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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

३८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२७४)' नियम से उपधादीर्घ के निषिद्ध होने पर 'सौ च
(२८५)' से दीर्घ हो सकार और नकार का लोप हो जाता है।
‡ 'शार्ङ्गिणौ' आदियों में अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व हो जाता है। 'हे
शार्ङ्गिन् !' में पदान्तस्य (१३६) सूत्र द्वारा णत्वनिषेध होता है।
† 'शार्ङ्गिषु' में सुब्विधि न होने से नकार का लोप असिद्ध नहीं होता, अतः
णत्व करने में बाधा नहीं होती।
इस प्रकार के इन्अन्त शब्द संस्कृतसाहित्य में बहुत हैं। कुछ का बालोपयोगि-
सङ्ग्रह नीचे दिया जा रहा है। यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का परिचायक है।
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
अनृच्छिन् = ऋणरहित | कृतिन् = पण्डित | नयशालिन् = नीतिज्ञ
अनृणिन् = " | केसरिन्
= शेर | निवासिन् = रहने वाला
अक्षदेविन् = जुआरी | क्रोधिन् = क्रोधी | पक्षिन्
= परिन्दा
अज्ञानिन् = अज्ञानी | क्षणविध्वंसिन् = क्षणिक | परदेशिन् = विदेशी
अतिशायिन् = बढ़ा हुआ | खड्गिन् = गैण्डा | परमेष्ठिन् = ब्रह्मा
अधिकारिन्* = अधिकारी | गुणिन् = गुणयुक्त | परिपन्थिन् = शत्रु
अधीतिन्¹ = विद्वान् | गृहमेधिन् = गृहस्थी | पादचारिन्* = पैदल
अनुजीविन् = सेवक | गृहिन्* = " | पाशिन् = यमराज
अनुयायिन् = अनुयायी | गृहीतिन् = समझा हुआ | पिनाकिन् = शिव
अन्तेवासिन् = शिष्य | घोणिन् = सूअर | पुष्करिन्* = हाथी
आगामिन् = आने वाला | चक्रवर्तिन् = सार्वभौम | प्रकम्पिन् = कापने वाला
आततायिन् = दुष्ट | चक्रिन्* = चक्रधारी | प्रणयिन् = प्रेमी
उपजीविन् = सेवक | जन्मिन् = प्राणी | प्रतिवेशिन् = पड़ौसी
उपयोगिन् = उपयोगी | जम्भभेदिन् = इन्द्र | प्रत्यर्थिन् = शत्रु
ऊर्मिमालिन् = समुद्र | ज्ञानिन् = ज्ञानी | प्रवासिन् = परदेश गया
एकाकिन् = अकेला | तपस्विन् = तपस्वी | प्राणिन् = प्राणी
कञ्चुकिन् = कञ्चुकी | त्यागिन् = त्यागी | फणिन् = फणधर सांप
कपटिन् = कपटी | दंष्ट्रिन्* = सूअर | फलिन् = फल वाला पेड़
कपालिन् = महादेव | दण्डिन् = दण्डधारी | बलशालिन् = बलवान्
करटिन् = हाथी | दन्तिन् = हाथी | बलिविध्वंसिन् = विष्णु
करिन्* = हाथी | दीर्घदर्शिन् = दूरदर्शी | बलिन् = बलवान्
कलापिन् = मोर | देहिन् = जीवात्मा | बुद्धिशालिन् = बुद्धि मान्
कामिन् = कामी | द्वारिन्* = द्वारपाल | ब्रह्मचारिन्* = ब्रह्मचारी
किरणमालिन् = सूर्य | दीपिन् = बाघ | ब्रह्मवादिन् = ब्रह्मवादी
कुण्डलिन् = सांप | धनिन् = धनवान् | भागिन् = हिस्सेदार
१ इस के योग में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है—व्याकरणेऽधीती।