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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

३६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

अर्थ—सुँ परे होने पर 'दिव्' इस प्रातिपदिक को औकार आदेश हो जाता है।
व्याख्या—दिव् ।६।१। औत् ।१।१। सौ ।७।१। (सावनडुहः से) । संस्कृत में
दो 'दिव्' शब्द हैं। एक अव्युत्पन्न प्रातिपदिक और दूसरा 'दिवुँ क्रीडा-विजिगीषा०'
(दिवा० प०) यह धातु। इस सूत्र में 'दिव्' इस अव्युत्पन्न प्रातिपदिक का ही ग्रहण
होता है दिवुँ धातु का नहीं। इस में कारण यह है कि—निरनुबन्धकग्रहणे न सानु-
बन्धकस्य (परिभाषा) अर्थात् यदि निरनुबन्ध (अनुबन्धहीन) का ग्रहण सूत्र में हो
तो सानुबन्ध (अनुबन्धसहित) का ग्रहण नहीं करना चाहिये। यहां सूत्र में 'दिव्'
में उकारानुबन्धसहित 'दिव्' का ग्रहण किया है, अतः 'दिव्' इस प्रातिपदिक निरनु-
बन्ध का ही ग्रहण होगा, सानुबन्ध 'दिवुँ' का नहीं। 'औत्' में तकार उच्चारणार्थ है,
आदेश 'औ' ही होता है। यदि तकार भी साथ आदेश होता तो अनेकाल् होने से
सर्वादेश हो जाता। अर्थ—(दिव्) दिव् इस प्रातिपदिक के स्थान पर (औत्) 'औ'
आदेश हो (सौ) सुँ परे होने पर। यह सूत्र अङ्गाधिकार में पढ़ा गया है अतः दिव्
और दिव्शब्दान्त दोनों को औकार आदेश होगा। ध्यान रहे कि अलोऽन्त्यपरिभाषा
से दिव् के वकार को ही औकार आदेश होगा।
'सुदिव् + सुँ' यहां 'सुँ' परे है अतः प्रकृत-सूत्र से वकार को औकार करने पर
इको यणचि (१५) से इकार को यकार हो कर रुत्व विसर्ग करने से 'सुद्यौः' प्रयोग
सिद्ध होता है¹।
सुदिव् + औ = सुदिवौ। सुदिव् + अस् (जस्) = सुदिवः। सुदिवम्। सुदिवौ।
सुदिव् + अस् (शस्) = सुदिवः। 'सुदिव् + भ्याम्' में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि सूत्रम्—(२६५) दिव उत् ।६।१।१२७॥
दिवोऽन्तादेश उकारः स्यात्पदान्ते। सुद्युभ्याम्। इत्यादि॥
अर्थ—पद के अन्त में दिव् को उकार अन्तादेश हो।
व्याख्या—दिवः ।६।१। उत् ।१।१। पदान्ते ।७।१। (एङ् पदान्तादति से वि-
भक्तिविपरिणाम द्वारा)। अर्थ—(पदान्ते) पदान्त में (दिव्) दिव् शब्द के स्थान पर
(उत्) ह्रस्व उकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से दिव् के अन्त्य अल् वकार को


१ 'सुदिव् + सुँ' में औकारादेश तथा सुँलोप युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु औकारा-
देश नित्य और सुँलोप अनित्य होने से प्रथम औकारादेश हो जाता है। जो विधि
दूसरे के प्रवृत्त होने या न होने पर भी समानरूप से प्रवृत्त हो वह दूसरे की
अपेक्षा नित्य होती है। जैसा कि कहा है—कृताकृतप्रसङ्गी यो विधिः स नित्यः
(परि०)। यहां सुँलोप कर देने पर भी प्रत्ययलक्षण द्वारा सुँ को मान कर
औकारादेश हो सकता है अतः औकारादेश नित्य है। परन्तु औकारादेश कर देने
पर हल् न होने से सुँलोप नहीं हो सकता अतः सुँलोप अनित्य है। नित्य और
अनित्य में नित्य ही बलवान् होता है।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६५
ही उकार आदेश होगा। ध्यान रहे कि यहां भी पूर्ववत् दिव् प्रातिपदिक का ही ग्रहण
किया जाता है।
'सुदिव् + भ्याम्' में स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदत्व के कारण
वकार को उकारादेश तथा इको यणचि (१५) से यण् हो—'सुद्युभ्याम्'। इसी प्रकार
भिस्, भ्यस् और सुप् में भी होता है। रूपमाला यथा—
प्र० सुद्यौः सुदिवौ मुदिवः | प० सुदिवः सुद्युभ्याम् सुद्युभ्यः
द्वि० सुदिवम् " " | ष० , सुदिवोः सुदिवाम्
तृ० मुदिवा सुद्युभ्याम् मुद्युभिः | स० मुदिवि " सुद्युषु
च० सुदिवे " सुद्युभ्यः | सं० हे सुद्यौः ! हे सुदिवौ ! हे सुदिवः !
इसी प्रकार प्रियदिव्, अतिदिव् आदि शब्दों के रूप होते हैं।
(यहां वकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
———:: o ::———
अभ्यास (३८)
(१) अनडुह् और विश्ववाह् शब्दों के जस् और शस् में रूप सिद्ध करें।
(२) अनड्वान् और अनड्वन् में, सुदिवोः और सुद्योः में, लिट् और स्निट्
में, मुद्युभ्याम् और धुग्भ्याम् में प्रक्रियासम्बन्धी अन्तर ससूत्र दर्शाएं।
(३) 'सूत्रशाटकन्याय' किसे कहते हैं ? व्याकरण में इस का कहां और कैसे
उपयोग होता है ?
(४) निम्नलिखित वचनों का जहां तक हो सके सोदाहरण विवेचन करें—
१. निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः। २. प्रकल्प्य चापवादविषयं ततः०
३. निरनुबन्धकग्रहणे न० । ४. अपवादो वचनप्रामाण्यात् । ५. इतरे-
तराश्रयाणि कार्याणि न० । ६. कृताकृतप्रसङ्गी यो विधिः स नित्यः ।
७. क्विब्वन्ता विडन्ता विंजन्ता शब्दों धातुत्वं न जहति ।
(५) तुराषाट्, सुद्युभ्याम्, ध्रुक्षु, विश्वौहि, उखास्रद्भ्याम्, स्निक्—इन रूपों
की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें।
(६) (क) चतुरनडुहोः० और सावनडुहः सूत्रों में क्या उत्सर्ग-अपवादभाव है ?
(ख) 'लिट्सु' में तकार को थकार क्यों नही होता ?
(ग) 'सुद्यौः' में औकारादेश करने से पूर्व सुँलोप क्यों नही हो जाता ?
(घ) दिव औत् में 'दिवुँ' धातु का ग्रहण क्यों नहीं रेफ को ही विसर्ग
(ङ) 'मूर्धन्यः' शब्द का क्या विग्रह और क्या अ
(७) १. एकाचो वशो भष्० । २. दादेर्धातोर्घः । ३. इति प्रत्याहारस्येष्ट-
वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः । अभिषेति बोध्यम्।

३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] चत्वारः । चतुरः । चतुर्भिः । चतुर्भ्यः २ ॥
व्याख्या—अब रेफान्त पुंल्लिङ्ग 'चतुर्' (चार, सङ्ख्येयवाची) शब्द का
वर्णन करते हैं। चतेरुरन् (उणा० ७३६) सूत्र से चतुर् शब्द की निष्पत्ति होती है।
'चतुर्' शब्द नित्यबहुवचनान्त होता है।
'चतुर् + अस्' (जस्) यहां 'जस्' यह सर्वनामस्थान परे है, अतः चतुरनडुहो-
रामुदात्तः (२५६) सूत्र से आम् का आगम हो कर इको यणचि (१४) से यण् तथा
सकार को रुत्व-विसर्ग करने पर 'चत्वारः' प्रयोग सिद्ध होता है।
चतुर् + शस् (शस्) = चतुरः । सर्वनामस्थान न होने से आम् न होगा।
चतुर् + भिस् – चतुर्भिः । चतुर् + भ्यस् = चतुर्भ्यः ।
चतुर् + आम्। यहां ह्रस्वादि के न होने से ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) द्वारा नुट्
प्राप्त नहीं हो सकता, अतः इस की सिद्धि के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६६) षट्चतुर्भ्यश्च ।७।१।५५॥
एभ्य आमो नुडागमः ॥
अर्थ —षट्सञ्ज्ञको तथा चतुर् शब्द से परे आम् को नुट् का आगम हो।
व्याख्या —षट्चतुर्भ्यः ।५।३। च इत्यव्ययपदम्। आम् ।६।१। (आमि सर्व-
नाम्नः सुट् से । यहां उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् द्वारा षष्ठ्यन्ततया विपरि-
णाम हो जाता है)। नुट् ।१।१। (ह्रस्वनद्यापो नुट् से)। अर्थ —(षट्चतुर्भ्यः) षट्-
सञ्ज्ञकों से तथा चतुर् शब्द से परे (च) भी (आम् ) आम् का अवयव (नुट्) नुट्
हो जाता है। नुट् टित् है अतः आम् का आद्यवयव होगा।
इसी प्रकरण में आगे (२६७) सूत्र से षट्सञ्ज्ञा की जायेगी, यहां उसी का
ग्रहण है। चतुर् शब्द की षट्सञ्ज्ञा नहीं होती अतः इस का पृथक् ग्रहण किया है।
चतुर् + आम् । यहां प्रकृत-सूत्र से नुट् का आगम हो कर 'चतुर् + नाम्'
हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि सूत्रम्—(२६७) रषाभ्यां नो णः समानपदे ।८।४।१॥
(एकपदस्थाभ्यां रेफषकाराभ्यां परस्य नस्य णः स्यात्) । अचो रहा-
भ्यां द्वे (६०) – चतुर्ण्णाम्, चतुर्णाम् ॥
अर्थ —एक पद में स्थित रेफ वा षकार से परे नकार को णकार आदेश हो।
व्याख्या—रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। णः ।१।१। समानपदे ।७।१। समान-
ञ्चात् पदम् = समानं पदम् । कर्मधारयसमास । रश्च षश्च = रषौ, ताभ्याम् = रषा-
भ्याम् । अपेक्षा नित्य होता रेफादकारः षकाराच्चाकारश्चोच्चारणार्थः । 'ण' इत्यत्राप्य-
(परि०) । यहां कार उच्चारणार्थः । रेफ वा धेय । अर्थ—(समानपदे) एक पद में (रषाभ्याम्) रेफ वा
षकारादेश हो सन् स्थान पर (ण ) ण् आदेश हो । [र् + न = र्ण, ष् + न = ष्ण]
पर हल् न होने से पूर्वोक्त नहीं हो सकता का ही ग्रहण होता है। अतः 'अग्नि-
अनित्य से नित्य ही बलवान् होता है। [arrow] न' में णकारादेश न होगा।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६७

