । इति यकारस्य
नेत्वम् । अत एव ज्ञापकादन्त्यस्य यणः पूर्वं सम्प्रसारणम् । यूनः । यूना ।
युवभ्याम् इत्यादि ॥
अर्थः—सम्प्रसारण परे होने पर पूर्व यण् को सम्प्रसारण नहीं होता । इति
यस्येति—इस सूत्र के कारण यकार को इकार नहीं होता । अत एवेत्यादि—इस ज्ञापक
से यह भी सिद्ध हो जाता है कि प्रथम अन्त्य यण् को सम्प्रसारण करना चाहिये ।
व्याख्या—सम्प्रसारणे ।७।१। सम्प्रसारणम् ।१।१। न इत्यव्ययपदम् । अर्थः—
(सम्प्रसारणे) सम्प्रसारण परे होने पर (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारण (न) नहीं होता ।
'यून्+अस्' यहां सम्प्रसारण परे है अतः पूर्व यकार को सम्प्रसारण नहीं होता—
यूनस् = 'यूनः' । अब यहां एक शङ्का उत्पन्न होती है कि यदि पूर्व यकार को पहले
सम्प्रसारण कर लिया जाये और वकार को बाद में सम्प्रसारण करें तो न सम्प्रसारणे
सम्प्रसारणम् (२६१) सूत्र निषेध न कर सकेगा, अतः यहां ऐसा क्यों न किया जाये ?
इस के समाधान में कहा है—अत एव ज्ञापकादित्यादि । अर्थात् यदि ऐसा किया जाये
तो न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् (२६१) सूत्र व्यर्थ हो जायेगा, क्योंकि तब इसे कोई
३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
भी स्थान प्रवृत्ति के लिये न मिल सकेगा। जब सम्प्रसारण परे होने पर कहीं पर भी
सम्प्रसारण न मिलेगा तब निषेध कैसा ? अतः इस निषेधकरणसामर्थ्य से यह सूचित
होता है कि जहां दो यण् हों वहां यदि सम्प्रसारण करना हो तो पहले अन्तिम यण् को
सम्प्रसारण करना चाहिये। इस नियमानुसार अन्तिम यण् को सम्प्रसारण हो चुकने
पर जब प्रथम यण् को सम्प्रसारण प्राप्त होता है तब इस सूत्र से निषेध हो जाता है।
'युवन्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० युवा युवानौ युवान प० यून युवभ्याम् युवभ्य
द्वि० युवानम् ” यून ष० ” यूनोः यूनाम्
तृ० यूना युवभ्याम् युवभि स० यूनि ” युवसु
च० यूने ” युवभ्य स० हे युवन्! हे युवानौ! हे युवान!
[लघु०] अर्वा। हे अर्वन् !॥
व्याख्या—ऋ गतौ(भ्वा० प०) इत्यस्माद्धातोर् अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (७६६)
इतिसूत्रेण वनिँप्प्रत्यये, गुणे, रपरत्वे 'अर्वन्' इतिशब्दः सिध्यति। 'अर्वन्' शब्द का अर्थ
'घोड़ा' है।
सुँ और सम्बुद्धि में 'अर्वा, हे अर्वन्' । राजन्शब्द के समान बनते हैं।
'अर्वन्+औ' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (२६२) अर्वणस्त्रसावनञः ।६।४।१२७॥
नञा रहितस्य 'अर्वन्' इत्यस्याङ्गस्य 'तृ' इत्यन्तादेशो न तु सौ।
अर्वन्तौ। अर्वन्तः। अर्वद्भ्याम् इत्यादि॥
अर्थः—'नञ्' से रहित 'अर्वन्' इस अङ्ग को 'तृ' यह अन्तादेश होता है परन्तु
सुं परे होने पर नहीं होता।
व्याख्या—अनञ् ।६।१। अर्वणः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)।
तृँ ।१।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। असौ ।७।१। समास —न विद्यते नञ्
यस्य स =अनञ्, तस्य =अनञः । नञ्बहुव्रीहिसमासः । न सु =असु, तस्मिन्=
