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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

२६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'क्रोष्टु + आम्' यहां नुट् का तृज्वद्भाव के साथ विप्रतिषेध है अतः प्रकृत-
वार्त्तिक द्वारा पूर्वविप्रतिषेध से नुट् हो नामि (१४६) से दीर्घ करने पर—'क्रोष्टूनाम्' ।
'क्रोष्टु + ङि' (इ) यहां 'इ' यह अजादि तृतीयादि विभक्ति परे है अतः विकल्प
से तृज्वद्भाव हो गया । तृज्वद्भावपक्ष में ऋतो ङि० (२०४) से अर् गुण हो कर
'क्रोष्टरि' रूप बना । तदभावपक्ष में अच्व घे (१७४) से ङि को औ तथा उकार को
अकार कर वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि करने से 'क्रोष्टौ' रूप सिद्ध हुआ ।
'हे क्रोष्टु + सु' । सम्बुद्धि में तृज्वद्भाव के निषेध के कारण तृज्वत्क्रोष्टु (२०३)
प्रवृत्त न हुआ । ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण तथा एङ्घ्रस्वात्० (१३४) द्वारा
सम्बुद्धि के सकार का लोप हो कर 'हे क्रोष्टो' रूप बना । 'हे क्रोष्ट लिखना अशुद्ध
है । 'क्रोष्टु' शब्द की रूपमाला यथा—
प्रथमा क्रोष्टा क्रोष्टारौ क्रोष्टारः
द्वितीया क्रोष्टारम् ,, क्रोष्टून्
तृतीया क्रोष्ट्रा, क्रोष्टुना क्रोष्टुभ्याम् क्रोष्टुभिः
चतुर्थी क्रोष्ट्रे, क्रोष्टवे ,, क्रोष्टुभ्यः
पञ्चमी क्रोष्टुः, क्रोष्टोः ,, ,,
षष्ठी ,, ,, क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्वोः क्रोष्टूनाम्
सप्तमी क्रोष्टरि, क्रोष्टौ ,, ,, क्रोष्टुषु
सम्बोधन हे क्रोष्टो ! हे क्रोष्टारौ ! हे क्रोष्टारः !
अभ्यास (३१)
(१) ऋत उत् में तपर करने का क्या प्रयोजन है ? सविस्तर टिप्पणी करें ।
(२) पूर्वविप्रतिषेध और परविप्रतिषेध किसे कहते हैं ? इन दोनों का वि-
प्रतिषेधे परं कार्यम् इस एक ही सूत्र से कैसे प्रतिपादन किया जाता है ?
(३) रातस्सस्य सूत्र की व्याख्या करते हुए इस बात को स्पष्ट करें कि नियम-
सूत्रों के प्रत्युदाहरण ही वस्तुतः उदाहरण होते हैं ।
(४) किस आन्तर्य के कारण क्रोष्टु शब्द के स्थान पर क्रोष्टृ आदेश हो
जाता है ?
(५) 'हे क्रोष्ट !' प्रयोग के शुद्धाशुद्ध होने का विवेचन करें ।
(६) सूत्रनिर्देशपूर्वक निम्नस्थ प्रयोगों की सिद्धि करें—
१ क्रोष्टु । २ ऋष्ट । ३ क्रोष्टूनाम् । ४ क्रोष्टारौ । ५ भानो ।
६ क्रोष्ट्रा । ७ शम्भव । ८ शम्भो । ९ क्रोष्टा । १० क्रोष्टरि ।
(यहां ह्रस्व उकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
० —

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६६
अब ऊकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का वर्णन किया जाता है—
[लघु०] हूहूः, हूह्वौ, हूह्वः । हूहून् । इत्यादि ॥
व्याख्या—'हूहू' अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है। हाहा हूहूश्चैवमाद्या गन्धर्वास्त्रिदिवौ-
कसाम् इत्यमरः । इस का अर्थ 'गन्धर्व-विशेष' है। इस की रूपमाला यथा—
प्र० हूहूः हूह्वौ हूह्वः† | प० हूह्वः* हूहूभ्याम् हूहूभ्यः
द्वि० हूहूम्@ ,,† हूहून्‡ | प० ,,* हूह्वोः* हूह्वाम्*
तृ० हूह्वा* हूहूभ्याम् हूहूभिः | स० हूह्वि* ,,* हूहूषु
च० हूह्वे* ,, हूहूभ्यः | सं० हे हूहूः! हे हूह्वौ! हे हूह्वः!
† दीर्घाज्जसि च से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो कर इको यणचि से यण् ।
@ यहां अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो जाता है ।
‡ पूर्वसवर्ण-दीर्घ हो कर तस्माच्छसो नः० (१३७) से नत्व हो जाता है ।

  • सर्वत्र इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है ।
    [लघु०] 'अतिचमू'शब्दे तु नदीकार्यं विशेषः । हे अतिचमु ! । अतिचम्वै ।
    अतिचम्वाः । अतिचमूनाम् । अतिचम्वाम् ॥
    व्याख्या—'चमू' शब्द ऊदन्त नित्यस्त्रीलिङ्ग है । इस का अर्थ है—सेना ।
    चमूम् अतिक्रान्तः=अतिचमूः, अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयाया (वा० ५६) इति
    वार्तिकेन समासः । जो सेना को अतिक्रमण (विजय) कर गया हो उस विजेता को
    'अतिचमू' कहते हैं । 'अतिचमू' शब्द की प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च वार्तिक की सहायता से
    यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) सूत्र द्वारा नदीसञ्ज्ञा हो जाती है । अतः नदीकार्य अर्थात्
    सम्बुद्धि में ह्रस्व, ङितों में आट् का आगम, आम् को नुट् आगम और ङि को आम्
    आदेश ये सब कार्य हो जाते हैं । 'अतिचमू' शब्द की समग्र प्रक्रिया बहुश्रेयसी शब्द की
    तरह होती है । केवल ङ्यन्त न होने से सुँ का लोप नहीं होता ।
    'अतिचमू' शब्द की रूपमाला यथा—
    प्रथमा अतिचमूः† अतिचम्वौ अतिचम्वः
    द्वितीया अतिचमूम् ,, अतिचमून्
    तृतीया अतिचम्वा अतिचमूभ्याम् अतिचमूभिः
    चतुर्थी अतिचम्वै† ,, अतिचमूभ्यः
    पञ्चमी अतिचम्वाः‡ ,, ,,
    षष्ठी ,, ‡ अतिचम्वोः अतिचमूनाम् ✓
    सप्तमी अतिचम्वाम्@ ,, अतिचमूपु
    सम्बोधन हे अतिचमु! * हे अतिचम्वौ! हे अतिचम्वः!
    † ङ्यन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) द्वारा सुँलोप नहीं होता ।
    ‡ आण्नद्याः (१६६), आटश्च (१६७), इको यणचि (१५) ।
    ✓ ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् ।
    @ ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८), आण्नद्याः (१६६), आटश्च (१६७), इको
    यणचि (१५) ।
  • अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः (१६५), एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धेः (१३४) ।