इस सूत्र के उदाहरण—आस्तीर्णम्, अवगीर्णम्, कृष्णाति, पुष्णाति आदि हैं ।
अप्तृन्---प्रशास्तॄणाम् (२०६) आदि प्रयोगों¹ तथा क्षुम्नादिगण (८.४.३६)
में 'नृनमन, तृन्' को णत्व-निषेध करने से यहां रेफ और षकार की तरह ऋवर्ण को
भी णत्व का निमित्त मानना चाहिये । इस के उदाहरण—'मातॄणाम्, पितॄणाम्' आदि
हैं । ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) इसी का अनुवाद है ।
'चतुर् + नाम्' यहां प्रकृतसूत्र से नकार को णकारादेश हो कर 'चतुर्णाम्'
हुआ । अब अचो रहाभ्यां द्वे (६०) सूत्र से णकार को वैकल्पिक द्वित्व करने मे—
'चतुर्ण्णाम्, चतुर्णाम्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
नोट—यहां णत्व करते समय प्रायः सुबोध विद्यार्थियों को सन्देह हुआ करता
है कि 'चतुर्णाम्' में तो अट्कुप्वाङ्० (१३८) से ही णत्व हो सकता है, क्योंकि वहां
'व्यवाधानेऽपि णत्वं स्यात्' कहा है । अर्थात् व्यवधान होने पर भी णत्व हो जाता है ।
इस से यह विदित होता है कि यदि व्यवधान न होगा तब तो अवश्य ही हो जायेगा ।
'पुष्णाति, मुष्णाति' आदियों में ष्टुत्व से भी णत्व सिद्ध हो सकता है । अतः यह सूत्र
निरर्थक है ।
परन्तु तनिक ध्यान देने पर इस की उपयोगिता स्पष्ट समझ में आ जाती है ।
अष्टाध्यायी में प्रथम यह सूत्र और तदनन्तर अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र पढ़ा गया है ।
अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र में पूर्णरूपेण यह सूत्र अनुवर्त्तित होता है। यदि यह सूत्र न
बनाते तो उस में अनुवृत्ति कहां से आती ? 'पुष्णाति, मुष्णाति' आदियों में यद्यपि
ष्टुत्व से सिद्धि हो सकती है; तथापि अट् आदि के व्यवधान में णत्वसिद्धि के लिये
उस का ग्रहण अवश्य प्रयोजनीय है । अन्यथा 'पुरुषेण, पुरुषाणाम्' आदि सिद्ध न हो
सकेंगे ।
सप्तमी के बहुवचन 'चतुर् + सु' में खर् परे होने से खरवसानयोः० (६३)
द्वारा रेफ को विसर्ग आदेश प्राप्त है । इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] नियम-सूत्रम्—(२६८) रोः सुपि ।८।३।१६॥
रोरेव विसर्गः सुपि । षत्वम् । षस्य द्वित्वे प्राप्ते—
अर्थः—सप्तमी के बहुवचन 'सुप्' के परे होने पर रुँ के स्थान पर ही विसर्ग
आदेश हो (अन्य रेफ के स्थान पर न हो) ।
व्याख्या—रोः ।६।१। सुपि ।७।१। विसर्जनीयः ।१।१। (खरवसानयोर्विसर्जनीयः
से) । अर्थः—(सुपि) सप्तमी का बहुवचन 'सुप्' प्रत्यय परे होने पर (रोः) रुँ के
स्थान पर (विसर्जनीयः) विसर्जनीय आदेश हो । सुप् परे होने पर रुँ (र्) के स्थान
पर विसर्गादेश खरवसानयोः० (६३) सूत्र से ही सिद्ध है, पुनः इस का आरम्भ नियमार्थ
ही है—सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः । अर्थात् सुप् परे होने पर रुँ के रेफ को ही विसर्ग
आदेश हो अन्य रेफ को न हो ।
१. न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् (२.३.६९) इत्यादिषु तु तृन् इति प्रत्याहारस्येष्ट-
त्वाद् णत्वाभावो जिघृक्षितरूपविनाशभियेति बोध्यम् ।

३६८ भामीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'चतुर्+सु' यहां 'रु' का रेफ नहीं अतः विसर्ग आदेश न हुआ । आदेश-
प्रत्यययो (१५०) द्वारा सकार को षकार कर—'चतुर्षु' । अब यहां अचो रहाभ्यां द्वे
(६०) द्वारा षकार को वैकल्पिक द्वित्व प्राप्त होने पर निषेध करते हैं—
[लघु०] निषेध-सूत्रम् -- (२६६) शरोऽचि ॥८।४।४६॥
अचि परे शरो न द्वे स्त । चतुर्षु ॥
अर्थ - अच् परे हो तो शर् को द्वित्व नहीं होता ।
व्याख्या - अचि ।७।१। शर् ।६।१। न इत्यव्ययपदम् । (नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य
मे) । द्वे ।१।२। (अचो रहाभ्यां द्वे स) । अर्थ - (अचि) अच् परे होने पर (शर् )
शर् के स्थान पर (द्वे) दो शब्दस्वरूप (न) न हों ।
'चतुर्षु' यहां उकार अच् परे है अतः षकार शर् को द्वित्व नहीं होता ।
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—
१ दर्शनम् । २ स्पर्शनम् । ३ आर्षम् । ४ वर्षणम् । ५ चिकीर्षा । ६
जिहीर्षा । ७ मुमूर्षा । ८ पर्शु । ९ अर्श । १० घर्षणम् । ११ वर्षक । १२
वर्षुक । १३ कार्षापणम् । १४ वर्षा । १५ हर्ष । इत्यादि ।१
निम्नलिखित स्थलों में अच् परे न होने से निषेध नहीं होता । अनचि च (१८)
अथवा अचो रहाभ्यां द्वे (६०) से द्वित्व हो जाता है—
१ ष्प्फन । २ वाष्प्पिन । ३ दश्य॑न्ते । ४ भीष्ष्म । ५ यष्टि । ६
अररव । ७ अररमरी । ८ अरदनानि । ६ दमशू । १० अशिश्रवी । ११ अप्टो ।
१२ विश्रान्त । १३. ईप्स्यति । १४ अस्स्यम् । १५ नास्स्ति । इत्यादि ।
अच् परे होने पर भी शर् से अतिरिक्त वर्ण (यर्) को द्वित्व हो ही जायेगा—
१ अर्कै । २ अर्थ्य । ३ निर्झर ४ दुर्ग । ५ द्ववर्ग । ६ मूवर्ख ।
७ निर्भर । ८ मूर्च्छना । ६ ऊर्म्मि । १० विमार्ग । ११ अर्जुन । १२ उर्वी ।
१३ आर्य्य । १४ अर्घ्यं । १५ ऊर्द्धवम् । इत्यादि ।
'चतुर' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० ० ० चत्वार | प० ० ० चतुर्भ्य
द्वि० ० ० चतुर | ष० ० ० चतुर्णाम्, चतॄणाम्
तृ० ० ० चतुर्भिः | स० ० ० चतुर्षु
च० ० ० चतुर्भ्य संख्यावाचकों का सम्बोधन नहीं होता ।
इसी प्रकार 'परमचतुर्' आदि शब्दों के रूप होते हैं ।
(यहां रेफान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
अब मकारान्त पुल्लिंग शब्दा का वर्णन किया जाता है ।
१ इस सूत्र का निषेध शकार और षकार तक ही सीमित रहता है । सकार के द्वित्व
का प्रसङ्ग कहीं नहीं प्राप्त होता [विशेष स्वयं विचार करें] ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६६
प्रपूर्वक शमुँ उपशमे (दिवा० प०) धातु से क्विँप्, अनुनासिकस्य क्विझलोः०
(७२७) से उपधा-दीर्घ करने कर 'प्रशाम्' (शान्त) शब्द निष्पन्न होता है ।
प्रशाम् + स् (सुँ) । यहां सकारलोप हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७०) मो नो धातोः ॥८।२।६४॥
धातोर्मस्य नः पदान्ते । प्रशान् । प्रशान्भ्याम् इत्यादि ॥
अर्थः—पदान्त में धातु के मकार को नकार आदेश हो ।
व्याख्या—धातोः ।६।१। मः ।६।१। नः ।१।१। पदस्य ।६।१। (यह अविकृत
है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । अर्थः—(पदस्य) पद के (अन्ते)
अन्त में (धातोः) धातु के (मः) मकार के स्थान पर (नः) न् आदेश होता है¹ ।
'प्रशाम्' यहां एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार 'शम्' धातु का मकार है
अतः प्रकृत-सूत्र से इसे नकार आदेश हो कर—'प्रशान्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान
रहे कि यह नकारादेश (८.२.६४) न लोपः० (८.२.७) की दृष्टि में असिद्ध है अतः
उसे यहां मकार ही दिखाई देता है इस से नकार का लोप नहीं होता ।
'प्रशाम्' (शान्त) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० प्रशान् प्रशामौ प्रशामः | प० प्रशामः प्रशान्भ्याम् प्रशान्भ्यः
द्वि० प्रशामम् ,, ,, | ष० ,, प्रशामोः प्रशामाम्
तृ० प्रशामा प्रशान्भ्याम् प्रशान्भिः | स० प्रशामि ,, प्रशान्त्सु, -न्सु†
च० प्रशामे ,, प्रशान्भ्यः | सं० हे प्रशान्! हे प्रशामौ! हे प्रशामः!
† यहां मो नो धातोः सूत्र द्वारा नकार आदेश हो कर नश्च (८७) सूत्र से
वैकल्पिक धुट् का आगम हो जाता है । धुट्पक्ष में खरि च (७४) से चर्व्व हो कर
'प्रशान्त्सु' और धुट् के अभाव में 'प्रशान्सु' बन जाता है ।
इसी प्रकार—प्रदाम्, प्रताम्, प्रकामृ प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं ।
किम् [कौन । कायतेर्डिमः (५६७) इत्युणादिसूत्रेण साधुः] ।
'किम्' शब्द सर्वादिगणपठित है, अतः सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) सूत्र से
इस की सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । यह शब्द त्रिलिङ्गी है यहां पुंल्लिङ्ग का प्रकरण
होने से पुंल्लिङ्ग में रूप दिखाए जायेंगे ।
'किम् + स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्योः० (१७६) से सकार का लोप प्राप्त होने
पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७१) किमः कः ॥७।२।१०३॥
किमः कः स्याद्विभक्तौ । कः । कौ । के । इत्यादि । शेषं सर्ववत् ॥
१. 'मः' इति 'धातोः' इत्यस्य विशेषणत्वे तदन्तविधिना 'मकारान्तस्य धातोर्नकारा-
देशः स्यात्पदान्ते' इत्यर्थो निष्पद्यते । तदाऽलोऽन्त्यविधिनेऽन्त्यमकारस्य नकारा-
देश उन्नेतव्यः ।
ल० प्र० (२४)