असौ। नञ्तत्पुरुषः । अर्थ—(अनञ्) नञ् से रहित (अङ्गस्य) अङ्गसञ्ज्ञक (अर्वणः)
अर्वन् शब्द के स्थान पर (तृँ) 'तृ' यह आदेश हो जाता है परन्तु (असौ) सुँ परे
होने पर नहीं होता।
यह आदेश अलोऽन्त्यविधि से अन्त्य अल् = नकार के स्थान पर प्रवृत्त होता
है। यहां अनेकाल्परिभाषा से सर्वादेश नहीं हो सकता, क्योंकि 'तृँ' में अनुनासिक ऋकार
की इत्सञ्ज्ञा (२८) हो जाती है—नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम् ।
'अर्वन्+औ' यहां नकार को तृँ आदेश हो—अर्वतृ+औ। उगिदचां सर्व-
नामस्थानेऽधातो (२८६) से नुँम् का आगम हो—अर्वन्ँनुँम्तृ+औ = अर्वन्त्+औ ।
नश्चापदान्तस्य झलि (७८) सूत्र से नकार को अनुस्वार तथा अनुस्वारस्य ययि पर-
सवर्णः (७६) से परसवर्ण—नकार हो कर 'अर्वन्तौ' प्रयोग सिद्ध होता है।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६७
इसी प्रकार आगे समझ लेना चाहिये । ध्यान रहे कि केवल सर्वनामस्थानों में
ही नुँम् होता है । भ्याम् आदि में जश्त्व हो जाता है । रूपमाला यथा—
प्र० अर्वा॑न् अर्वन्तौ अर्वन्तः प० अर्वतः अर्वद्भ्याम् अर्वद्भ्यः
द्वि० अर्वन्तम् ,, अर्वतः ष० ,, अर्वतोः अर्वताम्
तृ० अर्वता अर्वद्भ्याम् अर्वद्भिः स० अर्वति ,, अर्वत्सु
च० अर्वते ,, अर्वद्भ्यः सं० हे अर्वन् !† अर्वन्तौ ! अर्वन्तः !
† यहां 'सुं' होने से 'तृ' आदेश नहीं होता ।
अर्वणस्त्रसावनञः (२६२) सूत्र में 'अनञः' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि—
न अर्वा = अनर्वा । नञ्तत्पुरुषः । 'अनर्वन्' शब्द को सुंभिन्न विभक्तियों में 'तृ' आदेश
न हो जावे । 'अनर्वन्' का उच्चारण 'यज्वन्' शब्द की तरह होता है ।
पथिन् (मार्ग) । मथिन् (मथनी) । ऋभुक्षिन् (इन्द्र) ।
पत्ऌ गतौ (भ्वा० प०) धातु से पतेस्थ च (उणा० ४५२) सूत्र द्वारा इनिँ
प्रत्यय तथा तकार को थकारादेश हो 'पथिन्' शब्द सिद्ध होता है । पतन्ति = गच्छन्ति
यत्र स पन्थाः ।
मन्थ विलोडने (स्वा० प०) धातु से मन्थः (उणा० ४५१) सूत्र द्वारा कित्
'इनिँ' प्रत्यय करने पर अनिदिताम्० (३३४) से उपधा के नकार का लोप करने से
'मथिन्' शब्द सिद्ध होता है । मन्थति = विलोडयति दध्यादिकम् इति मन्थाः ।
ऋभुक्षः = स्वर्गो वज्रो वा, सोऽस्यास्तीति ऋभुक्षाः । 'ऋभुक्ष' शब्द से मत्व-
र्थीय 'इनिँ' प्रत्यय (११८६) करने पर 'ऋभुक्षिन्' शब्द सिद्ध होता है ।
पथिन् + स् (सुँ) । मथिन् + स् (सुँ) । ऋभुक्षिन् + स् (सुँ) । इस अवस्था में
निम्नलिखित सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६३) पथिमथ्यृभुक्षामात् ।७।१।८५॥
एषामाकारोऽन्तादेशः सौ परे ॥
अर्थः—पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों को सुँ परे होने पर आकार
अन्तादेश हो ।
व्याख्या—पथिमथ्यृभुक्षाम् ।६।३। आत् ।१।१। सौ ।७।१। (सावनडुहः से) ।
समासः—पन्थाश्च मन्थाश्च ऋभुक्षाश्च = पथिमथ्यृभुक्षाणः, तेषाम् = पथिमथ्यृभुक्षाम्,
इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(पथिमथ्यृभुक्षाम्) पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों के