२७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] खलपू ॥
व्याख्या—खल पुनातीति खलपू । 'खल' कर्मोपपद पूञ् पवने (क्रया० उ०)
धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'खलपू' शब्द निष्पन्न होता है। झाडू द्वारा खलियान
या स्थान को शुद्ध करने वाले नौकर को 'खलपू' कहते हैं। अथवा दुष्टों को पवित्र
करने वाले को भी 'खलपू' कह सकते हैं। 'खलपू' शब्द में ऊकार 'पू' धातु का अवयव है।
'खलपू + स्' यहां ङ्यन्तादि न होने से सुँलोप नही होता--'खलपू' ।
'खलपू + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर दीर्घाज्जसि च (१६२) से
उस का निषेध हो जाता है। अब इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त होने पर क्विबन्ता
धातुस्थ न जहाति के अनुसार धातु होने से उस का भी बाध कर अचि श्नु-धातु०
(१६६) से उवङ् प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१०) ओः सुपि ।६।४।८३॥
धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्तो यो धातु, तदन्त-
स्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्याद् अचि सुपि । खलप्वौ, खलप्वः ॥
अर्थ —धातु का अवयव संयोग पूर्व में नही जिस उवर्ण के, वह उवर्ण है अन्त
में जिस धातु के वह धातु है अन्त में जिस के, ऐसा जो अनेकाच अङ्ग, उस को यण्
हो अजादि सुँप् परे होने पर ।
व्याख्या—ओ (६।१। अनेकाच ।६।१। असंयोगपूर्वस्य ।६।१। (एरनेकाचोऽ-
संयोगपूर्वस्य से)। धातो ।६।२। अचि ।७।१। (अचि श्नु-धातु० से)। सुंपि । ।७।१।
यण् ।१।१। (इको यण् से)। 'ओ' पद 'उ' शब्द के षष्ठी का एकवचन है। इस का
अर्थ है—उवर्णस्य । 'धातो' पद की आवृत्ति की जाती है। एक 'धातो' पद 'ओ'
का विशेष्य बन जाता है जिस से 'ओ' से तदन्तविधि हो कर 'उवर्णान्तस्य धातो'
ऐसा हो जाता है। दूसरा 'धातो' पद 'असंयोगपूर्वस्य' पद के 'संयोग' अंश के साथ
सम्बद्ध होता है। अङ्गस्य यह अधिकृत है। इस का 'ओर्धातो' (उवर्णान्तस्य धातो)
यह विशेषण है। अत विशेषण से तदन्तविधि हो कर—'उवर्णान्तधात्वन्तस्य अङ्गस्य'
ऐसा अर्थ हो जाता है। 'अनेकाच' पद 'अङ्गस्य' का विशेषण है। 'असंयोगपूर्वस्य'
का 'ओ' के साथ सामानाधिकरण्य है। अर्थ —(धातो, असंयोगपूर्वस्य) धातु का
अवयव संयोग जिस के पूर्व में नही ऐसा (ओ) जो उवर्ण, तदन्त (धातो ) जो धातु,
तदन्त (अनेकाच ) अनेक अचों वाले (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (यण् ) यण् आदेश
हो (अचि) अजादि (सुंपि) सुँप् परे होने पर । तात्पर्य—अजादि सुँप् प्रत्यय परे रहते
उस अनेकाच अङ्ग को यण आदेश होता है जिस के अन्त में उवर्णान्त धातु हो परन्तु
धातु के उवर्ण से पूर्व धातु का अवयव सयोग न हो ।
एरनेकाचोऽसयोगपूर्वस्य (२००) सूत्र का विषय इवर्णान्त धातु है और इस
का विषय उवर्णान्त धातु है। वह प्रत्येक प्रकार के अजादि प्रत्ययो में यण् करता है
और यह केवल अजादि सुँप् म। शेष सब बातें दोनो में समान हैं। दोनो अचि श्नु०
(१६६) के अपवाद हैं।

अजन्तपुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७१
'खलपू+औ' यहां 'पू' उवर्णान्त धातु है, इस के उवर्ण से पूर्व धातु का कोई
अवयव संयोगयुक्त नहीं। अनेकाच् अङ्ग 'खलपू' है इस से परे 'औ' यह अजादि सुँप्
वर्त्तमान है ही। अतः अलोऽन्त्यपरिभाषा की सहायता से प्रकृतसूत्र द्वारा ऊकार को
यण् = वकार हो कर—'खलप्वौ' रूप बना।
नित्यस्त्रीलिङ्गी न होने के कारण 'खलपू' शब्द की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती;
अतः आट् आदि नदीकार्य नहीं होते। सर्वत्र अजादि सुँपों में यण् हो जाता है। रूप-
माला यथा —
प्र० खलपूः खलप्वौ खलप्वः प० खलप्वः खलपूभ्याम् खलपूभ्यः
द्वि० खलप्वम्‡ ,, ,,‡ प० ,, खलप्वोः खलप्वाम्
तृ० खलप्वा खलपूभ्याम् खलपूभिः स० खलप्वि ,, खलपूपु
च० खलप्वे ,, खलपूभ्यः सं० हे खलपूः! हे खलप्वौ! हे खलप्वः!
‡ अम् और शस् में परत्व के कारण ओः सुँपि (२१०) से यण् हो जाता है।
[लघु०] एवं सुल्वादयः ॥
व्याख्या—'खलपू' शब्द के समान ही 'सुलू, उल्लू' आदि शब्दों के रूप होते
हैं। सुष्ठु लुनातीति सुलूः (अच्छी प्रकार से काटने वाला)। उत्कृष्टं लुनातीति उल्लूः
(उत्कृष्ट रीति से काटने वाला)। लूँञ् छेदने (क्र्या० उ०) धातु से कर्त्ता में क्विँप्
प्रत्यय करने से इन की निष्पत्ति होती है। सर्वत्र अजादि सुँपों में यण् (२१०) हो
जाता है। ध्यान रहे कि 'उल्लू' में संयोग धातु का अवयव नहीं, उपसर्ग के तकार
को मिला कर बना है अतः यण् करने में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। इन दोनों
की रूपमाला यथा—
सुलू | उल्लू
प्र० सुलूः सुल्वौ सुल्वः प्र० उल्लूः उल्ल्वौ उल्ल्वः
द्वि० सुल्वम् ,, ,, द्वि० उल्ल्वम् ,, ,,
तृ० सुल्वा सुलूभ्याम् सुलूभिः तृ० उल्ल्वा उल्लूभ्याम् उल्लूभिः
च० सुल्वे ,, सुलूभ्यः च० उल्ल्वे ,, उल्लूभ्यः
प० सुल्वः ,, ,, प० उल्ल्वः ,, ,,
प० ,, सुल्वोः सुल्वाम् प० ,, उल्ल्वोः उल्ल्वाम्
स० सुल्वि ,, सुलूपु स० उल्ल्वि ,, उल्लूपु
सं० हे सुलूः! हे सुल्वौ! हे सुल्वः! सं० हे उल्लूः! हे उल्ल्वौ! हे उल्ल्वः!
[लघु०] स्वभूः। स्वभुवौ। स्वभुवः॥
व्याख्या—स्वस्माद्भवतीति स्वभूः । 'स्व'पूर्वक भू सत्तायाम् (भ्वा० प०)
धातु से क्विँप् प्रत्यय करने पर 'स्वभू' शब्द निष्पन्न होता है। ब्रह्मा को 'स्वभू' कहते हैं।
स्वभू+सुँ = स्वभूः। ङ्यन्तादि न होने से सुँ का लोप नहीं होता।

२७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'स्वभू+औ' इस दशा मे प्रथम 'इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त है। उस
का बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त हुआ। उस का दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो
गया। पुन इको यणचि से यण् प्राप्ति, उस का बाध कर अचि श्नु० (१६६) से उवङ्
आदेश की प्राप्ति, उस का बाध कर ओः सुपि (२१०) से यण् प्राप्त होता है। इम
यण् का न भूसुधियो (२०२) से निषेध हो जाता है। तब पुन उवङ् आदेश हो कर
'स्वभुवौ' रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार आगे अजादि विभक्तियों मे सर्वत्र उवङ् कर
लेना चाहिये। 'स्वभू' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० स्वभूः स्वभुवौ स्वभुवः | प० स्वभुवः स्वभूभ्याम् स्वभूभ्यः
द्वि० स्वभुवम् ,, ,, | ष० ,, स्वभुवोः स्वभुवाम्
तृ० स्वभुवा स्वभूभ्याम् स्वभूभिः | स० स्वभुवि ,, स्वभूसु
च० स्वभुवे ,, स्वभूभ्यः | स० हे स्वभूः ! हे स्वभुवौ ! हे स्वभुवः !
इसी प्रकार स्वयम्भू (ब्रह्मा), आत्मभू (कामदेव) प्रतिभू (जामिन) आदि
शब्दो के रूप होते हैं।
[लघु०] वर्षाभूः ॥
व्याख्या—वर्षासु भवतीति वर्षाभूः (दर्दुरु मेढक)। 'वर्षा'पूर्वक भू सत्तायाम्
(भ्वा० प०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'वर्षाभू' शब्द निष्पन्न होता है। यहा
अजादिया म ओः सुपि (२१०) द्वारा प्राप्त यण् का न भूसुधियो (२०२) से निषेध
हो जाता है। इस पर अग्रिमसूत्र से पुन यण् का विधान करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२११) वर्षाभ्वश्च ।६।४।८४॥
अस्य यण् स्याद् अचि सुंपि। वर्षाभ्वौ। इत्यादि॥
अर्थः—अजादि सुँप् प्रत्यय परे होने पर वर्षाभू शब्द को यण् हो।
व्याख्या—अचि ।७।१। (अचि श्नु० से)। सुपि ।७।१। (ओः सुपि से)। वर्षाभ्वः
।६।१। च इत्यव्ययपदम्। यण् ।१।१। (इणो यण् से)। अर्थ —(अचि) अजादि
(सुपि) सुँप् परे रहते (वर्षाभ्वः) वर्षाभू शब्द के स्थान पर (यण्) यण् हो।
अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य अल् ऊकार को यण् होगा। रूपमाला यथा—
प्र० वर्षाभूः वर्षाभ्वौ वर्षाभ्वः | प० वर्षाभ्वः वर्षाभूभ्याम् वर्षाभूभ्यः
द्वि० वर्षाभ्वम् ,, ,, | ष० ,, वर्षाभ्वोः वर्षाभ्वाम्
तृ० वर्षाभ्वा वर्षाभूभ्याम् वर्षाभूभिः | स० वर्षाभ्वि ,, वर्षाभूसु
च० वर्षाभ्वे ,, वर्षाभूभ्यः | स० हे वर्षाभूः ! हे वर्षाभ्वौ ! हे वर्षाभ्वः !
ध्यान रहे कि नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् आदि कार्य न होंगे।
[लघु०] दृन्भूः ॥
व्याख्या—'दृन्' अव्यय के उपपद होने पर 'भू' धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर
'दृन्भू' शब्द निष्पन्न होता है। दृन्=हिंसा भवते=प्राप्नोतीति दृन्भूः। वर्त्तमान

