लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थ—पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्द के इकार को सर्वनामस्थान परे
होने पर अकार हो जाता है।
व्याख्या—पथिमथ्यृभुक्षाम् ।६।३। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से)। इतः ।६।१। अत्
।१।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। अर्थ—(पथिमथ्यृभुक्षाम्) पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन्
शब्दों के (इतः) इकार के स्थान पर (अत्) अत् आदेश हो जाता है (सर्वनामस्थाने)
सर्वनामस्थान परे हो तो ।
इस सूत्र से इकार को अकार करने पर—'पथ् आ+स्, मथ् आ+स्, ऋभुक्ष्
आ+स्' हुआ । अब इन तीनों में से प्रथम दो में तो अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है परन्तु
तीसरे में सवर्णदीर्घ करने से—'ऋभुक्षास्' = 'ऋभुक्षाः' रूप सिद्ध होता है ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६५) थो न्थः ।७।१।८७॥
पथिमथोस् थस्य न्थादेश स्यात्, सर्वनामस्थाने परे । पन्थाः। पन्थानौ ।
पन्थानः ॥
अर्थ:—पथिन् तथा मथिन् शब्दों के थकार को न्थ् आदेश हो जाता है सर्व-
नामस्थान परे हो तो ।
व्याख्या—पथिमथोः ।६।२। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से, ऋभुक्षिन् में थकार न
होने से उस की अनुवृत्ति नहीं होती) । थः ।६।१। न्थः ।१।१। अत्र थकारोत्तरओकार
उच्चारणार्थः । सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । अर्थः—(पथिमथोः)
पथिन् और मथिन् शब्द के (थः) थ् के स्थान पर (न्थः) न्थ् आदेश हो जाता है
(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे हो तो ।
तो इस सूत्र से न्थ् आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से 'पन्थ् आ स् = पन्थाः,
मन्थ् आ स् = मन्थाः' रूप सिद्ध होते हैं।
पथिन्+औ, मथिन्+औ, ऋभुक्षिन्+औ—इन में सुँ परे न होने से पथि-
मथ्यृभुक्षामात् (२६३) सूत्र से नकार को आकार आदेश नहीं होता । इतोऽत्सर्वनाम-
स्थाने (२६४) सूत्र से इकार को अकार हो कर प्रथम दो रूपों में थो न्थः (२६५)
सूत्र से थकार को न्थ् कर के सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) सूत्र द्वारा तीनों रूपों
में नान्त को उपधा को दीर्घ हो जाता है—पन्थानौ, मन्थानौ, ऋभुक्षाणौ ।
पथिन्+अस् (शस्), मथिन्+अस् (शस्), ऋभुक्षिन्+अस् (शस्)—यहाँ
सर्वनामस्थान परे न होने से इतोऽत्सर्वनामस्थाने (२६४) तथा सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ
(१७७) प्रवृत्त नहीं होते । अब इन में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६६) भस्य टेर्लोपः ।७।१।८८॥
भसंज्ञकस्य पथ्यादेष्टेर्लोपः स्यात् । पथः । पथा । पथिभ्याम् । एवम्
—मथिन्, ऋभुक्षिन् ॥
अर्थ—भसंज्ञक पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों की टि का लोप हो ।
व्याख्या—भस्य ।६।१। (यहां वचनविपरिणाम कर के 'भानाम्' कर देना
चाहिये) । पथिमथ्यृभुक्षाम् ।६।३। (पथिमथ्यृभुक्षामात् से) । टेः ।६।१। लोपः ।१।१।