स्थान पर (सौ) सुँ परे रहते (आत्) आकार आदेश हो । अलोऽन्त्यविधि से यह
आकार आदेश अन्त्य अल्—नकार के स्थान पर होगा ।
तो इस सूत्र से आकार आदेश करने पर—पथि आ + स्, मथि आ + स्,
ऋभुक्षि आ + स् । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६४) इतोऽत् सर्वनामस्थाने ।७।१।८६॥
पथ्यादेरिकारस्य अकारः स्यात् सर्वनामस्थाने परे ॥
३६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थ—पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्द के इकार को सर्वनामस्थान परे
होने पर अकार हो जाता है।
व्याख्या—पथिमथ्यृभुक्षाम् ।६।३। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से)। इतः ।६।१। अत्
।१।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। अर्थ—(पथिमथ्यृभुक्षाम्) पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन्
शब्दों के (इतः) इकार के स्थान पर (अत्) अत् आदेश हो जाता है (सर्वनामस्थाने)
सर्वनामस्थान परे हो तो ।
इस सूत्र से इकार को अकार करने पर—'पथ् आ+स्, मथ् आ+स्, ऋभुक्ष्
आ+स्' हुआ । अब इन तीनों में से प्रथम दो में तो अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है परन्तु
तीसरे में सवर्णदीर्घ करने से—'ऋभुक्षास्' = 'ऋभुक्षाः' रूप सिद्ध होता है ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६५) थो न्थः ।७।१।८७॥
पथिमथोस् थस्य न्थादेश स्यात्, सर्वनामस्थाने परे । पन्थाः। पन्थानौ ।
पन्थानः ॥
अर्थ:—पथिन् तथा मथिन् शब्दों के थकार को न्थ् आदेश हो जाता है सर्व-
नामस्थान परे हो तो ।
व्याख्या—पथिमथोः ।६।२। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से, ऋभुक्षिन् में थकार न
होने से उस की अनुवृत्ति नहीं होती) । थः ।६।१। न्थः ।१।१। अत्र थकारोत्तरओकार
उच्चारणार्थः । सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । अर्थः—(पथिमथोः)
पथिन् और मथिन् शब्द के (थः) थ् के स्थान पर (न्थः) न्थ् आदेश हो जाता है
(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे हो तो ।
तो इस सूत्र से न्थ् आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से 'पन्थ् आ स् = पन्थाः,
मन्थ् आ स् = मन्थाः' रूप सिद्ध होते हैं।
पथिन्+औ, मथिन्+औ, ऋभुक्षिन्+औ—इन में सुँ परे न होने से पथि-
मथ्यृभुक्षामात् (२६३) सूत्र से नकार को आकार आदेश नहीं होता । इतोऽत्सर्वनाम-
स्थाने (२६४) सूत्र से इकार को अकार हो कर प्रथम दो रूपों में थो न्थः (२६५)
सूत्र से थकार को न्थ् कर के सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) सूत्र द्वारा तीनों रूपों
में नान्त को उपधा को दीर्घ हो जाता है—पन्थानौ, मन्थानौ, ऋभुक्षाणौ ।
पथिन्+अस् (शस्), मथिन्+अस् (शस्), ऋभुक्षिन्+अस् (शस्)—यहाँ
सर्वनामस्थान परे न होने से इतोऽत्सर्वनामस्थाने (२६४) तथा सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ
(१७७) प्रवृत्त नहीं होते । अब इन में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६६) भस्य टेर्लोपः ।७।१।८८॥