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७३
उपलब्ध संस्कृत-साहित्य में इस के प्रयोगों के उपलब्ध न होने से इस के अर्थ में बड़ा
विवाद है। कई इस का अर्थ सर्पविशेष वा वज्र करते हैं, कोई इसे वानर वा सूर्यवाची
मानते हैं।
अजादि विभक्तियों में ओः सुँपि (२१०) से प्राप्त यण् का न भूसुधियोः (२०२)
से निषेध हो जाता है। तब अग्रिमवार्त्तिक से पुनः यण् का विधान करते हैं—
[लघु०] वा०—(२०) दृन्करपुनःपूर्वस्य भुवो यण् वक्तव्यः ॥
दृन्भ्वौ । एवं करभूः ॥
अर्थः—अजादि सुँप् परे होने पर दृन्, कर और पुनर् पूर्व वाले 'भू' शब्द के
स्थान पर यण् आदेश करना चाहिये ।
व्याख्या—यह वार्त्तिक वर्षाभ्वश्च (२११) सूत्र पर महाभाष्य में पढ़ा गया
है। दृन्भू, करभू और पुनर्भू शब्दों के ऊकार को यण् हो अजादि सुँप् परे हो तो—यह
इस वार्त्तिक का तात्पर्य है।
'दृन्भू' शब्द को इस वार्त्तिक से अजादि सुँप् में यण् हो जाता है। रूपमाला
यथा—
प्र० दृन्भूः दृन्भ्वौ दृन्भ्वः | प० दृन्भ्वः दृन्भूभ्याम् दृन्भूभ्यः
द्वि० दृन्भ्वम् ” ” | प० ” दृन्भ्वोः दृन्भ्वाम्
तृ० दृन्भ्वा दृन्भूभ्याम् दृन्भूभिः | स० दृन्भ्वि ” दृन्भूषु
च० दृन्भ्वे ” दृन्भूभ्यः | सं० हे दृन्भूः ! हे दृन्भ्वौ ! हे दृन्भ्वः !
इसी प्रकार करभू और पुनर्भू शब्दों के रूप बनते हैं। करे भवतीति करभूः
(नख = नाखून), पुनर्भवतीति पुनर्भूः (पुनः पैदा होने वाला)। कर और पुनर् के
उपपद रहते भू सत्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से क्विँप् प्रत्यय करने पर करभू और
पुनर्भू शब्द निष्पन्न होते हैं। अजादि विभक्तियों में पूर्वोक्त वार्त्तिक से यण् हो जाता
है। रूपमाला यथा—
करभू | पुनर्भू
प्र० करभूः करभ्वौ करभ्वः | प्र० पुनर्भूः पुनर्भ्वौ पुनर्भ्वः
द्वि० करभ्वम् ” ” | द्वि० पुनर्भ्वम् ” ”
तृ० करभ्वा करभूभ्याम् करभूभिः | तृ० पुनर्भ्वा पुनर्भूभ्याम् पुनर्भूभिः
च० करभ्वे ” करभूभ्यः | च० पुनर्भ्वे ” पुनर्भूभ्यः
प० करभ्वः ” ” | प० पुनर्भ्वः ” ”
ष० ” करभ्वोः करभ्वाम् | ष० ” पुनर्भ्वोः पुनर्भ्वाम्
स० करभ्वि ” करभूषु | स० पुनर्भ्वि ” पुनर्भूषु
सं० हे करभूः! हे करभ्वौ! हे करभ्वः! | सं० हे पुनर्भूः! हे पुनर्भ्वौ! हे पुनर्भ्वः!
सूचना—'पुनः व्याही हुई स्त्री' इस अर्थ में 'पुनर्भू' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग होता
है, पुंल्लिङ्ग नहीं। स्त्रीलिङ्ग में इस का उच्चारण सिद्धान्त-कौमुदी में देखना चाहिये ।
ल० प्र० (१८)

२७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अभ्यास (३२)
(१) ‘लुलू +अतुस् = लुलुवतु’ आदि मे ओ. सुंपि से यण् क्यो न हो ?
(२) ‘खलप्वौ, खलप्व’ आदि मे एरनेकाच ० से यण् क्यो नही होता ?
(३) स्वभू, वर्षाभू, आत्मभू, करभू, खलपू, अतिचमू और हूहू शब्दो के
द्वितीया तथा सप्तमी के एकवचन में रूप सिद्ध करें ।
(४) उवङ् आदेश ओ सुंपि के यण् का बाधक है या इको यणचि के यण्
का ? सप्रमाण स्पष्ट करें ।
(५) एरनेकाच० सूत्र की अपेक्षा ओ. सुंपि सूत्र में क्या विशेषता है ?
(६) ओ. सुंपि सूत्र का सोदाहरण विवेचन करें ।
(यहाँ दीर्घ ऊकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
— ० —
अथ ऋकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दा का वर्णन करते हैं —
[लघु०] धाता । हे धातः । धातारौ । धातारः ॥
व्याख्या—डुधाञ् धारण-पोषणयो (जुहो० उ०) धातु से कर्त्ता में तृन् वा तृच्
प्रत्यय करने पर ‘धातृ’ शब्द निष्पन्न होता है । दधातीति धाता, धारण पोषण करने
के कारण परमात्मा का नाम ‘धातृ’ है ।
‘धातृ’ शब्द के रूप प्रायः क्रोष्टृ शब्द के समान बनते हैं । तथाहि—
सुं में ऋदन्त होने से ऋदुशनस्० (२०५) सूत्र से अनङ् आदेश, अप्तृन्तृच्०
(२०६) से उपधादीर्घ, हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप और न
लोप ० (१८०) से नकार का लोप हो कर ‘धाता’ रूप बनता है ।
सम्बुद्धि में ‘ह धातृ + स्’ इस दशा में अनङ् आदेश नहीं होता । ऋतो ङिसर्व-
नामस्थानयो (२०४) में ऋकार के स्थान पर गुण = अर् हो, सुँलोप और रेफ को
विसर्ग करने से—‘हे धातः’ रूप सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि सम्बुद्धि में निषेध
के कारण उपधादीर्घ नहीं होता ।
विशेष—धातर्देहि, धातर्यच्छ, धातख इत्यादि स्थानों पर रुँ का रेफ न होने
से हशि च (१०७) आदि से उत्व न होगा । अतः ‘धातो देहि, धातो यच्छ, धातोऽव’
आदि लिखना अशुद्ध है । ‘धाता रक्ष’ इत्यादि स्थानों पर रो रि (१११) से रेफ-
लोप तथा ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण (११२) से पूर्व अण् को दीर्घ तो हो ही जायेगा ।
प्रथमा के द्विवचन में ‘धातृ + औ’ यहां ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः (२०४)
से ऋकार को अर् गुण तथा अप्तृन्तृच्० (२०६) से उपधादीर्घ हो कर—धातार् +
औ = धातारौ । इसी प्रकार जस्, अम् और औट् में—‘धातारः, धातारम्, धातारौ’
रूप सिद्ध होते हैं ।
द्वितीया के बहुवचन ‘धातृ + अस्’ (शस्) में सर्वनामस्थान न होने से ऋतो
ङिसर्वनामस्थानयो (२०४) द्वारा गुण नहीं होना । पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७५
नकार आदेश हो जाता है—धातॄन् । यहां पदान्तस्य (१३६) से णत्व का निषेध
समझना चाहिये ।
तृतीया के एकवचन 'धातृ + आ' (टा) में इको यणचि (१५) से यण् हो
जाता है—धातृ + आ = 'धात्रा' । भ्याम्, भिस् और भ्यस् में कुछ परिवर्तन नहीं
होता—धातृभ्याम् धातृभिः, धातृभ्यः ।
चतुर्थी के एकवचन 'धातृ + ए' (ङे) में भी इको यणचि (१५) से यण् हो
कर—धातृ + ए = 'धात्रे' ।
पञ्चमी वा षष्ठी के एकवचन 'धातृ + अस्' (ङसिँ वा ङस्) में ऋत उत्
(२०८) द्वारा पूर्व + पर के स्थान पर उर् एकादेश हो कर सकार का संयोगान्तलोप
तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने से 'धातुः' प्रयोग सिद्ध होता है ।
धातृ + ओस् = 'धात्रोः' [इको यणचि (१५)] ।
षष्ठी के बहुवचन में ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम तथा नामि
(१४६) से दीर्घ करने पर—धातृ + नाम् । अब यहां रेफ या षकार न होने के
कारण रषाभ्यां नो णः समानपदे (२६७) से णत्व प्राप्त नहीं हो सकता । अतः इस
के लिये अग्रिम वार्त्तिक का अवतरण करते हैं—
[लघु०] वा०—(२१) ऋवर्णान्निस्य णत्वं वाच्यम् ॥
धातॄणाम् ॥
अर्थः—णत्वप्रकरण में ऋवर्ण से परे भी नकार को णकार कहना चाहिये ।
व्याख्या—यह वार्त्तिक सम्पूर्ण णत्वविधायक सूत्रों का शेष समझना चाहिये ।
अतः प्रत्येक णत्वविधायक सूत्र में इस की प्रवृत्ति होती है । इस से जिस २ व्यव-
धान या नियम के अधीन रेफ या षकार से परे णत्व करना कहा गया है वहां २ सर्वत्र
ऋवर्ण से परे का भी सङ्ग्रह कर लेना चाहिये—यह इस वार्त्तिक का तात्पर्य है ।
'धातृ + नाम्' यहां ऋवर्ण से परे इस वार्त्तिक की सहायता से रषाभ्यां नो णः
समानपदे (२६७) सूत्र द्वारा नकार को णकार हो कर 'धातॄणाम्' प्रयोग सिद्ध
होता है ।
सप्तमी के एकवचन में ऋतो ङि० (२०४) से गुण हो कर—'धातरि' ।
सुप् में आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व हो 'धातृषु' सिद्ध होता है ।
'धातृ' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० धाता धातारौ धातारः | प० धातुः धातृभ्याम् धातृभ्यः
द्वि० धातारम् ,, धातॄन् | ष० ,, धात्रोः धातॄणाम्
तृ० धात्रा धातृभ्याम् धातृभिः | स० धातरि ,, धातृषु
च० धात्रे ,, धातृभ्यः | सं० हे धातः! हे धातारौ! हे धातारः!
निम्नलिखित शब्दों के रूप भी इसी तरह होते हैं—
१. ध्यान रहे कि आम् में सब ऋदन्तों को णत्व हो जाता है अतः चिह्न नहीं लगाया ।