३७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थः—विभक्ति परे होने पर किम् के स्थान पर 'क' आदेश हो ।
व्याख्या—किम ।६।१। क ।१।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) ।
अर्थ —(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (किम ) 'किम्' शब्द के स्थान पर (क )
'क' आदेश हो । 'क' आदेश सस्वर होने से अनेकाल् है अत अनेकाल्परिभाषा (४५)
से सम्पूर्ण 'किम्' के स्थान पर होगा ।
इस से सर्वत्र स्वादियो में किम् को 'क' आदेश हो सर्वशब्दवत् प्रक्रिया होती
है । ध्यान रहे कि 'क' आदेश स्थानिवद्भाव से सर्वनामसञ्ज्ञक है । रूपमाला यथा—
प्र० क कौ के† प० कस्मात्* काभ्याम् केभ्य
द्वि० कम् ,, कान् ष० कस्य कयो केषाम् ×
तृ० केन काभ्याम् कैः स० कस्मिन्* ,, केषु
च० कस्मै† ,, केभ्य सम्बोधन नही होता ।
† जस शी (१५२) । † सर्वनाम्न स्मै (१५३) । *ङसिंङ्यो स्मात्स्मिनौ
(१५४) । ×आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) ।
इदम् = यह (निकटतम)¹ । इन्देः कमिर्नलोपश्च (उणा० ५६६) इति
सिद्ध्यति । 'इदम्' शब्द भी सर्वादिगण में पठित होने से सर्वनामसञ्ज्ञक है । यह त्रिलिङ्गी
है । यहा पुल्लिङ्ग का प्रकरण होने से पुल्लिङ्ग में रूप दर्शाए जाते हैं—
इदम् + सु (सुँ) । यहा त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से 'इदम्' के मकार को
अकार प्राप्त होता है । इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७२) इदमो मः ।७।२।१०८॥
इदमो मस्य म स्यात्सी परे । त्यदाद्यत्वापवाद ॥
अर्थः—सुँ परे होने पर इदम् शब्द के मकार को मकार आदेश हो । त्यदाद्य-
त्वापवाद —यह सूत्र त्यदादियो के स्थान पर होने वाले अत्व का अपवाद है ।
व्याख्या—इदम ।६।१। म ।१।१। (मकारादकार उच्चारणार्थ ) । सौ ।७।१।
(तदोः स सावनन्त्ययो से) । अर्थ —(इदम ) इदम् शब्द के स्थान पर (मः) म्
आदेश हो (सौ) सुँ परे होने पर । यह मकारादेश अलोऽन्त्यपरिभाषा से इदम् शब्द
के अन्त्य अल् = मकार के स्थान पर ही होता है । मकार को पुनः मकार आदेश
करने का तात्पर्य त्यदादीनाम (१६३) सूत्र द्वारा प्राप्त अकारादेश का निषेध करना
है, अर्थात् इदम् का मकार मकाररूपेण ही स्थित रहता है, सुं परे होने पर उसके
स्थान पर अन्य कुछ आदेश नही होता ।
१ इदमस्तु सन्निकृष्टे, समीपतरवत्ति चैतदो रूपम् ।
अदसस्तु विप्रकृष्टे, तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥
इदम् शब्द का प्रयोग निकटतम—जिसे अङ्गुली से बताया जा सके—के लिए
एतद् का निकटतर के लिये, अदस् का दूरस्थ के लिये और तद् का परोक्ष—जो
दिखाई न दे—के लिये होता है ।

५. तिङन्त प्रकरण (दश लकार, भ्वादि-प्रभृति दश गण रूप-साधन)

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७१
इस सूत्र से 'इदम् + स्' यहां अत्व नहीं होता । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता
है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् — (२७३) इदोऽय् पुंसि ।७।२।१११॥
इदम इदोऽय् स्यात्सौ पुंसि । सोर्लोपः । अयम् । त्यदाद्यत्वे—
अर्थः — सुं परे हो तो पुंल्लिङ्ग में 'इदम्' के 'इद्' को 'अय्' आदेश हो ।
व्याख्या—इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। अय् ।१।१। पुंसि ।७।१।
सौ ।७।१। (यः सौ से) । अर्थः—(सौ) सुं परे होने पर (पुंसि) पुंल्लिङ्ग में (इदमः)
इदम् शब्द के अवयव (इदः) इद् के स्थान पर (अय्) अय् आदेश हो । अनेकाल्परि-
भाषा द्वारा अय् आदेश सम्पूर्ण इद् के स्थान पर होगा । ग्रहणसामर्थ्य से यकार का
लोप न होगा, किञ्च प्रयोजनाभाव से इत्सञ्ज्ञा भी न होगी¹ ।
'इदम् + स्' यहां पुंल्लिङ्ग में प्रकृतसूत्र से इद् को अय् आदेश हो कर 'अय्
अम् + स्' हुआ । अब हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप करने पर 'अयम्'
प्रयोग सिद्ध होता है ।
'इदम् + औ' यहां सुं परे नहीं है अतः इदमो मः (२७२) प्रवृत्त न होगा,
त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से मकार को अकार आदेश हो कर 'इद अ + औ' हुआ ।
अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७४) अतो गुणे ।६।१।९७॥
अपदान्तादतो गुणे पररूपमेकादेशः ॥
अर्थः—अपदान्त अत् से गुण परे हो तो पूर्वपर के स्थान पर पररूप एकादेश हो।
व्याख्या—अपदान्तात् ।५।१। (उस्यपदान्तात् से) । अतः ।५।१। गुणे ।७।१।
पूर्वपरयोः ।६।२। एकम् ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । पररूपम् ।१।१।
(एङि पररूपम् मे) । अर्थः—(अपदान्तात्) अपदान्त (अतः) अत् से परे (गुणे)
गुणसञ्ज्ञक वर्ण हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकम्) एक (पर-
रूपम्) पररूप आदेश हो । अदेङ् गुणः (२५) के अनुसार 'अ, ए, ओ' ये तीन वर्ण
गुणसञ्ज्ञक हैं । यह सूत्र सवर्णदीर्घ तथा वृद्धि आदि का अपवाद है । उदाहरण यथा —
पच् + अन्ति = पच् 'अ' न्ति = पचन्ति । यज् + अन्ति = यज् 'अ' न्ति =
यजन्ति । एध + ए = एध् 'ए' = एधे । यदि अत् पदान्त होगा तो पररूप न होगा ।
यथा—दैत्य + अरि = दैत्यारिः, दीर्घ + एकार = दीर्घेकारः । दीर्घ + ओकार =
दीर्घौकारः । इन में समास के कारण विभक्ति का लुक् होने से प्रत्ययलक्षण के कारण
अत् पदान्त है । अतः पररूप नहीं होता ।
'इद अ + औ' यहां दकारोत्तर अपदान्त अत् से परे 'अ' यह गुण विद्यमान है;
अतः पूर्व (अ) और पर (अ) दोनों के स्थान पर एक पररूप 'अ' हो कर 'इद +
औ' हुआ । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
१. पुंसीति किम् ? इयं ब्राह्मणी । साविति किम् ? इमौ पुत्रौ ।