भसंज्ञकस्य पथ्यादेष्टेर्लोपः स्यात् । पथः । पथा । पथिभ्याम् । एवम्
—मथिन्, ऋभुक्षिन् ॥
अर्थ—भसंज्ञक पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों की टि का लोप हो ।
व्याख्या—भस्य ।६।१। (यहां वचनविपरिणाम कर के 'भानाम्' कर देना
चाहिये) । पथिमथ्यृभुक्षाम् ।६।३। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से) । टेः ।६।१। लोपः ।१।१।
हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६६
अर्थः— (भस्य = भानाम्) भसञ्ज्ञक (पथिन्मथ्यृभुक्षाम्) पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन्
शब्दों की (टेः) टि का (लोपः) लोप हो जाता है।
इस सूत्र से टि (इन्) का लोप हो कर— पथ् + अस् = पथः, मथ् + अस् ==
मथः, ऋभुक्ष् + अस् = ऋभुक्षः—रूप सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार आगे भी भसञ्ज्ञकों
में जान लेना चाहिये। अन्यत्र—पदसञ्ज्ञकों में न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०)
सूत्र से नकार का लोप हो जाता है। रूपमाला यथा—
पथिन् (मार्ग) | मथिन् (मथनी)
प्र० पन्थाः पन्थानौ पन्थानः | प्र० मन्थाः मन्थानौ मन्थानः
द्वि० पन्थानम् ,, पथः | द्वि० मन्थानम् ,, मथः
तृ० पथा पथिभ्याम् पथिभिः | तृ० मथा मथिभ्याम् मथिभिः
च० पथे ,, पथिभ्यः | च० मथे ,, मथिभ्यः
प० पथः ,, ,, | प० मथः ,, ,,
ष० ,, पथोः पथाम् | ष० ,, मथोः मथाम्
स० पथि ,, पथिषु | स० मथि ,, मथिषु
सं० हे पन्थाः! हे पन्थानौ! हे पन्थानः! | सं० हे मन्थाः! हे मन्थानौ! हे मन्थानः!
ऋभुक्षिन् (इन्द्र)
प्र० ऋभुक्षाः ऋभुक्षाणौ ऋभुक्षाणः | प० ऋभुक्षः ऋभुक्षिभ्याम् ऋभुक्षिभ्यः
द्वि० ऋभुक्षाणम् ,, ऋभुक्षः | ष० ,, ऋभुक्षोः ऋभुक्षाम्
तृ० ऋभुक्षा ऋभुक्षिभ्याम् ऋभुक्षिभिः | स० ऋभुक्षि ,, ऋभुक्षिषु
च० ऋभुक्षे ,, ऋभुक्षिभ्यः | सं० हे ऋभुक्षाः! ऋभुक्षाणौ! ऋभुक्षाणः!
इस में णत्व अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि (१३८) सूत्र से होता है।
पञ्चन् (पांच)। 'पञ्चन्' शब्द सिद्धान्तकौमुदीपठित उणादिसूत्रों में सिद्ध
नहीं किया गया। उणादिसूत्रों के वृत्तिकार उज्ज्वलदत्त कनिँन् युवृषि० (उणा० १५४)
सूत्र पर बहुल द्वारा पचिँ (भ्वा० प०, चुरा० उभ०) धातु से कनिँन् प्रत्यय कर के
इसे सिद्ध करते हैं। प्रक्रियासर्वस्वकार नारायणभट्ट उणादिसूत्रों में पञ्चेश्च सूत्र पढ़
कर इस की सिद्धि करते हैं। सरस्वतीकण्ठाभरणकार भोजदेव—द्वि-यु-वृषि-तक्षि-
राजि-ध्वनि-पचि-द्यु-प्रतिदिवश्यः कनिँन् इस प्रकार सूत्र बना कर इस की सिद्धि
करते हैं। श्रीदुर्गसिंह अपनी वृत्ति में पचिँ विस्तारे (चुरा० उ०) धातु से पञ्चेरनिः
सूत्र द्वारा 'अनि' प्रत्यय ला कर इस की निष्पत्ति मानते हैं। 'पञ्चन्' शब्द तीनों
लिङ्गों में एक समान रहने वाला तथा नित्यबहुवचनान्त है। अतः इस से 'जस्' आदि
बहुवचन प्रत्यय ही होते हैं।
'पञ्चन् + जस्' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—