४. समास प्रकरण (अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व व बहुव्रीहि)

२७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ
अध्येतृ = पढ़ने वाला | बोद्धृ = जानने वाला
कथयितृ = कहने वाला | भर्तृ = स्वामी या पति
कर्तृ = करने वाला | भेत्तृ = तोड़ने वाला
क्रेतृ = खरीदने वाला | भोक्तृ = खाने वाला
क्षत्तृ = सारथि या द्वारपाल | योद्धृ = युद्ध करने वाला
खनितृ = खोदने वाला | रक्षितृ = रक्षा करने वाला
गणयितृ = गिनने वाला | रचयितृ = रचने वाला
गन्तृ = जाने वाला | वक्तृ = बोलने वाला
ग्रहीतृ = ग्रहण करने वाला | वसितृ = पहनने वाला
छेत्तृ = काटने वाला | वस्तु = रहने वाला
जेतृ = जीतने वाला | विक्रेतृ = बेचने वाला
ज्ञातृ = जानने वाला | वेत्तृ = जानने वाला
तरितृ = तैरने वाला | वोढृ = उठाने वाला
त्रातृ = बचाने वाला | शङ्कितृ = शङ्का करने वाला
त्वष्टृ = विश्वकर्मा | शमयितृ = शान्त करने वाला
दातृ = देने वाला | शयितृ = सोने वाला
दोग्धृ = दोहने वाला | शामितृ = शान्त करने वाला
द्रष्टृ = देखने वाला | श्रोतॄ = सुनने वाला
धर्तृ = धारण करने वाला | मवितृ = सूर्य या प्रेरक
ध्यातृ = ध्यान करने वाला | सान्त्वयितृ = सान्त्वना देने वाला
नप्तृ = पोता या दोहता | सोढृ = सहन करने वाला
नेतृ = नेता या सञ्चालक | स्खलितृ = स्खलित होने वाला
नेष्टृ = ऋत्विग्विशेष | स्तोतृ = स्तुति करने वाला
पक्तृ = पकाने वाला | स्थातृ = ठहरने वाला
पठितृ = पढ़ने वाला | स्नातृ = स्नान करने वाला
पातृ = रक्षक या पीने वाला | स्मर्तृ = स्मरण करने वाला
पूजयितृ = पूजने वाला | स्रष्टृ = पैदा करने वाला
पोतृ = ऋत्विग्विशेष | हन्तृ = मारने वाला
प्रशास्तृ = ऋत्विग् या राजा | हर्तृ = हरने वाला
प्रष्टृ = पूछने वाला | होतृ = यज्ञ करने वाला
[लघु०] एवं नप्तृरादयः ॥
व्याख्या—नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ शब्दों के रूप भी
धातृ शब्द के समान होंगे। सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर अप्तृन्तृच्० (२०६)

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७७
सूत्र में विशेष उल्लेख के कारण इन की उपधा को दीर्घ हो जायेगा—नप्ता, नप्तारौ,
नप्तारः । नप्तारम्, नप्तारौ इत्यादि ।
नप्तृ, नेष्टृ आदि शब्द औणादिक तृन्नन्त वा तृजन्त हैं । उणादियों में तीन
सूत्रों द्वारा प्रायः बीस शब्द तृन्नन्त या तृजन्त सिद्ध किये गये हैं । तथाहि—
(क) तृन्तृचौ शंसिक्षदादिभ्यः संज्ञायां चानिटौ (उणा० २५०)।
(१) शंस् + तृन् = शंस्तृ [यह ऋत्विग् या भाट की सञ्ज्ञा है] ।
(२) शास् + तृन्¹ = शास्तृ [यह ऋत्विग् या भगवान् बुद्ध की सञ्ज्ञा है] ।
(३) क्षद् + तृच्² = क्षत्तृ [सारथि, द्वारपाल, वैश्या में शूद्र से उत्पन्न] ।
(४) क्षुद् + तृच् = क्षोत्तृ [मुसल] ।
(५) प्रशास् + तृच् = प्रशास्तृ [ऋत्विग् वा राजा] ।
(६) उद् नी + तृच् = उन्नेतृ [ऋत्विग्] ।
(७) प्रति हृ + तृच् = प्रतिहर्तृ [ऋत्विग्] ।
(८) उद् गा + तृच् = उद्गातृ [यज्ञ में साम का गान करने वाला] ।
(ख) बहुलमन्यत्रापि (उणा० २५१)।
(६) हन् + तृच् = हन्तृ [चोर वा डाकू] ।
(१०) मन् + तृच् = मन्तृ [विद्वान्] ।
(ग) नप्तृ-नेष्टृ-त्वष्टृ-होतृ-पोतृ-भ्रातृ-जामातृ-मातृ-पितृ-दुहितृ (उणा०२५२)।
(११) नप्तृ [पौत्र, दौहित्र । तृन्नन्त वा तृजन्त निपातित है] ।
(१२) नेष्टृ [ऋत्विग्विशेष । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
(१३) त्वष्टृ [विश्वकर्मा । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
(१४) होतृ [ऋत्विग् । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
(१५) पोतृ [ऋत्विग्विशेष । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
(१६) भ्रातृ [भाई । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
(१७) जामातृ [दामाद । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
(१८) मातृ [माता । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
(१६) पितृ [पिता । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
(२०) दुहितृ [लड़की, पुत्री । ,, ,, ,, ,, ,, ] ।
इस प्रकरण में प्रतिप्रस्थातृ, प्रस्तोतृ, दस्तृ³, शस्तृ और अप्तृ⁴ इतने शब्द
१. तत्त्वबोधिनीकारा ज्ञानेन्द्रस्वामिनोऽन्ये च उज्ज्वलदत्तप्रभृतयो वृत्तिकृतोऽत्र
तृन्प्रत्ययमेवाहुः, परं भाष्यमर्मविन्नागेशस्त्वत्र तृचमेवाभिदधाति । दृश्यतामत्रत्यः
शेखरः ।
२. क्षदिः सौत्रो धातुः । शकलीकरणे भक्षणे चेति दीक्षितः ।
३. दस्ता क्षयकृत् इति प्रक्रियासर्वस्वे नारायणभट्टः । न क्वाप्यन्यत्रायं शब्दोऽवलोक्यते ।
४. महाराज भोजदेव ने आपो ह्रस्वश्च इस प्रकार सूत्र बना कर 'अप्तृ' शब्द सिद्ध