३७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७५) दश्च ।७।२।१०६॥
इदमो दस्य मः स्याद्विभक्तौ । इमौ । इमे । त्यदादेः सम्बोधनं नास्ती-
त्युत्सर्गः ॥
अर्थः—विभक्ति परे होने पर इदम् शब्द के दकार को मकार आदेश हो ।
त्यदादेरिति—सामान्यतया त्यद् आदि शब्दों का सम्बोधन नहीं होता ।
व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । इदम् ।६।१। म ।१।१।
(इदमो मः से । मकारादकार उच्चारणार्थः) । दः ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थ—
(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (इदमः) इदम् शब्द के (दः) द् के स्थान पर
(मः) म् आदेश हो ।
'इद + औ' यहां विभक्ति 'औ' परे है अतः प्रकृतसूत्र से दकार को मकार हो
कर 'इम+औ' हुआ । अब रामशब्दवत् पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर नादिचि (१२७)
सूत्र से उस का निषेध हो जाता है । पुनः वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने
पर 'इमौ' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'इदम् + अस्' (जस्) । यहां त्यदाद्यत्व, पररूप तथा दश्च (२७५) सूत्र से
दकार को मकार आदेश हो कर 'इम + अस्' हुआ । अब एकदेशविकृतन्याय से 'इम'
शब्द की भी सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । तब
जसः शी (१५२) से जस् को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश
करने पर—'इमे' प्रयोग सिद्ध होता है ।
त्यदादियों [त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदम्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्,
भवतु, किम्] का सम्बोधन प्रायः नहीं हुआ करता । 'प्रायः' इसलिये कहा है कि भाष्य
में कहीं २ 'हे स' आदि प्रयोग भी प्राप्त होते हैं । मूल का अक्षरार्थ यह है—(त्य-
दादेः) त्यदादिगण का (सम्बोधनम्) सम्बोधन (नास्ति) नहीं होता (इति) यह
(उत्सर्गः) सामान्य नियम है ।
'इदम्' शब्द के सम्बोधन में भी वही रूप बनेंगे जो उस के प्रथमा में बनते हैं ।
परन्तु लोक में इन का प्रयोग कहीं नहीं देखा जाता ।
'इदम् + अम्' यहां त्यदाद्यत्व, पररूप, दश्च (२७५) से दकार को मकारादेश
तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'इमम्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'इदम् + अस् (शस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, दकार को मकारादेश तथा पूर्वसवर्ण-
दीर्घ कर सकार को नकारादेश करने से 'इमान्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'इदम् + आ' (टा) । यहां त्यदाद्यत्व तथा पररूप हो कर 'इद + आ' इस
स्थिति में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७६) अनाप्यकः ।७।२।११२॥
अककारस्येदम इदोऽन् आपि विभक्तौ । आप् इति प्रत्याहारः । अनेन ॥
अर्थ —ककाररहित इदम् शब्द के 'इद्' भाग को 'अन्' आदेश हो तृतीयादि
विभक्ति परे हो तो ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७३
व्याख्या—अकः ।६।१। इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। (इदोऽय्
पुंसि से) । अन् ।१।१। आपि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । यहां
'आप्' यह 'टा' के आकार से 'सुप्' के पकार तक प्रत्याहार समझना चाहिये । इस
प्रकार तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, और सप्तमी—इन पञ्च विभक्तियों में स्थित
सब प्रत्ययों का 'आप्' शब्द से ग्रहण होता है । नास्ति क् (ककारः) यस्मिन् सः=
अकू, तस्य = अकः, बहुव्रीहिसमासः । अर्थः— (अकः) ककार-रहित (इदमः) इदम्
शब्द के (इदः) इद भाग के स्थान पर (अन्) अन् आदेश हो (आपि) तृतीयादि
(विभक्तौ) विभक्ति परे हो तो । 'इदम्' शब्द में जब अव्ययसर्वनाम्नाकच्प्राक्टेः
(१२२६) सूत्र से अकच् प्रत्यय किया जाता है तब वह 'इदकम्' इस प्रकार ककार-
सहित हो जाता है। तब 'अन्' आदेश के निषेध के लिये सूत्र में 'अकः' (ककाररहित)
कहा है । ध्यान रहे कि 'अन्' आदेश अनेकाल् होने से सम्पूर्ण 'इद' भाग के स्थान पर
आदिष्ट होता है ।
'इद + आ' यहां प्रकृत-सूत्र से इद भाग को अन् आदेश हो कर--अन् अ +
आ = अन + आ हुआ । पुनः टा-ङसिँ-ङसामिनात्स्याः (१४०) सूत्र से आ को इन
आदेश तथा आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश करने पर 'अनेन' प्रयोग सिद्ध
होता है ।
'इदम् + भ्याम्' यहां त्यदाद्यत्व तथा पररूप हो कर 'इद + भ्याम्' इस स्थिति
में अनाप्यकः (२७६) सूत्र से अन् आदेश प्राप्त होता है । इस पर अग्रिम अपवादसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७७) हलि लोपः ।७।२।११३॥
अककारस्येदम इदो लोपः स्यादापि हलादौ । नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधिर-
नभ्यासविकारे (प०) ॥
अर्थः—तृतीयादि हलादि विभक्ति परे हो तो ककाररहित इदम् शब्द के इद
भाग का लोप हो जाता है । नानर्थक इति—अभ्यासविकार को छोड़ कर अन्यत्र अन-
र्थकों में अलोऽन्त्यस्य (२६) सूत्र प्रवृत्त नहीं होता ।
व्याख्या—अकः ।६।१। (अनाप्यकः से) । इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः
।६।१। (इदोऽय् पुंसि से) । लोपः ।१।१। आपि ।७।१। (अनाप्यकः से) । हलि ।७।१।
विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । 'हलि' यह 'विभक्तौ' पद का विशेषण है
और साथ ही सप्तम्यन्त अल् भी है अतः यस्मिन्विधिस्तदादावल्० से तदादिविधि हो
जाती है । अर्थः—(अकः) ककाररहित (इदमः) इदम् शब्द के अवयवं (इदः) इद का
(लोपः) लोप हो जाता है (हलि = हलादौ) हलादि (आपि) तृतीयादि विभक्ति परे
हो तो । यह सूत्र पिछले अनाप्यकः (२७६) सूत्र का अपवाद है ।
'इद + भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यह तृतीयादि हलादि विभक्ति परे है अतः यहां
अनाप्यकः (२७६) सूत्र का बाध कर हलि लोपः (२७७) सूत्र से 'इद' का लोप प्राप्त
होता है । परन्तु अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से इद के अन्त्य दकार का लोप होना

