सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 380

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६५
ही उकार आदेश होगा। ध्यान रहे कि यहां भी पूर्ववत् दिव् प्रातिपदिक का ही ग्रहण
किया जाता है।
'सुदिव् + भ्याम्' में स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदत्व के कारण
वकार को उकारादेश तथा इको यणचि (१५) से यण् हो—'सुद्युभ्याम्'। इसी प्रकार
भिस्, भ्यस् और सुप् में भी होता है। रूपमाला यथा—
प्र० सुद्यौः सुदिवौ मुदिवः | प० सुदिवः सुद्युभ्याम् सुद्युभ्यः
द्वि० सुदिवम् " " | ष० , सुदिवोः सुदिवाम्
तृ० मुदिवा सुद्युभ्याम् मुद्युभिः | स० मुदिवि " सुद्युषु
च० सुदिवे " सुद्युभ्यः | सं० हे सुद्यौः ! हे सुदिवौ ! हे सुदिवः !
इसी प्रकार प्रियदिव्, अतिदिव् आदि शब्दों के रूप होते हैं।
(यहां वकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
———:: o ::———
अभ्यास (३८)
(१) अनडुह् और विश्ववाह् शब्दों के जस् और शस् में रूप सिद्ध करें।
(२) अनड्वान् और अनड्वन् में, सुदिवोः और सुद्योः में, लिट् और स्निट्
में, मुद्युभ्याम् और धुग्भ्याम् में प्रक्रियासम्बन्धी अन्तर ससूत्र दर्शाएं।
(३) 'सूत्रशाटकन्याय' किसे कहते हैं ? व्याकरण में इस का कहां और कैसे
उपयोग होता है ?
(४) निम्नलिखित वचनों का जहां तक हो सके सोदाहरण विवेचन करें—
१. निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः। २. प्रकल्प्य चापवादविषयं ततः०
३. निरनुबन्धकग्रहणे न० । ४. अपवादो वचनप्रामाण्यात् । ५. इतरे-
तराश्रयाणि कार्याणि न० । ६. कृताकृतप्रसङ्गी यो विधिः स नित्यः ।
७. क्विब्वन्ता विडन्ता विंजन्ता शब्दों धातुत्वं न जहति ।
(५) तुराषाट्, सुद्युभ्याम्, ध्रुक्षु, विश्वौहि, उखास्रद्भ्याम्, स्निक्—इन रूपों
की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें।
(६) (क) चतुरनडुहोः० और सावनडुहः सूत्रों में क्या उत्सर्ग-अपवादभाव है ?
(ख) 'लिट्सु' में तकार को थकार क्यों नही होता ?
(ग) 'सुद्यौः' में औकारादेश करने से पूर्व सुँलोप क्यों नही हो जाता ?
(घ) दिव औत् में 'दिवुँ' धातु का ग्रहण क्यों नहीं रेफ को ही विसर्ग
(ङ) 'मूर्धन्यः' शब्द का क्या विग्रह और क्या अ
(७) १. एकाचो वशो भष्० । २. दादेर्धातोर्घः । ३. इति प्रत्याहारस्येष्ट-
वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः । अभिषेति बोध्यम्।