२४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अधिक अन्यत्र देखे जाते हैं। उपदेष्टृ और धातृ शब्दा को भी यहां उज्ज्वलदत्त ने
अपनी उणादिवृत्ति में गिन रखा है। सरस्वतीकण्ठाभरणकार धारेश्वर भोज, दण्ड-
नारायण, प्रक्रियासर्वस्वकार नारायणभट्ट, प्रक्रियाकौमुदी की प्रसादटीका के रचयिता
विट्ठलाचार्य और दुर्गसिंह प्रभृति इन का उल्लेख नहीं करते।
विशेष—स्वसृ, यातृ, देवृ, ननान्दृ, नृ और सव्येष्टृ ये छ शब्द भी यद्यपि
औणादिक हैं तथापि ये ऋप्रत्ययान्त हैं, तृन्नन्त वा तृजन्त नहीं। अत इन के दीर्घ या
दीर्घाभाव का यहां प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। इन में से स्वसृ शब्द का ही सूत्र में
ग्रहण है अत उसे ही उपधादीर्घ होगा अन्य किसी ऋप्रत्ययान्त शब्द को नहीं।
शङ्का—यदि नप्तृ, नेष्टृ आदि सातो शब्द पूर्वोक्तरीत्या तृन्नन्त वा तृजन्त हैं
तो इन की उपधा को दीर्घ अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ इतने से ही सिद्ध हो सकता है, क्योंकि
सूत्र में तृन् और तृच् को दीर्घ कहा ही है। पुन सूत्र में इन के पृथक् उल्लेख का
क्या कारण है ?
समाधान—इस प्रकार सिद्ध होने पर सूत्र में इन के पुन ग्रहण का एक
महत्त्वपूर्ण प्रयोजन है। ग्रन्थकार के शब्दा में ही देखिये—
[लघु०] नप्त्रादीनां ग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्। तेनेह न—पिता, पितरौ,
पितरः। पितरम्। शेषं धातृवत्। एवं जामात्रादयः। ना। नरौ॥
अर्थ—नप्तृ आदि तृन्नन्त वा तृजन्त शब्दो का ग्रहण व्युत्पत्तिपक्ष में नियम के
लिये है। अर्थात् यदि व्युत्पत्तिपक्ष में औणादिक शब्दो को तृन्नन्त वा तृजन्त समझा
जाये तो नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ इन सात शब्दो की उपधा
को ही अप्तृन् तृच्० सूत्र से दीर्घ हो अन्य किसी औणादिक तृन्नन्त वा तृजन्त की उपधा
को दीर्घ न हो। उणादिनिष्पन्नानां तृन्तृजन्तानां दीर्घश्चेद् ? नप्त्रादीनामेव, न तु पित्रा-
दीनामिति नियमोऽत्र बोध्यः।
व्याख्या—कुछ लोग औणादिक शब्दों को व्युत्पन्न और कुछ अव्युत्पन्न मानते
हैं। अव्युत्पन्न मानने वालों के पक्ष में नप्तृ आदि शब्दो में न कोई धातु और न कोई
प्रत्यय माना जाता है। अतः उन के मत में अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ इतने सूत्रमात्र से काम
नहीं चल सकता। उन के मत में नप्तृ, नेष्टृ आदि शब्दो का उपधादीर्घविधानार्थ
ग्रहण करना आवश्यक है ही।
अब रहे व्युत्पत्तिपक्ष वाले, ये लोग औणादिक शब्दो में प्रकृति, प्रत्यय, आगम,
विकार और आदेश आदि सब यथावत् मानते हैं। नप्तृ आदि शब्दो को ये लोग
किया है। दण्डनारायण ने अपनी वृत्ति में 'अप्तृ' का अर्थ 'यज्ञ' किया है। वर्त्त-
मान उपलब्ध संस्कृत-साहित्य में इस का पता नहीं चलता। परन्तु 'अप्तोर्याम,
अप्तोर्यामन्' यादि शब्दों के देखने से प्रतीत होता है कि यज्ञ अर्थ में इस का कही
प्रयोग अवश्य हुआ होगा। इसी प्रकार 'चोर' आदि अर्थों में 'हन्तृ' शब्द के
प्रयोग भी अन्वेषणीय हैं।

अजन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७६
तृन्नन्त वा तृजन्त मानते हैं । अतः इन के मत में 'अप्सृन्तृच्स्वसृ' इतने मात्र से ही
दीर्घ सिद्ध हो सकता है । इस लिये इन के मत में इन शब्दों का सूत्र में ग्रहण व्यर्थ
हो जाता है । इस पर ग्रन्थकार यह उत्तर देते हैं कि इन का ग्रहण नियम के लिये है ।
अभिप्राय यह है कि आचार्य पाणिनि को यहां तृन्-तृच् प्रत्ययों से अष्टाध्यायीस्थ तृन्-
तृच् प्रत्ययों का ही ग्रहण अभीष्ट है औणादिक तृन्-तृच् प्रत्ययों का नहीं अत एव
उन्होंने नप्तृ-नेष्टृ आदि सात औणादिक तृन्नन्त तृजन्त शब्दों का पृथक् उल्लेख किया
है । यदि आचार्य की दृष्टि में वे भी तृन्नन्त तृजन्त होते तो आचार्य इन का पृथक्
उल्लेख न करते । इस से इस नियम की उपलब्धि हुई कि औणादिक तृन्नन्त तृजन्त
शब्दों को यदि उपधादीर्घ करना हो तो केवल नप्तृ आदि सात शब्दों को ही हो, अन्य
किसी शब्द को नहीं ।
तात्पर्य यह है कि नप्तृ, नेष्टृ आदि सात औणादिक तृन्नन्त तृजन्त शब्दों के
अतिरिक्त अन्य किसी औणादिक तृन्नन्त, तृजन्त शब्द की उपधा को दीर्घ न होगा ।
सूत्रगत 'तृन्, तृच्' से अष्टाध्यायीस्थ तृन्नन्त तृजन्त शब्दों का ग्रहण हो कर केवल उन
की उपधा को ही दीर्घ होगा ।
ऋकारान्त औणादिक शब्द

(उपधादीर्घ हो जाता है)(उपधादीर्घ नहीं होता)
१. नप्तृ । २. नेष्टृ । ३. त्वष्टृ । ४. क्षत्तृ । ५. होतृ । ६. पोतृ । ७. प्रशास्तृ । ८. उद्गातृ । ९. स्वसृ ।<br>[यद्यपि सूत्र में 'उद्गातृ' का उल्लेख नहीं तथापि भाष्यकार के उद्गातारः (२.१.१ पर) प्रयोग से इसे भी उपधादीर्घ हो जाता है]१. शंस्तृ । २. शास्तृ । ३. क्षोत्तृ । ४. उन्नेतृ । ५. प्रतिहर्तृ । ६. हन्तृ । ७. मन्तृ । ८. प्रतिप्रस्थातृ । ९. प्रस्तोतृ । १०. दस्तृ । ११. शस्तृ । १२. अप्तृ । १३. भ्रातृ । १४. जामातृ । १५. मातृ । १६. पितृ । १७. दुहितृ । १८. नृ । १६. यातृ । २०. देवृ । २१. ननान्दृ । २२. सव्येष्टृ ।

औणादिक ऋदन्त पितृ (पिता) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० पिता पितरौ पितरः प० पितुः पितृभ्याम् पितृभ्यः
द्वि० पितरम् ,, पितॄन् ष० ,, पित्रोः पितॄणाम्
तृ० पित्रा पितृभ्याम् पितृभिः स० पितरि ,, पितृषु
च० पित्रे ,, पितृभ्यः सं० हे पितः! हे पितरौ! हे पितरः!


