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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 633 में से

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पृष्ठ 382

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६७

इस सूत्र के उदाहरण—आस्तीर्णम्, अवगीर्णम्, कृष्णाति, पुष्णाति आदि हैं ।
अप्तृन्---प्रशास्तॄणाम् (२०६) आदि प्रयोगों¹ तथा क्षुम्नादिगण (८.४.३६)
में 'नृनमन, तृन्' को णत्व-निषेध करने से यहां रेफ और षकार की तरह ऋवर्ण को
भी णत्व का निमित्त मानना चाहिये । इस के उदाहरण—'मातॄणाम्, पितॄणाम्' आदि
हैं । ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) इसी का अनुवाद है ।
'चतुर् + नाम्' यहां प्रकृतसूत्र से नकार को णकारादेश हो कर 'चतुर्णाम्'
हुआ । अब अचो रहाभ्यां द्वे (६०) सूत्र से णकार को वैकल्पिक द्वित्व करने मे—
'चतुर्ण्णाम्, चतुर्णाम्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
नोट—यहां णत्व करते समय प्रायः सुबोध विद्यार्थियों को सन्देह हुआ करता
है कि 'चतुर्णाम्' में तो अट्कुप्वाङ्० (१३८) से ही णत्व हो सकता है, क्योंकि वहां
'व्यवाधानेऽपि णत्वं स्यात्' कहा है । अर्थात् व्यवधान होने पर भी णत्व हो जाता है ।
इस से यह विदित होता है कि यदि व्यवधान न होगा तब तो अवश्य ही हो जायेगा ।
'पुष्णाति, मुष्णाति' आदियों में ष्टुत्व से भी णत्व सिद्ध हो सकता है । अतः यह सूत्र
निरर्थक है ।
परन्तु तनिक ध्यान देने पर इस की उपयोगिता स्पष्ट समझ में आ जाती है ।
अष्टाध्यायी में प्रथम यह सूत्र और तदनन्तर अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र पढ़ा गया है ।
अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र में पूर्णरूपेण यह सूत्र अनुवर्त्तित होता है। यदि यह सूत्र न
बनाते तो उस में अनुवृत्ति कहां से आती ? 'पुष्णाति, मुष्णाति' आदियों में यद्यपि
ष्टुत्व से सिद्धि हो सकती है; तथापि अट् आदि के व्यवधान में णत्वसिद्धि के लिये
उस का ग्रहण अवश्य प्रयोजनीय है । अन्यथा 'पुरुषेण, पुरुषाणाम्' आदि सिद्ध न हो
सकेंगे ।
सप्तमी के बहुवचन 'चतुर् + सु' में खर् परे होने से खरवसानयोः० (६३)
द्वारा रेफ को विसर्ग आदेश प्राप्त है । इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] नियम-सूत्रम्—(२६८) रोः सुपि ।८।३।१६॥
रोरेव विसर्गः सुपि । षत्वम् । षस्य द्वित्वे प्राप्ते—
अर्थः—सप्तमी के बहुवचन 'सुप्' के परे होने पर रुँ के स्थान पर ही विसर्ग
आदेश हो (अन्य रेफ के स्थान पर न हो) ।
व्याख्या—रोः ।६।१। सुपि ।७।१। विसर्जनीयः ।१।१। (खरवसानयोर्विसर्जनीयः
से) । अर्थः—(सुपि) सप्तमी का बहुवचन 'सुप्' प्रत्यय परे होने पर (रोः) रुँ के
स्थान पर (विसर्जनीयः) विसर्जनीय आदेश हो । सुप् परे होने पर रुँ (र्) के स्थान
पर विसर्गादेश खरवसानयोः० (६३) सूत्र से ही सिद्ध है, पुनः इस का आरम्भ नियमार्थ
ही है—सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः । अर्थात् सुप् परे होने पर रुँ के रेफ को ही विसर्ग
आदेश हो अन्य रेफ को न हो ।
१. न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् (२.३.६९) इत्यादिषु तु तृन् इति प्रत्याहारस्येष्ट-
त्वाद् णत्वाभावो जिघृक्षितरूपविनाशभियेति बोध्यम् ।