३७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

चाहिये। इस पर— नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधिरनभ्यासविकारे यह परिभाषा प्रवृत्त हो कर
कहती है कि अनर्थक में अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र प्रवृत्त नहीं हुआ करता, हां १ यदि
अभ्यास का विकार अनर्थक हो तो यह (अलोऽन्त्यस्य) प्रवृत्त हो जाता है' । कौन
अनर्थक और कौन सार्थक होता है ? इस का निर्णय इस परिभाषा से होता है—
समुदायो ह्यर्थवान् तस्यैकदेशोऽनर्थकः । अर्थात् समुदाय ही सार्थक और उस का एक
भाग निरर्थक हुआ करता है। तो इस प्रकार 'इदम्' यह सम्पूर्ण समुदाय सार्थक और
इस का 'इद्' यह अवयव निरर्थक है। अनर्थक में अलोऽन्त्यविधि नहीं हुआ करती अतः
यहां भी दकार का लोप न हो कर सम्पूर्ण इद् भाग का ही लोप हो जायेगा—'अ +
भ्याम्' । अब यहां सुपि च (१४१) सूत्र से हम दीर्घ करना अभीष्ट है परन्तु उस से
वह हो नहीं सकता, क्योंकि उस के अर्थ में 'अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो' ऐसा लिखा है।
यहां अत् अङ्ग तो है पर अदन्त (अत् है अन्त में जिसके ऐसा) अङ्ग नहीं है। अतः इस
की सिद्धि के लिय अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(२७८) आद्यन्तवदेकस्मिन् ।१।१।२१॥
एकस्मिन् क्रियमाणं कार्यमादाविव अन्त इव च स्यात्। सुपि च
(१४१) इति दीर्घः । आभ्याम् ॥
अर्थ —जैसे आदि और अन्त में कार्य होते हैं वैसे एक वर्ण में भी कार्य हों।
व्याख्या—आद्यन्तवत् इत्यव्ययपदम् । एकस्मिन् ।७।१। समास —आदिश्च
अन्तश्च = आद्यन्तौ, इतरेतरद्वन्द्वः । तयोरिव = आद्यन्तवत् । तत्र तस्येव (११७६)
इति वतिप्रत्ययः । अर्थ — (आद्यन्तवत्) आदि और अन्त में जैसे कार्य होते हैं वैसे
(एकस्मिन्) एक वर्ण में भी हों ।
आदि और अन्त शब्द सापेक्ष अर्थात् दूसरे की अपेक्षा या आश्रय करने वाले हैं।
जब तक अन्य वर्ण न हों, आदि और अन्त नहीं बन सकते । जैसा कि भाष्य में कहा
है—यस्मात्पूर्वं नास्ति परम्‌अस्ति स आदिरित्युच्यते । यस्मात्पूर्वमस्ति परञ्च नास्ति
सोऽन्त इत्युच्यते । अर्थात् जिस से पूर्व कोई नहीं, परे है वह—'आदि' तथा जिस के
पूर्व तो है, परे नहीं वह—'अन्त' कहलाता है । इस प्रकार आदि और अन्त में विधान
किये गये कार्य केवल एक वर्ण में प्राप्त नहीं हो सकते । अतः उन की एक-असहाय
वर्ण में भी प्रवृत्ति कराने के लिय यह सूत्र आरम्भ किया गया है। उदाहरण यथा—
जैसे 'रामाभ्याम्, पुरुषाभ्याम्' यहां अदन्त अङ्ग को सुपि च (१४१) से दीर्घ होता है
वैसे—'अ + भ्याम्' यहां केवल अत् को भी दीर्घ हो कर 'आभ्याम्' बनेगा । आदि का
उदाहरण—जैसे 'भविष्यति' यहां वलादि स्य को आर्धधातुकस्येड् वलादे (४०१) से
इट् का आगम होता है वैसे 'आतिष्ठाम्, आतिष्ठु' इत्यादियों में केवल 'स्' को भी
होगा।
१ यथा—बिभर्ति, पिपर्ति आदियों में अभ्यास के अन्त्य ऋकार को इकार आदेश
हो जाता है। अन्यथा यहां भी सम्पूर्ण अभ्यास के स्थान पर आदेश होना (देखें
भैमीव्याख्या द्वितीय भाग सूत्र ६१०) ।

हलन्त-पुलिंङ्ग-प्रकरणम् ३७५
नोट—भाष्यकार ने इस सूत्र को और अधिक विस्तृत करने के लिये व्यप-
देशिवदेकस्मिन् ऐसा लिखा है। मुख्यव्यवहार को 'व्यपदेश' कहते हैं। व्यपदेशोऽस्या-
स्तीति व्यपदेशी, व्यपदेश वाले का नाम 'व्यपदेशी' हुआ। अर्थात् मुख्य का नाम 'व्यप-
देशी' है। उस मुख्य के समान एक में भी कार्य हो जाते हैं। यथा—एकाचो वशो
भष्० (२५३) का मुख्य उदाहरण 'गर्दभ्' है। यहां गर्दभ् धातु का अवयव एकाच्
भषन्त 'दभ्' है। परन्तु 'धुक्' यहां ऐसा नहीं। यहां धातु भी वही है और एकाच् भषन्त
भी वही है, अर्थात् दोनों अभिन्न हैं, इस में भी मुख्य के समान कार्य हो जाएंगे। ये
उदाहरण पाणिनि के आद्यन्तवदेकस्मिन् सूत्र से सिद्ध नहीं हो सकते थे अतः भाष्य-
कार को व्यपदेशिवदेकस्मिन् इस प्रकार रचना पड़ा। शास्त्र में इसे ही व्यपदेशिवद्भाव
कहा गया है। व्यपदेशिवद्भाव का अर्थ गौण को भी मुख्य के समान मानना है।
'इदम् + भिस्' यहां त्यदाद्यत्व, पररूप, हलि लोपः (२७७) से इद का लोप
हो 'अ+भिस्' इस स्थिति में व्यपदेशिवद्भाव से अतो भिस ऐस् (१४२) द्वारा भिस्
को ऐस् प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है—
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२७६) नेदमदसोरकोः ।७।१।११॥
अककारयोरिदमदसोर्भिस ऐस् न । एभिः । अस्मै । एभ्यः । अस्मात् ।
अस्य । अनयोः २ । एषाम् । अस्मिन् । एषु ॥
अर्थः—ककाररहित इदम् और अदस् शब्द के भिस् को ऐस् नहीं होता ।
व्याख्या—अकोः ।६।२। इदमदसोः ।६।२। भिसः ।६।१। ऐस् ।१।१। (अतो भिस
ऐस् से) । न इत्यव्ययपदम् । नास्ति क् ययोस्तौ = अको, तयोः = अकोः, बहुव्रीहि-
समासः । अर्थः—(अकः) ककाररहित (इदमदसोः) इदम् और अदस् शब्द के (भिसः)
भिस् के स्थान पर (ऐस्) ऐस् (न) न हो ।
'अ+भिस्' यहां प्रकृतसूत्र से भिस् को ऐस् न हुआ । तब बहुवचने झल्येत्
(१४५) से एत्व हो सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'एभिः' प्रयोग बना ।
चतुर्थी के एकवचन में 'इदम् + ए' (ङे) = इद + ए । इस अवस्था में सर्वनाम्नः
स्मै (१५३) सूत्र से एकार को स्मै आदेश तथा अनाप्यकः (२७६) से इद् को अन्
आदेश युगपत् प्राप्त होते हैं । विप्रतिषेधपरिभाषा से परकार्य अन् आदेश होने
योग्य है । परन्तु वह अनिष्ट है । इस के लिये परिभाषा प्रवृत्त होती है—पूर्व-पर-
नित्याऽन्तरङ्गाऽपवादानामुत्तरोत्तरं बलीयः (प०) । अर्थात् पूर्व से पर, पर से नित्य,
नित्य से अन्तरङ्ग और अन्तरङ्ग से अपवाद बलवान् होता है। नित्य उसे कहते हैं कि
जो अपने विरोधी के प्रवृत्त होने पर भी प्रवृत्त हो सके । यथा—यहां 'स्मै' आदेश
नित्य है क्योंकि यह अपने विरोधी अन् आदेश के प्रवृत्त हो जाने पर भी प्रवृत्त हो
सकता है । पर से नित्य बलवान् होता है अतः अनाप्यकः (७.२.११२) के परे होने
पर भी सर्वनाम्नः स्मै (७.१.१४) सूत्र के नित्य होने से स्मै आदेश हो जाता है । तब
'इद + स्मै' इस स्थिति में हलि लोपः (२७७) से इद् भाग का लोप हो कर 'अस्मै'
प्रयोग सिद्ध होता है ।

३७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
इदम् + अस् (ङसिँ) = इद + अस्। यहां भी पूर्ववत् नित्य होने से अन्
आदेश का बाध कर ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) सूत्र से स्मात् आदेश हो जाता
है। तब हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप करने से अस्मात्' रूप बनता है।
इदम् + अस् (ङस्) = इद + अस्। नित्य होने से ङसिँङ्योस्मा० (१४०) से
स्य आदेश हो जाता है। तब इद् का लोप हो अस्य प्रयोग सिद्ध होता है।
इदम् + ओस् = इद + ओस्। यहां अनाप्यकः (२७६) सूत्र से अन् आदेश,
ओसि च (१४७) से एत्व तथा एचोऽयवायावः (२२) से अय् आदेश करने पर
'अनयोः' रूप बनता है।
इदम् + आम्। त्यदाद्यत्व, पररूप, नित्य होने से आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५)
से सुँट् इद् भाग का लोप और बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व करने पर—एषाम्।
अब आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व कर 'एषाम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
इदम् + इ (ङि) = इद + इ। यहां ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) से प्रथम
स्मिन् आदेश हो कर तदनन्तर इद् भाग का लोप हो जाता है—अस्मिन् ।
इदम् + सु (सुप्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, इद् का लोप, एत्व और षत्व करने
पर एषु प्रयोग सिद्ध होता है। 'इदम्' शब्द की पुल्लिङ्ग में रूपमाला यथा—
प्र० अयम् इमौ इमे प० अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
द्वि० इमम् " इमान् ष० अस्य अनयोः एषाम्
तृ० अनेन आभ्याम् एभिः स० अस्मिन् , एषु
च० अस्मै " एभ्यः सम्बोधनं नास्तीति प्रायोवादः ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२८०) द्वितीयाटौस्स्वेनः ।२।४।३४॥
इदमेतदोरन्वादेशे। किञ्चित्कार्यं विधातुमुपात्तस्य कार्यान्तरं विधातुं
पुनरुपादानमन्वादेशः। यथा—अनेन व्याकरणमधीतमेनं छन्दोऽध्यापयेति ।
अनया पवित्रं कुलम् एनयोः प्रभूतं स्वम् इति। एनम्। एनौ। एनान्।
एनेन। एनयोः २॥
अर्थ—द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियों के परे होने पर अन्वादेश में इदम्
और एतद् शब्द को 'एन' आदेश हो। किञ्चिद इति—किसी कार्य को बोधन कराने
के लिये ग्रहण किये हुए का पुनः दूसरे कार्य को बोधन कराने के लिये ग्रहण करना
'अन्वादेश' कहलाता है।
व्याख्या—इदमः ।६।१। (इदमोऽन्वादेशे० ग०)। एतदः ।६।१। (एतदस्त्रतसो ०
से)। अन्वादेशे ।७।१। (इदमोऽन्वादेशे० सू०)। द्वितीयाटोरसु ।७।३। एन् ।१।१।
समास—द्वितीया च टाश्च ओस् च=द्वितीयाटौसः तासु—द्वितीयाटौस्सु इतरतर-
द्वन्द्वः। अर्थ—(अन्वादेशे) अन्वादेश में (इदमः) इदम् तथा (एतदः) एतद् शब्द के
स्थान पर (एन) 'एन' आदेश हो (द्वितीयाटौस्सु) द्वितीया, टा और ओस् विभक्ति