१. यदि इन शब्दों में कहीं अष्टाध्यायीस्थ तृन्नन्त वा तृजन्त मानेंगे तो तब दीर्घ हो
जायेगा । निषेध केवल औणादिकों के लिये ही है । यथा—माता (मापने वाला),
मातारौ, मातारः । हन्ता (मारने वाला), हन्तारौ, हन्तारः । मन्ता (मनन
करने वाला), मन्तारौ, मन्तारः ।

२६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'धातृ' शब्द के समान होती है। केवल सर्वनामस्थान
में उपधादीर्घ का अभाव होता है। सुँ में सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधा-
दीर्घ हो जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त शस्तृ, जामातृ आदि शब्दों के उच्चारण होते हैं।
निदर्शनार्थ 'भ्रातृ' शब्द का उच्चारण यथा—
प्र० भ्राता भ्रातरौ भ्रातरः | प० भ्रातुः भ्रातृभ्याम् भ्रातृभ्यः
द्वि० भ्रातरम् ,, भ्रातॄन् | ष० ,, भ्रात्रोः भ्रातॄणाम्
तृ० भ्रात्रा भ्रातृभ्याम् भ्रातृभिः | स० भ्रातरि ,, भ्रातृषु
च० भ्रात्रे ,, भ्रातृभ्यः | सं० हे भ्रातः ! हे भ्रातरौ ! हे भ्रातरः !
पूर्वोक्त उपधादीर्घाभाव वाले औणादिक शब्दों में 'मातृ, दुहितृ, ननान्दृ और
यातृ' ये चार शब्द स्त्रीलिङ्गी हैं अतः इन का विवेचन आगे अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में
किया जायगा।
अब नृ (मनुष्य) शब्द का वर्णन करते हैं। णीञ् प्रापणे (भ्वा० उ०) इत्य-
स्माद् नयेर्डिडिच्व (उणा० २।५७) इति ऋप्रत्यये डित्त्वाट् टिलोपं च कृत नृशब्द
सिध्यति । नयति कार्याणीति ना=पुरुषो नेता वा। नृशब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया पितृ
शब्द के समान होती है। सर्वनामस्थान में इस उपधादीर्घ नहीं हुआ करता। षष्ठी के
बहुवचन में यहां केवल अन्तर हुआ करता है—
'नृ+आम्' इस दशा में ह्रस्व को नुट् का आगम हो कर 'नृ+नाम्'। अब
नामि (१४६) से नित्य दीर्घ प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र विकल्प करता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१२) नृ च ।६।४।६॥
अस्य नामि वा दीर्घः । नॄणाम् । नृणाम् ॥
अर्थ—नाम् परे हो तो 'नृ' शब्द के ऋकार को विकल्प कर के दीर्घ हो।
व्याख्या—नृ ।६।१। (यहां षष्ठी का लुक् समझना चाहिये)। च इत्यव्य-
पदम् । उभयथा इत्यव्ययपदम् (छन्दस्युभयथा से) । दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे० से) ।
नामि ।७।१। (नामि स) । अर्थ—(नामि) नाम् परे होने पर (नृ) नृशब्द के स्थान
पर (उभयथा) विकल्प कर के (दीर्घः) दीर्घ आदेश हो जाता है। अचश्च (१।२।२८)
परिभाषा द्वारा ऋवर्ण को ही दीर्घ होगा।
'नृ+नाम्' यहां प्रकृतसूत्र से वैकल्पिक दीर्घ हो कर दोनों पक्षों में ऋवर्णा-
न्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) वार्त्तिक की सहायता से रषाभ्यां नो णः समानपदे
(२६७) सूत्र से णत्व हो कर 'नॄणाम्' और 'नृणाम्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
नृशब्द की रूपमाला यथा—
प्र० ना नरौ नरः | प० नुः नृभ्याम् नृभ्यः
द्वि० नरम् ,, नॄन् | ष० ,, न्रोः नॄणाम्, नृणाम्
तृ० न्रा नृभ्याम् नृभिः | स० नरि ,, नृषु
च० न्रे ,, नृभ्यः | सं० हे न ! हे नरौ ! हे नरः !

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २८१
नोट—'नरो गच्छन्ति' इत्यादि वाक्यों में अकारान्त 'नर' शब्द का प्रयोग
नहीं, इसी नृशब्द के प्रथमा के बहुवचन का प्रयोग है अतः वाक्य शुद्ध है।
विशेष—इस शब्द पर दो श्लोक बहुत प्रसिद्ध हैं—
लक्ष्म्या वै जायते भानुः, सरस्वत्यापि जायते।
अत्र षष्ठीपदं गुप्तं, यो जानाति स पण्डितः ॥१॥
[भा=कान्तिः, नुः=पुरुषस्य।]
एकोना विंशतिः स्त्रीणां स्नानार्थं सरयूं गता।
विंशतिः पुनरायाता, एको व्याघ्रेण भक्षितः ॥२॥
[एकोना इति विंशतेर्विशेषणेन विरोधः, एको ना=नर इति परिहारः।]
अभ्यास (३३)
(१) (क) 'नॄन्' मे नकार को णकार क्यों नही होता ?
(ख) 'ऋ' और 'ॡ' शब्दों का उच्चारण लिखें।
(ग) 'धातर्देहि, पितरत्र, नगंगच्छ' इत्यादि में उत्व क्यों नही होता ?
(घ) नृ च यहां 'नृ' में कौन सी विभक्ति है ?
(ङ) औणादिक तृजन्त होने पर भी 'उद्गातृ' शब्द को क्यों उपधादीर्घ
हो जाता है ?
(२) इन शब्दों में उपधादीर्घ कहां करना चाहिये और कहां नहीं ?
१. श्रोतृ । २. पोतृ । ३. दातृ । ४. नेतृ । ५. प्रशास्तृ । ६. हन्तृ ।
७. उद्गातृ । ८. भ्रातृ । ६. सवितृ । १०. जामातृ । ११. स्तोतृ ।
१२. नेष्टृ । १३. नृ । १४. त्वष्टृ । १५. पितृ ।
(३) नप्त्रादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम् इस पङ्क्ति का भाव स्पष्ट करते
हुए यह लिखें कि इस का रूपसिद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
(४) मातृ और हन्तृ शब्द यदि औणादिक न मान कर अष्टाध्यायी के तृच्
प्रत्यय से निष्पन्न मानें तो रूपमाला में क्या अन्तर होगा ?
(५) क्या व्यवधान में ऋवर्णान्निस्थ णत्वं वाच्यम् से णत्व हो जायेगा ?
(६) शतृशब्द का सुं, ङस्, ङि में क्या रूप बनेगा ?
(यहां ऋदन्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
-::-०-::-
संस्कृतसाहित्य में ॡदन्त, लृदन्त और एदन्त ऐसा कोई प्रसिद्ध शब्द नहीं जिस
का बालकों के लिये वर्णन करना उपयोगी हो; अतः ग्रन्थकार ओकारान्त पुंल्लिङ्ग
'गो' शब्द का वर्णन करते हैं—
[लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(२१३) गोतो णित् ।७।१।६०॥
ओकाराद् विहितं सर्वनामस्थानं णिद्वत् । गौः, गावौ, गावः ॥
अर्थः—ओकारान्त शब्द से विधान किया हुआ सर्वनामस्थान णिद्वत् हो।

२८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
व्याख्या—गोतः ५।१। सर्वनामस्थानम् १।१। (इतोऽत् सर्वनामस्थाने से
विभक्तिविपरिणाम द्वारा) । णित् १।१। यह अतिदेशसूत्र है, अतः 'णित्' का तात्पर्य
होगा—णिद्वत् । अर्थात् जो २ कार्य णित् के परे होने से होते हैं वे सब सर्वनामस्थान
के परे होने पर भी हो जायेंगे । यहां पर कात्यायनजी ने दो वार्तिक लिखे हैं । (१)
ओतो णिद् इति वाच्यम् । (२) विहितविशेषणञ्च । इन का अभिप्राय यह है कि—
यदि केवल गोशब्द से परे ही सर्वनामस्थान णित् हो तो 'सुद्यो' शब्द से—'सुद्यौः,
सुद्यावौ, सुद्यावः' ये रूप सिद्ध न हो सकेंगे । अतः सूत्र में 'गोतः' पद को हटा कर
उस के स्थान पर 'ओतः' यह सामान्यनिर्देश करना ही उचित है । परन्तु केवल उस
'ओतः' से भी पूरा काम नहीं चल सकता, क्योंकि तब 'हे भानो + सु, हे वायो + सु'
इत्यादि स्थानों पर भी णिद्वत् हो कर वृद्धि आदि अनिष्ट प्रसक्त होगा । अतः यहां
'विहितम्' यह भी 'सर्वनामस्थानम्' का विशेषण कर देना चाहिये । 'हे वायो + सु,
हे भानो + सु' आदि प्रयोगों में सर्वनामस्थान, ओकारान्त से विधान नहीं किया गया
अपितु भानु, वायु आदि उकारान्त शब्दों से विधान किया गया है । अतः णिद्भाव
न होने से कोई दोष नहीं आता । अर्थ—(गोतः = ओतः) ओकारान्त से (विहितम्,
सर्वनामस्थानम्) विधान किया हुआ सर्वनामस्थान (णित्) णिद्वत् होता है ।
'गो + स्' (सुँ) यहां ओकारान्त शब्द 'गो' है, इस से विहित सर्वनामस्थान
'सुँ' है । अतः प्रकृतसूत्र से सर्वनामस्थान णिद्वत् हुआ । णिद्वत् होने पर अचो ञ्णिति
(१९२) सूत्र से गो के अन्त्य ओकार को औकार वृद्धि हो कर रुत्व-विसर्ग करने से
'गौः' प्रयोग सिद्ध हुआ ।
प्रथमा और द्वितीया के द्विवचन में 'गो + औ' इस दशा में प्रकृतसूत्र से णिद्वत्,
अचो ञ्णिति (१९२) से औकार वृद्धि और औकार को एचोऽयवायावः (२२) से
आव् आदेश हो कर 'गावौ' प्रयोग सिद्ध हुआ ।
जस् में भी इसी तरह णिद्वत्, वृद्धि और आव् आदेश हो कर 'गावः' बना ।
'गो + अम्' यहां गोतो णित् (२१३) से णिद्भाव प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१४) औतोऽम्शसोः।६।१।९३॥
ओतोऽम्शसोरचि आकार एकादेशः। गाम्, गावौ, गाः । गवा । गवे ।
गोः २ । इत्यादि ॥
अर्थः—ओकार से अम् या शस् का अच् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर
आकार एकादेश हो ।
व्याख्या—आः १।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। ओतः ५।१। अम्शसोः
।६।२। अचि ।३।१। (इको यणचि से) । पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-
परयोः यह अधिकृत है)। अर्थ—(ओतः) ओकार से (अम्शसोः) अम् वा शस् का
(अचि) अच् परे हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (आ) आकार (एकः)
एकादेश हो ।

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २८३
'गो+अम्' यहां ओकार से परे अम् का अच् वर्त्तमान है; अतः प्रकृतसूत्र से
ओकार और अकार के स्थान पर आकार एकादेश हो कर 'गाम्' रूप सिद्ध हुआ।
'गो+अस्' (शस्) यहां भी प्रकृतसूत्र से आकार एकादेश हो रुत्व विसर्ग
करने से 'गाः' रूप बनता है। ध्यान रहे कि आकार पूर्वसवर्णदीर्घघटित नहीं अतः
तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) से सकार को नकार न होगा।
तृतीया और चतुर्थी के एकवचन में एचोऽयवायावः (२२) से अव् आदेश हो
कर क्रमशः 'गवा' और 'गवे' बना।
पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप हो—
'गोः'। पदान्त न होने से (४३) द्वारा पूर्वरूप नहीं होता। गोशब्द की रूपमाला यथा—
गो=बैल [गमेर्डोः (उणा० २२५)]
प्र० गोः गावौ गावः प० गोः गोभ्याम् गोभ्यः
द्वि० गाम् ,, गाः ष० ,, गवोः गवाम्
तृ० गवा गोभ्याम् गोभिः स० गवि ,, गोषु
च० गवे ,, गोभ्यः सं० हे गौः ! हे गावौ ! हे गावः!
(यहां ओकारान्त पुलिंङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:०:—
अब ऐकारान्त पुलिंङ्ग 'रै' शब्द का वर्णन करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१५) रायो हलि ।७।२।८५॥
अस्याकारादेशो हलि विभक्तौ। राः, रायौ, रायः। राभ्यामित्यादि ॥
अर्थः—हलादि विभक्ति परे होने पर रै शब्द के ऐकार को आकार आदेश हो।
व्याख्या—रायः ।६।१। आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। हलि ।७।१।
विभक्तौ ।७।१। 'हलि' पद 'विभक्तौ' पद का विशेषण है, अतः तदादिविधि हो कर
'हलादौ विभक्तौ' बन जायेगा। अर्थः—(हलि=हलादौ) हलादि (विभक्तौ) विभक्ति
परे होने पर (रायः) रै शब्द के स्थान पर (आ) आकार आदेश होता है। अलो-
ऽन्त्यपरिभाषा से 'रै' के अन्त्य ऐकार को आकार होगा।
रा दाने (अदा० प०) धातु से रातेर्डैः (उणा० २२४) सूत्र द्वारा डै प्रत्यय
कर टिलोप करने से 'रै' शब्द निष्पन्न होता है। राति=ददाति श्रेयोऽर्थं वा पात्रेभ्य
इति राः। रायते=दीयते इति रा इति वा। धन, सूर्य या सुवर्ण को 'रै' कहते हैं।
सुं, भ्याम् ३, भिस्, भ्यस् २, सुप्—ये आठ हलादि विभक्तियां हैं। इन में
प्रकृतसूत्र से रै को आकार आदेश हो जायेगा। अन्यत्र अजादियों में एचोऽयवायावः
(२२) से ऐकार को आय् आदेश होगा। रूपमाला यथा—
प्र० राः रायौ रायः तृ० राया राभ्याम् राभिः
द्वि० रायम् ,, ,, च० राये ,, राभ्यः

२८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
प० राय् राभ्याम् राभ्यः । स० रायि रायोः रासु
ष० ,, रायोः रायाम् । सम्० हे राः । हे रायौ । हे रायः ।
(यहां ऐकारान्त पुल्लिंग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
०
[लघु०] ग्लौः । ग्लावौ । ग्लावः । ग्लौभ्यामित्यादि ॥
व्याख्या—म्लै हर्षक्षये (भ्वा० प०) धातु से ग्ला-म्नोर्डिच्च डो (उणा० २२२)
सूत्र द्वारा डो प्रत्यय कर टिलोप करने से ग्लौ शब्द निष्पन्न होता है। ग्लायंति=
कमलस्य चौरादीना वा हर्षक्षयं करोति (अन्तर्भावितण्यर्थ) इति ग्लौ =चन्द्रः।
ग्लौर्मृगाङ्कः कलानिधिरित्यमरः।
'ग्लौ' शब्द के औकार को सर्वत्र अजादि प्रत्यया में एचोऽयवायाव (२२) से
आव् आदेश हो जाता है। हलादि विभक्तियों मे कोई अन्तर नहीं होता। सुप् मे केवल
षत्व (१५०) विशेष है। रूपमाला यथा—
प्र० ग्लौः ग्लावौ ग्लावः प० ग्लावः ग्लौभ्याम् ग्लौभ्यः
द्वि० ग्लावम् ,, ,, ष० ,, ग्लावोः ग्लावाम्
तृ० ग्लावा ग्लौभ्याम् ग्लौभिः स० ग्लावि , ग्लौषु
च० ग्लावे , ग्लौभ्यः स० हे ग्लौ ! हे ग्लावौ ! हे ग्लाव !
इसी प्रकार 'जनौ' (जनान् अवतीति जनौ) प्रभृति शब्दों के रूप होंगे।
(यहा औकारान्त पुल्लिंग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।)
[लघु०] इत्यजन्ताः पुंल्लिङ्गाः [शब्दाः] ॥
अर्थ—यहां 'अजन्तपुंल्लिङ्ग' शब्द समाप्त होते हैं।
व्याख्या—'अजन्त' शब्द में स्पष्टप्रतिपत्ति के लिए कुत्व नहीं किया गया।
यहां 'अजन्त पुल्लिंग प्रकरण' समाप्त होता है। इस के अनन्तर 'अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण'
आरम्भ किया जायेगा।
अभ्यास (३४)
(१) गोतो णित् सूत्र म कात्यायन के वचनो के अनुसार दोषा की उद्भावना
कर उन का समाधान करें।
(२) क्या कारण है कि ग्रन्थकार ने ऋदन्तो के आगे ओदन्त शब्द लिखे हैं?
(३) रायो हलि सूत्र म 'हलि' पद ग्रहण न करें तो क्या दोष उत्पन्न होगा?
(४) औतोऽम्शसो सूत्र का पदच्छेद कर यह बतायें कि यह सूत्र 'ग्लौ' शब्द
म क्यो प्रवृत्त (?) होता है?
(५) 'गो+अस्' (ङसिं वा ङस्) यहा एचोऽयवायाव और एङ पदान्तादति
सूत्रा म कौन सा प्रवृत्त (?) होगा? कारण साथ लिखें।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २८५
(६) गो, रै और ग्लौ शब्दों का उच्चारण लिखते हुए गाः, गौः, राभ्याम्
और ग्लावि प्रयोगों की ससूत्र साधनप्रक्रिया लिखें।
(७) 'गोः' और 'गो:' इन दो में कौन सा पद व्याकरणसम्मत है?
(८) 'अजन्ताः' यहां कुत्व क्यों नहीं होता?
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इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त-
कौमुद्याम् अजन्त-पुंल्लिङ्ग-
प्रकरणं समाप्तम् ॥
अथाऽजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम्
अजन्त-पुंल्लिङ्ग शब्दों के अनन्तर अब अजन्त-स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन
प्रारम्भ किया जाता है। शब्दों का विवेचन प्रत्याहारक्रम से हुआ करता है। यथा—
अ = अकारान्त, आकारान्त। इ = इकारान्त, ईकारान्त। उ = उकारान्त, ऊकारान्त।
ऋ = ऋकारान्त, ॠकारान्त। ऌ = ॡकारान्त। ए = एदन्त। ओ = ओदन्त। ऐ =
ऐदन्त। औ = औदन्त।
तो इस प्रकार सर्वप्रथम अकारान्तों का नम्बर आता है, परन्तु स्त्रीलिङ्ग में
कोई शब्द अकारान्त नहीं रह सकता; क्योंकि सर्वत्र अजाद्यतष्टाप् (१२४५) द्वारा
अदन्तों से 'टाप्' प्रत्यय हो जाता है। 'टाप्' के अनुबन्धों का लोप हो कर सवर्णदीर्घ
करने से आकारान्त शब्द बन जाता है। अतः सर्वप्रथम आकारान्त शब्दों का ही विवेचन
किया जायेगा।
[लघु०] रमा ॥
व्याख्या—रमुँ क्रीडायाम् (भ्वा० आ०) धातु से नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणि-
न्यचः (७८६) सूत्र द्वारा 'अच्' प्रत्यय करने पर 'रम' शब्द बन जाता है। तब स्त्रीत्व
की विवक्षा में 'टाप्' प्रत्यय हो कर अनुबन्धों का लोप और सवर्णदीर्घ करने से 'रमा'
शब्द निष्पन्न होता है। 'रमा' का अर्थ है 'लक्ष्मी'।
'रमा' शब्द से स्वादिप्रत्ययों की उत्पत्ति प्रातिपदिकसञ्ज्ञा किये बिना ही हो
जाती है; क्योंकि स्वादिप्रत्यय जैसे प्रातिपदिक से परे होते हैं वैसे ङ्यन्त और आवन्त
से परे भी होते हैं (देखें सूत्र ११६)।
'रमा + स्' (सुँ) यहां 'रमा' शब्द आवन्त (टावन्त) है, अतः इस से परे
हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) सूत्र द्वारा अपृक्त सकार का लोप हो कर 'रमा' प्रयोग सिद्ध
होता है। यहां विभक्ति का लोप होने पर भी प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०)
द्वारा पदसञ्ज्ञा तो रहेगी ही। विभक्ति लाने का फल भी यही है।