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७७
परे होने पर। अनेकाल् होने से 'एन' आदेश सम्पूर्ण इदम् और एतद् के स्थान पर
होगा।
अन्वादेश किसे कहते हैं? किसी अज्ञात कार्य को जनाने या विधान करने के
लिये जिस का प्रथम एक बार ग्रहण हो चुका हो; यदि पुनः दूसरे अज्ञात कार्य को
जनाने या विधान करने के लिये उस का ग्रहण किया जावे तो वह पुनर्ग्रहण 'अन्वादेश'
कहाता है। यथा — (१) अनेन व्याकरणम् अधीतम् एनं छन्दोऽध्यापय (इस ने व्या-
करण पढ़ लिया है अब इसे छन्दश्शास्त्र पढ़ाओ)। यहां 'व्याकरण पढ़ लिया है' इस
कार्य के लिये 'अनेन' का ग्रहण किया गया है। पुनः छन्दोऽध्ययन के लिये भी उस का
ग्रहण किया गया है अतः दूसरी वार उस का ग्रहण 'अन्वादेश' हुआ। (२) अनयोः
पवित्रं कुलम्, एनयोः प्रभूतं स्वम् (इन दोनों का कुल पवित्र है तथा इन का धन भी
बहुत है)। यहां प्रथम पवित्र कुल कहने के लिये ग्रहण किये हुए 'इन दोनों' का पुनः
बहुत धन कहने के लिये दोबारा ग्रहण किया गया है अतः यह दूसरी वार वाला ग्रहण
'अन्वादेश' है। इसी प्रकार — इमं बालकं शिक्षामपीपठः, अथो एनं वेदमध्यापय (इस
बालक को तुम शिक्षा पढ़ा चुके हो अब इसे वेद पढ़ाओ)। यहां वेद पढ़ाने के लिये
पुनः उस का ग्रहण 'अन्वादेश' है। अनेनच्छात्रेण रात्रिरधीता, अथो एनेनाहरप्यधीतम्
(इस छात्र ने रात भर पढ़ा और इस ने दिन भर भी पढ़ा)। यहां 'दिन भर भी
पढ़ा' यह जनाने के लिये पुनः उस का ग्रहण अन्वादेश है। अनयोश्छात्रयोः शोभनं
शीलम्, अथो एनयोः कुशाग्रा मेधा (ये दोनों छात्र अच्छे आचार वाले हैं और इन की
बुद्धि भी तीक्ष्ण है)। यहां 'बुद्धि तीक्ष्ण है' यह जनाने के लिये पुनः उन का ग्रहण
'अन्वादेश' है।
अन्वादेश में द्वितीया (अम्, औट्, शस्) तथा टा और ओस् (षष्ठी और
सप्तमी दोनों के द्विवचन) इन पञ्च प्रत्ययों के परे होने पर इदम् और एतद् शब्द
को 'एन' सर्वादेश हो जाता है। अन्य विभक्तियों में अनन्वादेश की भांति रूप चलते
हैं¹। 'एतद्' शब्द का वर्णन आगे आयेगा यहां 'इदम्' शब्द प्रस्तुत है—
१. इदम् + अम् = एन + अम् = एनम्। २. इदम् + औट् = एन + औ = एनौ।
३. इदम् + शस् = एन + अस् = एनान्। ४. इदम् + टा = एन + आ = एन + इन =
एनेन। ५. इदम् + ओस् = एन + ओस् = एनयोः। 'एन' आदेश होकर यहां पुंल्लिङ्ग
में रामवत् प्रक्रिया होती है। इन सब का दो श्लोकों में प्राचीन संग्रह यथा—
इमं विद्धि हरेर्भक्तं, विद्धयथैनं शिवार्चकम्।
इमाविमान् वित्त शैवान्, एनावेनांस्तु वैष्णवान् ॥ १ ॥
१. यद्यपि अन्य विभक्तियों में रूप अनन्वादेश की भाँति होते हैं तो भी प्रक्रिया में
बड़ा अन्तर होता है। अन्वादेश में इदम् शब्द के स्थान पर तृतीयादि विभक्तियों
में इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ (२.४.३२) सूत्र से 'अश्' आदेश हो कर
शकार का लोप करने पर अदन्त सर्वनाम की तरह कार्य होते हैं। यह सब
सप्रयोजन विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी में देखें।

३७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

अनेन पूजितः कृष्णोऽथैनेन गिरिशोऽर्चितः ।
अनयोः केशवः स्वामी, शिवः स्वामी ह्यथैनयोः ॥ २ ॥
विशेष—किञ्चित्कार्यं विधातुम्० यहां 'विधातुम्' से केवल विधान का अभि-
प्राय नहीं है । किसी अज्ञात बात को बतलाना या जनाना ही यहां अभिप्रेत है । अत
एव —अप्येतमद्रेस्तनया शुशोच (रघु० २/३७) यहां विधानाभाव में भी अन्वादेश के
स्वीकृत होने से 'एन' आदेश सिद्ध हो जाता है । ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाऽभिविधौ
च यः । एतम् आतं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् (देखें पृष्ठ ६०) इस पद्य के
पूर्वार्ध में ईषद आदि लोकप्रसिद्ध अर्थों का अनुवाद ही प्रस्तुत किया गया है अत
अज्ञातज्ञापन न होने से अन्वादेश के अभाव के कारण 'एन' आदेश नहीं हुआ । इसी
प्रकार 'गीतगोविन्द' के — नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे ! गृहं प्रापय (यह कृष्ण
रात्रि में भीरु है अत तू=राधा ही इसे घर पहुंचा दे)—इस आद्य पद्य में ज्ञात-
भीरुता का अनुवादमात्र प्रस्तुत होने से अन्वादेश न होने के कारण 'इमम्' का 'एनम्'
नहीं हुआ ।
यहां यह जरूरी नहीं कि इदम् शब्द के द्वारा गृहीत का ही जब उसी इदम्
शब्द के द्वारा दोबारा ग्रहण हो तभी अन्वादेश मान कर एन आदेश किया जाये, किन्तु
प्रथम ग्रहण में चाहे यद्, तद् आदि किसी अन्य शब्द के द्वारा या किसी अन्य प्रकार से
भी ग्रहण हो तो दूसरे ग्रहण में इदम् और एतद् को एन आदेश हो जाता है । यथा—
एव तयोक्ते तमवेक्ष्य किञ्चिद्विस्रंसिदुर्वाङ्कमधूकमाला ।
ऋजुप्रणामक्रिययैव तन्वी प्रत्यादिदेशैनमभाष्यमाणा ॥ (रघु० ६/२५)
यहां प्रथम 'तद्' शब्द से गृहीत होने पर भी पुनर्ग्रहण में इदम् या एतद् को एन आदेश
हो जाता है ।
(यहां मकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।)

अभ्यास (३६)
(१) 'किम्' शब्द ही सर्वनामों में पढ़ा गया है 'क' शब्द नहीं, पुनः के,
कस्मै' आदियों में क्या सर्वनामकार्य हो जाते हैं ?
(२) 'इदम्' शब्द में स्वतः ही ककार का श्रवण नहीं होता, पुनः उस के
वारण के लिये अनाप्यकः में यत्न क्यों किया गया है ?
(३) 'अयम्' में त्यदाद्यत्व क्यों नहीं होता ? यदि उस के प्रवृत्त्यभाव का
कोई कारण है तो वह 'इमौ, इमे' आदि में क्यों नहीं ?
(४) 'पुष्+नाति = पुष्णाति' यहां ष्टुत्व होता है या णत्व ? विवेचन करें ।
(५) आदि और अन्त का लक्षण लिख कर व्यपदेशिवद्भाव को स्पष्ट करें ।
(६) अन्वादेश का सोदाहरण स्पष्टीकरण करें ।
(७) 'नानर्थके० परिभाषा की आवश्यकता पर सोदाहरण एक टिप्पण लिखें ।
(८) (क) 'प्रशान्' यहां नकार का लोप क्यों नहीं होता ?