२८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'रमा + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो वृद्धि-
रेचि (३३) से वृद्धि प्राप्त होती है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१६) औङ आपः ।७।१।१८॥
आवन्तादङ्गात् परस्य औङः शी स्यात् । 'औङ्' इत्यौकारविभक्तेः
सञ्ज्ञा । रमे । रमाः ॥
अर्थः—आवन्त अङ्ग से परे औङ् को शी आदेश हो। 'औङ्' यह औकार-
विभक्ति—'औ' और 'औट्' की प्राचीन सञ्ज्ञा है।
व्याख्या—आपः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का विभक्ति-
विपरिणाम हो जाता है)। औङः ।६।१। शी ।१।१। (जसः शी से)। 'आपः' यह
'अङ्गात्' पद का विशेषण है अत इस से तदन्तविधि हो कर 'आवन्ताद् अङ्गात्' बन
जाता है। अर्थ—(आप ) आवन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ओङ ) ओङ् के स्थान
पर (शी) शी आदेश होता है।
पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्य प्रथमा तथा द्वितीया के द्विवचन को 'ओङ्' कहते
थे। महामुनि पाणिनि ने भी उसी सञ्ज्ञा का यहां अपने शास्त्र में व्यवहार किया है।
'रमा + औ' यहां आवन्त अङ्ग रमा से परे औङ् को शी आदेश हुआ। अब
स्थानिवद्भाव से 'शी' में प्रत्ययत्व ला कर प्रत्यय के आदि शकार की लशक्वतद्धिते
(१३६) से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो—रमा + ई। पुनः आद् गुणः
(२७) से गुण एकादेश करने से 'रमे' प्रयोग सिद्ध होता है।
'रमा + अस्' (जस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, उस का दीर्घाज्जसि च
(१६२) से निषेध हो जाता है। अब अकः सवर्णे दीर्घ (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर
रुत्व विसर्ग करने से 'रमा' प्रयोग सिद्ध होता है।
'हे रमा + स्' यहां सम्बुद्धि में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१७) सम्बुद्धौ च ।७।३।१०६॥
आप एकारः स्यात् सम्बुद्धौ। एङ्घ्रस्वात्० (१३४) इति सम्बुद्धि-
लोपः । हे रमे !, हे ग्‍मे !, हे रमाः ! । रमाम्र् । रमे । रमाः ॥
अर्थ —सम्बुद्धि परे होने पर 'आप्' को 'ए' आदेश हो।
व्याख्या—सम्बुद्धौ ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। आप ।६।१। (आङि चापः से)।
अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। एत् ।१।१। (बहुवचने झल्येत् से)। 'अङ्गस्य' का
विशेषण होने से 'आपः' से तदन्तविधि हो कर 'आवन्तस्य अङ्गस्य' बन जायेगा।
अर्थ—(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे होने पर (आप = आवन्तस्य) आवन्त (अङ्गस्य)
अङ्ग के स्थान पर (एत्) एकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य आकार को
एकार आदेश होगा।
'हे रमा + स्' यहां 'स्' यह सम्बुद्धि परे है ही अत प्रवृत्तसूत्र से आकार को

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २८७
एकार हो गया । तब 'हे रमे + स्' इस स्थिति में एङ्ह्रस्वात्० (१३४) सूत्र से
सम्बुद्धि के सकार का लोप करने से 'हे रमे !' रूप सिद्ध होता है।
सम्बोधन के द्विवचन और बहुवचन में प्रथमा के समान प्रक्रिया होती है—
हे रमे !, हे रमाः । ध्यान रहे कि सम्बोधन के एकवचन और द्विवचन में एक समान
रूप बनने पर भी प्रक्रिया में बड़ा अन्तर है।
'रमा + अम्' यहां अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो कर—रमाम् ।
द्वितीया के द्विवचन में प्रथमावत् 'रमे' रूप बनता है।
द्वितीया के बहुवचन में 'रमा + अस्' (शस्) इस स्थिति में दीर्घ से परे जस्
वा इच्छ् वर्त्तमान न होने से दीर्घाज्जसि च (१६२) से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध न
हुआ। अतः पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर रुत्व विसर्ग करने से—'रमाः' प्रयोग सिद्ध हुआ।
ध्यान रहे कि तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) सूत्र पुंल्लिङ्ग में ही शस् के सकार को
नकार आदेश करता है अतः यहां स्त्रीलिङ्ग में उस की प्रवृत्ति न होगी।
'रमा + आ' (टा) यहां सवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१८) आङि चापः। ७।३।१०५॥
आङि ओसि चाप एकारः । रमया । रमाभ्याम् । रमाभिः ॥
अर्थः—आङ् अथवा ओस् परे हो तो 'आप्' को 'ए' आदेश हो ।
व्याख्या—आङि ।७।१। ओसि ।७।१। (ओसि च से)। च इत्यव्ययपदम् ।
आपः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। एत् ।१।१। (बहुवचने झल्येत् से)
'आपः' यह 'अङ्गस्य' पद का विशेषण है, अतः तदन्तविधि हो कर 'आवन्तस्य अङ्गस्य'।
बन जायेगा । अर्थः—(आङि) आङ् (च) अथवा (ओसि) ओस् परे होने पर (आपः
=आवन्तस्य) आवन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर एकार आदेश हो।
अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य आकार के स्थान पर ही एकार आदेश होगा।
'टा' विभक्ति को ही पूर्वाचार्य 'आङ्' कहते हैं—यह पीछे (१७१) सूत्र पर
स्पष्ट हो चुका है।
'रमा + आ' इस दशा में आङ् परे रहने पर आवन्त अङ्ग 'रमा' के अन्त्य
आकार को एकार हुआ। तब एचोऽयवायावः (२२) सूत्र से एकार को 'अय्' हो कर
'रमया' रूप सिद्ध हुआ।
रमा + भ्याम् = रमाभ्याम् । रमा + भिस् = रमाभिः । यहां अत् = ह्रस्व अकार
से परे न होने के कारण 'भिस्' को 'ऐस्' नहीं हुआ।
'रमा + ए' (ङे) यहां वृद्धि के प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१६) याडापः ।७।३।११३॥
आपो ङितो याट् । वृद्धिः--रमायै । रमाभ्याम् २ । रमाभ्यः २ ।
रमायाः २ । रमयोः २ । रमाणाम् । रमायाम् । रमासु ॥
अर्थः—आवन्त अङ्ग से परे ङित् वचनों को 'याट्' आगम हो ।
व्याख्या—याट् ।१।१। आपः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का