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७६
(ख) 'चतुर्षु' में रेफ को विसर्गादेश क्यों नहीं होता ?
(ग) 'अग्निर्नयति' में णत्व क्यों नहीं होता ?
(६) चत्वारः, केषाम्, प्रशान्तसु, चतुर्णाम्, अयम्, अनयोः, अस्मै, एनयोः,
एभिः, एषु—इन रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें।
(१०) अनाप्यकः, दश्च, शरोऽचि, रषाभ्यां नो णः०, आद्यन्तवदेकस्मिन्, अतो
गुणे—इन की व्याख्या करते हुए प्रत्येक को उदाहरणों में घटाएं।
—:०:—
अब नकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन प्रारम्भ करते हैं—
[लघु०] राजा ।।
व्याख्या—'राजृँ दीप्तौ (भ्वा० उभ०) धातु से कनिन् यु-वृषि-तक्षि-राजि-
धन्वि-द्यु-प्रतिदिवः (उणा० १५४) सूत्रद्वारा कनिँन् प्रत्यय करने से राजन् (राजा)
शब्द निष्पन्न होता है। राजते=शोभत इति राजा।
'राजन्+स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) सूत्र से सुंलोप तथा सर्वनाम-
स्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु परत्व के
कारण प्रथम उपधादीर्घ हो कर पश्चात् सुंलोप हो जाता है— राजान्+स् = राजान्।
अब न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो कर 'राजा' रूप
सिद्ध होता है।
'राजन् + औ' यहां सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) मे उपधादीर्घ हो कर
'राजानौ' बनता है। इसी प्रकार आगे भी सर्वनामस्थानों में उपधादीर्घ हो जाता है—
राजानः, राजानम्, राजानौ।
हे राजन्+स्। यहां एकवचनं सम्बुद्धिः (१३२) से 'सुँ' की सम्बुद्धि सञ्ज्ञा
है, अतः सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ नही होता। हल्ङ्याब्भ्यः०
(१७६) से सुंलोप हो कर 'हे राजन् !' हुआ। अब यहां न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य
(१८०) सूत्र से नकार का लोप प्राप्त होता है, परन्तु यह अनिष्ट है। अतः इस का
अग्रिमसूत्र से निषेध करते हैं—
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२८१) न ङिसम्बुद्ध्योः ।८।२।८।
नस्य लोपो न, ङौ सम्बुद्धौ च। हे राजन् !॥
अर्थः—ङि अथवा सम्बुद्धि परे होने पर नकार का लोप नहीं होता।
व्याख्या—न ।६।१। (लुप्तषष्ठीकं पदम्)। लोपः ।१।१। (न लोपः० से)। न
इत्यव्ययपदम्। ङिसम्बुद्ध्योः ।७।२। समासः—ङिश्च सम्बुद्धिश्च = ङिसम्बुद्धी, तयोः
= ङिसम्बुद्ध्योः, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(ङिसम्बुद्ध्योः) ङि अथवा सम्बुद्धि परे हो
तो (न=नस्य) नकार का (लोपः) लोप (न) नहीं होता¹।
१. ङि का उदाहरण वेद में आता है—परमे व्योमन् (ऋ० १.१६४.३६)।

३८० | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'हे राजन्' यहां सम्बुद्धि का लोप होने पर भी प्रत्ययलक्षण परिभाषा द्वारा
सम्बुद्धि को मान कर नकारलोप का निषेध हो जाता है—हे राजन्' ।
[लघु०] वा०— (२५) ङावुत्तरपदे प्रतिषेधो वक्तव्यः ॥
ब्रह्मनिष्ठ । राजानौ । राजान । राज्ञ ॥
अर्थ—उत्तरपदपरक 'ङि' के परे होने पर न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र का
निषेध कहना चाहिये ।
व्याख्या—ङौ ।७।१। उत्तरपदे ।७।१। प्रतिषेध ।१।१। वक्तव्य ।१।१। अर्थ—
(उत्तरपद) उत्तरपद परे होने पर (ङौ) जो ङि, उस के परे होने पर (प्रतिषेध )
निषेध (वक्तव्य ) कहना चाहिये । किस का निषेध कहना चाहिये ? इस का उत्तर
यह है कि जिस सूत्र पर जो वार्त्तिक पढ़ा जाता है वह तत्सूत्रविषयक ही समझा जाना
है। यहां यह वार्त्तिक न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र पर पढ़ा गया है अतः यह न
ङिसम्बुद्धयो द्वारा प्राप्त नकार-लोप के निषेध का ही निषेध करेगा।¹
यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि व्याकरण में समास के अन्तिम पद को
उत्तरपद तथा आदिम पद को पूर्वपद कहते हैं। यथा—राज्ञ पुरुष = राजपुरुष ।
यहां 'राज्ञ' यह षष्ठ्यन्त पूर्वपद तथा 'पुरुष' यह प्रथमान्त उत्तरपद है।
ब्रह्मनिष्ठ । ब्रह्मणि निष्ठा यस्य स ब्रह्मनिष्ठ । ब्रह्म में स्थिति या विश्वास
रखने वाला पुरुष 'ब्रह्मनिष्ठ' कहाता है । 'ब्रह्मन्+ङि निष्ठा+सुं' यहां बहुव्रीहिसमास में
सुपो धातु० (७२१) सूत्र से ङि और सुं का लुक् हो कर न लोप प्रातिपदिकान्तस्य
(१८०) सूत्र से नकार का लोप प्राप्त होता है, परन्तु न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र
उस लोप का निषेध कर देता है क्योंकि प्रत्ययलक्षणपरिभाषा से 'ङि' परे स्थित है।
अब ङावुत्तरपदे० इस प्रकृत वार्त्तिक से उस निषेध का भी निषेध हो कर पुनः न लोपः
प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) से नकारलोप हो जाता है। यहां 'ङि' से परे 'निष्ठा' यह
उत्तरपद विद्यमान है। 'ब्रह्मनिष्ठा' ऐसा होने पर गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य (६५२) सूत्र
द्वारा ह्रस्व हो कर विभक्ति लाने से ब्रह्मनिष्ठ' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार—
'आत्मविश्वास, चर्मतिल' आदि प्रयोग जानने चाहियें।
'राजन्+शस्' (शस्) यहां अल्लोपोऽन (२४७) सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के
अकार का लोप हो कर—'राजन्+अस्' हुआ। अब स्तोः श्चुना श्चुः (६२) सूत्र से
नकार को ञकार करने पर—राज्ञ्+अस्='राज्ञ' प्रयोग सिद्ध होता है।
नोट—'ज्ञ्' यह संयुक्त व्यञ्जन है। ज् और ञ् के योग से इस की निष्पत्ति
होती है। लिखने की सुविधा के लिये इस का ऐसा स्वरूप माना गया प्रतीत होता है।
'ज्ञ' को पृथक् वर्ण मान कर इस का 'ग्य' वा 'ज्य, ग्न, जन' आदि उच्चारण करना
नितान्त अशुद्ध और शास्त्रविरुद्ध है। यदि यह अपूर्व वर्ण बन जाता तो शिक्षाकार
१ यदि ङावुत्तरपदेऽप्रतिषेधो वक्तव्यः कही पाठ मिले तो उस का भाव यह होगा कि
न ङिसम्बुद्धयो वाले निषेध को मत करो अर्थात् वहां पर 'न्' का लोप कर दो।

हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८१
इस के उच्चारण का भी कहीं निर्देश करते; परन्तु उन्होंने ऐसा कहीं नहीं किया ।
इस को अपूर्व वर्ण मानने से स्तोः श्चुना श्चुः (६२) द्वारा श्चुत्व भी न हो सकेगा ।
यथा — तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्, एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम्, यज्ज्ञात्वा मुच्यतेऽशुभात् इत्यादि ।
सिद्धान्तकौमुदी के जञोर्ज्ञः पर शेखरकार का वक्तव्य भी यहां द्रष्टव्य है—जञयोगे लोक-
वेदसिद्धतादृशध्वनेर्लिपिविशेषस्य चानुवादकमभियुक्तवचनं न त्विदं वर्णान्तरम्, शिक्षा-
दावपरिगणितत्वेन सत्सत्त्वे मानाभावात् । अत एव 'तज्ज्ञानम्' इत्यादौ श्चुत्वसिद्धिः ।
किञ्च यदि इस का उच्चारण 'ग्य' आदि होता तो प्राकृत में—मणोज्ज (मनोज्ञ),
जण्ण (यज्ञ), अहिज्जो (अभिज्ञ), सव्वज्जो (सर्वज्ञ) इत्यादियों में इस प्रकार आदि
में जकार वा णकार न होता । अतः 'ज्ञ' कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं यह सिद्ध होता है ।
इसी प्रकार 'क्ष्' के विषय में भी समझना चाहिये । यह भी 'क् + ष्' के योग से
उत्पन्न होता है ।
राजन् + आ (टा)। भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर श्चुत्व करने से—
राज्ज् + आ = 'राज्ञा' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'राजन् + भ्याम्' इस स्थिति में न लोपः० (१८०) से पदान्त नकार का लोप
हो जाता है । तब 'राज + भ्याम्' इस अवस्था में सुपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त होता
है । उस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] नियम-सूत्रम्— (२८२) नलोपः सुप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु कृति ।
८।२।२॥
सुब्विधौ स्वरविधौ सञ्ज्ञाविधौ कृति तुग्विधौ च नलोपोऽसिद्धो नान्यत्र
'राजाश्व' इत्यादौ । इत्यसिद्धत्वाद् आत्वमेत्वमैस्त्वं च न । राजभ्याम् ।
राजभिः । राजभ्यः २ । राज्ञि, राजनि । राजसु ॥
अर्थः—सुब्विधि, स्वरविधि, सञ्ज्ञाविधि तथा कृत्प्रत्ययपरक तुग्विधि करने में
ही नकार का लोप असिद्ध होता है अन्यत्र नहीं । यथा—'राजाश्वः' इत्यादियों में
असिद्ध नहीं होता । इत्यसिद्धत्वाद् इति — इस सूत्र से यहां नकारलोप के असिद्ध होने
से आ-भाव, ए-भाव, ऐस्-भाव नहीं होता ।
व्याख्या — नलोपः ।१।१। सुप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु ।७।३। कृति ।७।१। असिद्धः
।१।१। (पूर्वत्रासिद्धम् से लिङ्गविपरिणाम कर के) । समासः—नस्य लोपः=नलोपः,
षष्ठीतत्पुरुषः । सुँप् च स्वरश्च सञ्ज्ञा च तुक् च = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुकः, इतरेतरद्वन्द्वः ।
तेषां विधयः = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधयः, तेषु = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु, षष्ठीतत्पुरुषः ।
विधिशब्दोऽत्र भावसाधनः । विधानं विधिः । यहां सुँवादिगत शेषषष्ठी के साथ विधि-
शब्द का समास हुआ जानना चाहिये । सुब्विधिः—सुँपो विधिः । यहां शेष में षष्ठी
होने के कारण 'सुँप्सम्बन्धी विधि' ऐसा अर्थ हो जाता है । सुँप्सम्बन्धी विधि दो प्रकार
की हो सकती है; एक तो सुँप् के स्थान पर, यथा—राजभिः । यहां अतो भिस ऐस्
(१४२) सूत्र से भिस्=सुँप् के स्थान पर ऐस् प्राप्त होता है । दूसरी सुँप् परे होने

३८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
पर, यथा—राजभ्याम्, राजभ्यः। यहां सुँप् परे होने पर आत्त्व तथा एत्त्व प्राप्त होता
है। स्वरविधि = स्वरस्य विधिः। यहां स्वर कर्म में शेषत्व की विवक्षा में षष्ठी
विभक्ति हुई है। 'स्वर को विधान करना' यह अर्थ यहां अभिप्रेत है। सञ्ज्ञाविधि =
सञ्ज्ञायाः विधिः। यहां भी कर्म में शेषत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति हुई है। 'सञ्ज्ञा
को विधान करना' यह अर्थ यहां अभिप्रेत है। तुग्विधि = तुको विधिः। यहां भी तुँक्
कर्म में शेषत्व की विवक्षा से षष्ठी विभक्ति जाननी चाहिये। 'कृति' यह 'तुग्विधि' के
साथ ही सम्बन्ध रखता है, असम्भव होने से अन्यों के साथ नहीं। अतः 'कृत् परे होने
पर तुँक् को विधान करना' यह अर्थ निष्पन्न होता है। अर्थ —(सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्वि-
धिषु) सुँप्सम्बन्धी विधान, स्वरविधान, सञ्ज्ञाविधान तथा कृत् प्रत्यय परे होने पर
तुग्विधान करने में (नलोपः) नकार का लोप (असिद्धः) असिद्ध होता है।
ये जितनी विधियां गिनाई गई हैं, सब अष्टाध्यायी के सवा सात अध्यायों में
स्थित हैं। अतः इन विधियों के प्रति नकार का लोप त्रिपादीस्थ होने से ही पूर्वत्रा-
सिद्धम् (३१) द्वारा असिद्ध है, पुनः यहां इन विधियों में नकारलोप को असिद्ध कहना
नियमार्थ है—सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः। अर्थात् इन विधियों में ही नकार का लोप
असिद्ध हो अन्य विधियां में न हो। यथा—राज्ञोऽश्वः = राजाश्वः। 'राजन्‌ङस् अश्वसुँ'
यहां षष्ठीतत्पुरुषसमास में सुँपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र से ङस् और सुँ का
लुक् हो—राजन् अश्व। न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप
हो—राज अश्व। अब यहां नलोप के असिद्ध होने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा
सवर्णदीर्घ नहीं हो सकता। पुनः इस उपर्युक्त नियम से नकारलोप के सिद्ध हो जाने
से वह हो जाता है। तो इस प्रकार—'राजाश्वः' रूप निष्पन्न होता है। इसी प्रकार
—दण्ड्यश्वः, योग्यात्मा, मन्त्राज्ञा आदि प्रयोगों में नकारलोप के सिद्ध होने से यण्,
'राजेन्द्रः' आदि प्रयोगों में गुण तथा 'राजीयति, राजायते' में क्रमशः क्यचि च (७२२)
में ईत्व और अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः (४८३) से दीर्घ हो जाता है। इस सूत्र का यही
प्रयोजन है।
'राज् + भ्याम्' यहां सुँपि च (१४१) से आत्त्व, 'राज् + भिस्' यहां अतो भिस
ऐस् (१४२) से भिस् का ऐस्, 'राज् + भ्यस्' यहां बहुवचने झल्येत् (१४५) में एत्त्व
ये सुँब्विधियां प्राप्त होती हैं। इन के प्रति नकारलोप असिद्ध ही है अतः इन में से
कोई भी कार्य न होगा। राजभ्याम्, राजभिः, राजभ्यः।
राजन् + ङि(डि)। यहां विभाषा ङिश्योः (२४८) सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के
अकार का वैकल्पिक लोप हो जाना है। लोपपक्ष में श्चुत्व हो कर—'राज्ञि'। लोपा-
भाव में—'राजनि'। 'राजन्' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
प्र० राजा राजानौ राजानः । प० राज्ञः राजभ्याम् राजभ्यः
द्वि० राजानम् " राज्ञः । ष० " राज्ञोः राज्ञाम्
तृ० राज्ञा राजभ्याम् राजभिः । स० राज्ञि, राजनि " राजसु
च० राज्ञे " राजभ्यः । सं० हे राजन्! हे राजानौ! हे राजानः!

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८३
इसी प्रकार निम्नस्थ शब्दों के रूप होते हैं। [ * यह चिह्न णत्वबोधक है ]
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
(१) अकिञ्चनिमनू = निर्धनता | (२४) प्रेमन्* = प्रियत्व, प्रेम, स्नेह
(२) अणिमन् = अणुत्व, अणुपना | (२५) बधिरिमन्* = बहरापन
(३) अम्लिमन् = अम्लत्व, खट्टापन | (२६) बंहिमन् = बाहुल्य, आधिक्य
(४) आशिमन् = आशुता, शीघ्रता | (२७) बालिमन् = बालपन, लड़कपन
(५) उष्णिमन् = उष्णता, गरमी | (२८) भूमन् = बहुत्व, आधिक्य
(६) ऋजिमन् = ऋजुता, सरलता | (२९) भृशिमन् = भृशता, बहुतायत
(७) कालिमन् = कालापन, कृष्णता | (३०) मधुरिमन्* = माधुर्य, मिठास
(८) कृष्णिमन् = कृष्णता, कालापन | (३१) मन्दिमन् = मन्दत्व, मन्दपना
(९) कृशिमन् = कृशत्व, दुबलापन | (३२) महिमन् = महत्त्व, गौरव
(१०) क्षेपिमन्* = क्षिप्रता, शीघ्रता | (३३) मूकिमन् = मूकता, गूंगापन
(११) क्षोदिमन् = क्षुद्रता, छुटप्पन | (३४) म्रदिमन् = मृदुता, कोमलता
(१२) गरिमन्* = गुरुत्व, गौरव | (३५) रक्तिमन् = रक्तता, लाली
(१३) चण्डिमन् = चण्डता, तीव्रता | (३६) लघिमन् = लघुता, हल्कापन
(१४) जटिमन् = जड़त्व, मूर्खता | (३७) लवणमन् = लवणता, नमकीनपन
(१५) तनिमन् = तनुत्व, पतलापन | (३८) लोहितिमन् = लोहितत्व, लाली
(१६) द्रढिमन् = दृढ़ता, कठोरता | (३९) वरिमन्* = उरुत्व, विशालता
(१७) द्राघिमन्* = दीर्घता, लम्बाई | (४०) शीतिमन् = शीतत्व, ठण्डक
(१८) पटिमन् = पटुता, चतुराई | (४१) शुक्लिमन् = शुक्लत्व, सुफेदी
(१९) पण्डितिमन् = पाण्डित्य, विद्वत्ता | (४२) श्वेतिमन् = श्वेतता, सुफेदी
(२०) परिवृढिमन् = स्वामित्व | (४३) साधिमन् = साधुत्व, सज्जनता
(२१) पाण्डिमन् = पाण्डुता, पीलापन | (४४) स्थेमन् = स्थिरता, दृढ़ता
(२२) पाण्डुरिमन्* = पीलापन, सुफेदी | (४५) स्वादिमन् = स्वादुपना
(२३) प्रथिमान् = पृथुता, विस्तार | (४६) ह्रसिमन् = ह्रस्वत्व, छुटप्पन
इसी प्रकार—अश्वत्थामन्, उक्षन्, तक्षन्, वृषन्, मूर्धन् प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।
[लघु०] यज्वा । यज्वानौ । यज्वानः ॥
व्याख्या—यजें (भ्वा० उभ०) धातु से सुयजोर्ङ्वनिँप् (३.२.१०३) सूत्र
१. ये सब शब्द पृथादिभ्यः इमनिँचू (११५२) सूत्र द्वारा भाव में इमनिँच् प्रत्यय करने से निष्पन्न होते हैं। इमनिँचूप्रत्ययान्त शब्द पुंल्लिङ्ग हुआ करते हैं। केवल 'प्रेमन्' शब्द कहीं २ नपुंसक में प्रयुक्त होता है।